ह. अबुबक्र सिददीक़ रज़ी. और तसव्वुफ

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और (ख़ुदाए) रहमान के ख़ास बन्दे तो वह हैं जो ज़मीन पर अख्लाक व इन्केसारी के साथ चलते हैं और जब जाहिल उनसे (जिहालत की) बात करते हैं तो वो उनको सलाम करते हैं।

(क़ुरान25:63)

हुजूरे अकरम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि

जो सूफियों की आवाज़ सुने और उनकी दुआ पर आमीन न कहे तो वो अल्लाह के नज़दीक ग़ाफ़िलों में शुमार होगा।

कशफुल महजुब में हज़रत दाता गंजबख्श अली हजवेरी रज़ी. फ़रमाते हैं कि अगर तुम सूफ़ी बनना चाहते हो तो जान लो कि सूफ़ी होना हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. की सिफ़त है। सफ़ाए बातिन के लिए कुछ उसूल और फ़रोअ हैं। एक असल तो ये है दिल को ग़ैर-अल्लाह से खाली करे और फ़रोअ ये है कि मकरो फरेब से भरपूर दुनिया से दिल को खाली कर दे। ये दोनों सिफ़तें अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. की हैं। इसलिए आप तरीक़त के रहनुमाओं के इमाम हैं।

हुजूरे अकरम ﷺ के विसाल के बाद जब तमाम सहाबा बारगाहे मुअल्ला में दिल शिकस्ता होकर जमा हुए तो हज़रत उमर फारूक़ रज़ी. अपनी तलवार निकाल कर खड़े हो गये और फ़रमाने लगे कि जिसने भी ये कहा कि अल्लाह के रसूल ﷺ का इन्तेकाल हो गया है, मैं उसका सर कलम कर दूंगा। ऐसे वक्त में अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. तशरीफ लाए और बुलन्द आवाज़ में खुत्बा दिया कि – ”खबरदार,जो हुजूर ﷺ की परसतिश करता था, वो जान ले कि हुजूर ﷺ का विसाल हो चुका है और जो उनके रब की इबादत करता है तो वो आगाह हो कि वो ज़िन्दा है, उसे मौत नहीं है।”

फिर क़ुरान की आयत तिलावत फ़रमाई-

(फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मुहम्मद ﷺ तो सिर्फ रसूल हैं, उनसे पहले कई पैग़म्बर गुज़र चुके हैं। फिर क्या अगर मुहम्मद ﷺ का विसाल हो जाए या शहीद कर दिये जाएं तो तुम उलटे पॉव (कुफ्र की तरफ़) पलट जाओगे। और (ये जान लो कि) जो उलटे पांव फिरेगा तो हरगिज़ ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और जल्द ही ख़ुदा शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देगा

(क़ुरान 3:144)

मतलब ये था कि अगर कोई ये समझे बैठा था कि हुजूर ﷺ मअबूद थे तो जान ले कि हुजूर ﷺ का विसाल हो चुका है और अगर वो हुजूर ﷺ के रब की इबादत करता था तो वो ज़िन्दा है हरग़िज़ उस पर मौत नहीं आनी है। हकीकत ये है कि जिसने हज़रत मुहम्मद ﷺ को बशरीयत की आंख से देखा (और आपको अपने जैसा आम इन्सान समझा) तो जब आप दुनिया से तशरीफ ले जाएंगे तो आपकी वो ताज़ीम जो उसके दिल में है जाती रहेगी और जिसने आप को हक़ीक़त की आंख से देखा तो उसके लिए आपका तशरीफ़ ले जाना व मौजूद रहना, दोनों बराबर है।

जिसने मख़लूक़ पर नज़र डाली वो हलाक हुआ और जिसने हक की तरफ रूजूअ किया वो मालिक हुआ।

जिसका दिल फ़ानी (नश्वर) से जुड़ा होता है, उसके मिटने से वो भी मिट जाता है। लेकिन जिसका दिल रब (ईश्वर) से जुड़ा होता है, वो नफ्स को मिटाकर अपने रब के साथ बाक़ी रह जाता है।

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