अल्लाह के नबीयों और वलीयों के मज़ार पर जाना और उनसे मदद मांगना क़ुरआन व हदीस से साबित है

मज़ार बनाना​

_*🕋अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है तर्जमा👇🏻*_

 तो बोले उनकी ग़ार पर इमारत बनाओ उनका रब उन्हें खूब जानता है वह बोले जो इस काम मे ग़ालिब रहे थे क़सम है कि हम तो उन पर मस्जिद बनायेंगे*_

_*📕 पारा 15, सूरह कहफ, आयत 21*_

_*📖तफसीर : असहाबे कहफ 7 मर्द ए मोमिन हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की उम्मत के लोग थे बादशाह दक़्यानूस के ज़ुल्म से तंग आकर ये एक ग़ार मे जाकर छिप गये जहां ये 300 साल तक सोते रहे 300 साल के बाद जब ये सोकर उठे और खाने की तलाश में बाहर निकले तो उनके पास पुराने सिक्के देखकर दुकानदारों ने उन्हें सिपाहियों को दे दिया उस वक़्त का बादशाह बैदरूस नेक और मोमिन था जब उस को ये ख़बर मिली तो वो उनके साथ ग़ार तक गया और बाक़ी तमाम लोगो से भी मिला असहाबे कहफ सबसे मिलकर फिर उसी ग़ार मे सो गये जहां वो आज तक सो रहें हैं हर साल दसवीं मुहर्रम को करवट बदलते हैं और हज़रत इमाम मेंहदी (عليه السلام) के दौर मे उठेंगे और आपके साथ मिलकर जिहाद करेंगे बादशाह ने उसी ग़ार पर इमारत बनवाई और हर साल उसी दिन उसी तारीख़ में वहां तमाम लोगों को जाने का हुक्म दिया*इस आयत और तफ़सीर से मालूम हुआ के बुज़ुर्गों यानी अल्लाह के वलीयों की मज़ार के करीब मस्जिद बनाना अहले ईमान का क़दीम (पुराना) तरीक़ा है और क़ुरआन ए करीम में इसका ज़िक्र फ़रमाना और उसको मना न करना इस फ़ैल (काम) के दुरुस्त होने की क़वी तरीन (पावरफुल) दलील है,*

_*इससे ये भी मालूम हुआ के बुज़ुर्गों के जवार (क़रीब) में बरकत हासिल होती है इसीलिए अहले अल्लाह के मज़ारात पर लोग हुसूले बरकत के लिए जाया करते हैं और इसीलिए क़बरों की ज़ियारत सुन्नत और मोजिबे सवाब है,

मज़ार पर जाना​

 हदीस शरीफ़ – हुज़ूर सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसललम इरशाद फरमाते हैं कि*_

_*मैंने तुम लोगों को क़ब्रों की ज़ियारत से मना किया था अब मैं तुम को इजाज़त देता हूं कि क़ब्रों की ज़ियारत किया करो,*_

_*📕 मुस्लिम, जिल्द 1, हदीस नं. 2158*_

. हदीस शरीफ़ – खुद हुज़ूर सल्लललाहू तआला अलैही वसल्लम हर साल शुहदा ए उहद की क़ब्रो पर तशरीफ़ ले जाते थे और आपके बाद तमाम खुल्फा का भी यही अमल रहा,*_

_*📕 शामी, जिल्द 1, सफह 604*_
_*📕 मदारिजुन नुबुव्वत, जिल्द 2, सफह 135*_

_*दोस्तो ​जब हमारे आक़ा अलैहिस्सलाम अपने उम्मती की क़ब्र पर जा सकते हैं तो फिर हम उम्मती अपने नबी या किसी वली की क़ब्र पर क्यों नहीं जा सकते, ज़रूर जा सकते हैं

मज़ार पर चादर चढ़ाना​

 हदीस शरीफ़ – हुज़ूर सल्लललाहू तआला अलैहि वसल्लम की मज़ारे अक़दस पर सुर्ख यानि लाल रंग की चादर डाली गई थी*_

_*📕  सही मुस्लिम, जिल्द 1, सफह 677*_

 हदीस शरीफ़ – हुज़ूर सल्लललाहू तआला अलैहि वसल्लम एक जनाज़े मे शामिल हुए बाद नमाज़ ए जनाज़ा व दफ़न एक कपड़ा मांगा और उसकी क़ब्र पर डाल दिया*_

_*📕 तफसीरे क़ुर्बती, जिल्द 1, सफह 26*_

_*​मज़ार पर फूल डालना​👇🏻*_

 हदीस शरीफ़ – हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का गुज़र दो क़ब्रो के क़रीब से हुआ तो आपने फरमाया कि इन दोनों पर अज़ाब हो रहा है और किसी बड़े गुनाह की वजह से नहीं बल्कि मामूली गुनाह की वजह से, एक तो पेशाब की छींटों से नहीं बचता था और दूसरा चुगली करता था, फिर आपने एक तर शाख🌿 तोड़ी और आधी आधी करके दोनो क़ब्रों पर रख दी और फरमाया कि जब तक ये शाख तर रहेंगी तस्बीह करती रहेंगी जिससे कि मय्यत के अज़ाब में कमी होगी*_

