मीलाद शरीफ और फुक़्हा

रिवायत – अबु लहब जो कि काफिर था और जिसकी मज़म्मत में सूरह लहब नाज़िल हुई,जब हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की विलादत हुई तो अबु लहब की बांदी सोबिया ने उसको आकर ये खुशखबरी दी कि तेरे भाई के यहां बेटा पैदा हुआ है इसी खुशी में उसने अपनी बांदी को उंगली के इशारे से आज़ाद कर दिया,बाद मरने के अबु लहब को उसके घर वालों ने ख्वाब में देखा तो हाल पूछा तो कहता है कि मैंने कोई भलाई ना पाई मगर ये कि जब इस उंगली को चूसता हूं जिससे मैंने अपने भतीजे की विलादत की खुशी में अपनी बांदी को आज़ाद किया था तो इससे पानी निकलता है जिससे मुझे राहत मिलती है

📕 उम्दतुल क़ारी,जिल्द 2,सफह 95
📕 फतहुल बारी,जिल्द 9,सफह 118

सोचिये कि जब अबु लहब जैसे काफिर को मीलाद शरीफ की खुशियां मनाने की बरक़त से फैज़ मिल सकता है तो फिर हम तो उनके मानने वाले उम्मती हैं अगर चे हम बदकार हैं तो क्या हुआ,हैं तो उन्ही के कल्मा पढ़ने वाले,क्या हमें बारगाहे खुदावन्दी से फैज़ ना मिलेगा,मिलेगा और यक़ीनन मिलेगा,रिवायत में आता है कि हज़रत जुनैद बग़दादी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं

रिवायत – जो कोई अदब व ताज़ीम से महफिले मीलाद में शिरकत करेगा इं शा अल्लाह उसका ईमान सलामत रहेगा

📕 अन्नाएतुल कुब्रा,सफह 24

और सिर्फ ईमान सलामत नहीं रहता है बल्कि अगर कोई काफिर भी हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के मीलाद शरीफ में सिद्क़ दिल से शामिल हो जाए या किसी तरह का ताऊन करदे तो कोई बईद नहीं कि मौला उसे ईमान जैसी दौलत से नवाज़ दे,मिसाल के तौर पर ये रिवायत पढ़िये और अपना ईमान ताज़ा कीजिये

रिवायत – हज़रत अब्दुल वाहिद बिन इस्माईल रहमतुल्लाह तआला अलैहि फरमाते हैं कि एक शख्स मिस्र में हर साल महफिले मिलाद मुनक़्क़ीद किया करता था उसके पड़ोस में एक यहूदी रहता था,उस यहुदी की बीवी ने कहा कि क्या बात है कि इस महीने में ये मुसलमान बहुत माल खर्च करता है तो उसने कहा कि इस महीने में उनके नबी की विलादत हुई थी जिसकी खुशी में ये एहतेमाम किया जाता है,तो उसकी बीवी खुश हुई और कहा कि ये मुसलमानों का बहुत अच्छा तरीक़ा है और फिर वो सो गई,रात को ख्वाब देखती है कि एक साहिबे हुस्नो जमाल शख्स उस मुसलमान के घर तशरीफ ले गए हैं उनके साथ एक कसीर जमात भी है ये औरत उनके पीछे पीछे उस मुसलमान के घर में दाखिल हो गयी और एक शख्स से पूछा कि ये कौन बुज़ुर्ग हैं तो फरमाया कि ये अल्लाह के सच्चे रसूल जनाब अहमदे मुज्तबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम हैं और उनके साथ उनके सहाबा की जमात भी है ये इसलिए हाज़िर हुए हैं कि ये शख्स दिल से हुज़ूर की मुहब्बत में महफिले मीलाद शरीफ मुनक़्क़िद करता है वो औरत बोली कि अगर मैं उनसे बात करना चाहूं तो क्या आप जवाब देंगे तो फरमाया कि बिल्कुल,तो औरत हुज़ूर की बारगाह में हाज़िर हुई तो हुज़ूर ने लब्बैक फरमाया तो कहती है कि आप मुझ जैसी को जवाब से नवाज़ते हैं हालांकि मैं आपके दीन पर नहीं हूं तो आप सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि बेशक मैंने जान लिया कि तुझको हिदायत मिल चुकी है तो फरमाती है कि आप सच कहते हैं आप साहिबे खुल्क़ हैं मैं गवाही देती हूं कि बेशक आप अल्लाह के सच्चे रसूल हैं,फिर ये अपने घर को लौट आई और अहद किया कि सुबह को जो कुछ उसकी मिल्क है वो सब दीने इस्लाम पर लुटा देगी और हुज़ूर की मीलाद मनायेगी,जब सुबह को आंख खुली तो क्या देखती है कि उसका शौहर उससे पहले ही दावत के कामों में मसरूफ है तो हैरानी से पूछती है कि ये क्या माजरा है तो उसका शौहर कहता है कि रात तुमने इस्लाम क़ुबूल कर लिया तो कहती है कि तुम्हे इसकी खबर कैसे हो गई तो शौहर बोला कि मैं भी तेरे बाद उसी महबूबे दोआलम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के हाथों पर ईमान ला चुका हूं

📕 मिलादुन नबी,सफह 60
📕 तज़किरातुल वाएज़ीन,सफह 200

सुब्हान अल्लाह सुब्हान अल्लाह,सोचिये कि उस यहुदी औरत और उसके शौहर को हिदायत यानि ईमान क्यों मिला,क्योंकि वो औरत एक मुसलमान के मीलाद शरीफ मनाने पर सिर्फ खुश हो गयी थी जिसकी बदौलत अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने उसे और उसके शौहर को ईमान जैसी दौलत से नवाज़ दिया,और एक आज का बद अक़ीदा वहाबी है जो कि कल्मा उसी नबी का पढ़ता है रोज़ा नमाज़ करता है दाढ़ी रखता है झुब्बा टोपी पहनता है मगर अक़ीदा ऐसा कि काफिरों से बदतर है

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