_*📕 बुखारी, जिल्द 1, हदीस 218*_

इस हदीस शरीफ़ से साबित हुआ के तर शाख अल्लाह तआला की तस्बीह करती है ​जब तर शाख तस्बीह करती है तो फिर फूल भी करेगा क्योंके वो भी तर और ख़ुशबू दार होता है और जब इनकी बरक़त से अज़ाब में कमी हो सकती है तो एक मुसलमान के क़ुरआन की तिलावत व दुरूद व वज़ाइफ से तो और भी ज़्यादा सवाब पहुंचेगा, याद रहे साहिबे मज़ार पर यक़ीनन अज़ाब नहीं होता क्योके वो अल्लाह तआला के नेक मक़बूल बंदे हैं मगर फूलों की तस्बीह से साहिबे मज़ार ख़ुश  होते हैं और दुरूद व फ़ातिहा से उनके दरजात बुलंद होते हैं,*

*​मुर्दो का सुनना​*_

 अल्लाह तआला फ़ररमाता है👇🏻*_

_*📝तर्जमा : तो सालेह ने उनसे मुंह फेरा और कहा एै मेरी क़ौम बेशक मैंने तुम्हें अपने रब की रिसालत पहुंचा दी*_

_*📕 पारा 8, सुरह एराफ, आयात 79*_

_*📖तफसीर – हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम क़ौमे समूद की तरफ नबी बनाकर भेजे गए,क़ौमे समूद के कहने पर आपने अपना मोअजज़ा दिखाया कि एक पहाड़ी से ऊंटनी ज़ाहिर हुई जिसने बाद में बच्चा भी जना, ये ऊंटनी तालाब का सारा पानी एक दिन खुद पीती दुसरे दिन पूरी क़ौम, जब क़ौमे समूद को ये मुसीबत बर्दाश्त न हुई तो उन्होंने इस ऊंटनी को क़त्ल कर दिया, तो आपने उनके लिए अज़ाब की बद्दुआ की जो के क़ुबूल हुई और वो पूरी बस्ती ज़लज़ले से तहस नहस हो गयी, जब सारी क़ौम मर गई तो आप उस मुर्दा क़ौम से मुखातिब होकर अर्ज़ करने लगे जो के ऊपर आयत में गुज़रा*_

_*📕 तफसीरे सावी, जिल्द 2, सफह 73*_

 हदीस शरीफ़ – जंगे बद्र के दिन हुज़ूर सल्लललाहू तआला अलैहि वसल्लम ने बदर के मुर्दा कुफ्फारों का नाम लेकर उनसे ख़िताब किया, तो हज़रत उमर फारूक़े आज़म ने हैरत से अर्ज़ किया कि क्या हुज़ूर मुर्दा बेजान जिस्मों से मुखातिब (बात करते) हैं तो सरकार सल्लललाहू तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ऐ उमर खुदा की क़सम ज़िंदा लोग इनसे ज़्यादा मेरी बात को नहीं समझ सकते’*_

_*📕 बुखारी, जिल्द 1, सफह 183*_

_*​ज़रा सोचिये कि जब काफिरों के मुर्दो में अल्लाह ने सुनने की सलाहियत दी है तो फिर अल्लाह के मुक़द्दस बन्दे नबी और वली हमारी आवाज़ों को क्यों नहीं सुन सकते​, ज़रूर सुन सकते हैं*_

*​क़ब्र वालों का मदद करना​👇🏻*

 अल्लाह तआला फ़रमाता है👇🏻*_

_*📝तर्जमा : और अगर जब वो अपनी जानों पर ज़ुल्म करें तो ऐ महबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों फिर अल्लाह से माफी चाहें और रसूल उनकी शफाअत फरमायें तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान पायेंगे,*_

_*📕 पारा 5, सूरह निसा, आयत 64*_

 हदीस शरीफ़ – हुज़ूर सल्लललाहू तआला अलैही वसल्लम की वफात के बाद एक ऐराबी आपकी मज़ार शरीफ़ पर हाज़िर हुआ और रौज़ा ए अनवर की खाक़ अपने सर पर डाली और क़ुरान की यही आयत पढ़ी फिर बोला कि हुज़ूर मैने अपनी जान पर ज़ुल्म किया अब मै आपके सामने अपने गुनाह की माफी चाहता हूं हुज़ूर मेरी शफाअत कराइये तो रौज़ा ए अनवर से आवाज़ आती है कि जा तेरी बख़्शिश हो गई*_

_*📕 तफसीर खज़ाइनुल इर्फान, सफह 105*_

क़ौल – हज़रते इमाम शाफई रज़िअल्लाहु तआला अन्ह फरमाते हैं जब भी मुझे कोई हाजत (ज़रुरत) पेश आती है तो मैं हज़रते इमाम ए आज़म रज़िअल्लाहु तआला अन्ह की क़ब्र पर आता हूं, 2 रकत नफ्ल पढता हूं और रब की बारगाह में दुआ करता हूं तो मेरी हाजत बहुत जल्द पूरी हो जाती है,*_

_*📕 रद्दुल मोहतार, जिल्द 1, सफह 38*_

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