पहले सूफ़ी

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लोगों के ज़ेहन में हमेशा ये सवाल रहा है कि पहले सूफ़ी कौन हैं? कोई हज़रत अबूज़र ग़फ़्फ़ारीؓ को मानते हैं, जिनके लिए सबसे पहले सूफ़ी लफ़्ज़ का इस्तेमाल हुआ। तो कोई हज़रत उवैस करनीؓ को, जिनका मुकाम सहाबियों पर भारी है। तो कोई हसन बसरीؓ को, जो चार पीर में से है। इसमें अलग अलग लोगों की अलग अलग राय है। इस बहस की वजह सिर्फ ‘सूफ़ी’ लफ़्ज़ ही है, क्योंकि ‘सूफ़ी’ लफ़्ज़ हुज़ूरﷺ  के वक़्त इस्तेमाल नहीं होता था, बल्कि बाद में होने लगा। (ज़्यादा मालूमात के लिए देखें सूफ़ीयाना.2 पेज23)

सिर्फ़ रब के खास बंदों के लिए ही सूफ़ी लफ़्ज़ इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि सूफ़ी होने के लिए खास सिफ़तें भी होना ज़रूरी है। तो पहले सूफ़ी की तहक़ीक़ के लिए भी हमें ये देखना होगा कि सबसे पहले वो सिफ़तें किनमें देखी गयी।

सबसे पहले मख्दूम यहया मुनीरीؓ के क़ौल को देखते हैं। वो फ़रमाते हैं कि ‘‘इस कायनात में सबसे पहले सूफ़ी हज़रत आदमؑ हैं। क्योंकि सबसे पहली ख़ानक़ाह यानी काबा, आप ही ने बनाई। ख़िरका भी आप ही से मन्सूब है। आपका गोदड़ी (गुदड़ी) इस्तेमाल करना, आपके नक़्शेक़दम पर चलने वाले पैगम्बर हज़रत नूहؓ, हज़रत मूसाؓ व हज़रत ईसाؓ ने भी अपनाया। हज़रत मूसाؓ व ईसाؓ ने तो सारी उम्र ‘सफू़’ का लिबास पहना और बैतुल मुक़द्दस को ख़ानक़ाह बनाया। हज़रत मुहम्मदﷺ  ने भी गोदड़ी और कंबल पहना और मस्जिद नबवी को ख़ानक़ाह बनाया। आप अपने कुछ ख़ास सहाबियों को तसव्वुफ़ व राज़ो नियाज़ की बातें बताते, जो आम लोगों को समझ में ही नहीं आती थी और जब किसी को इज़्ज़त व तकरीम फ़रमाते तो अपनी चादर या कपड़ा इनायत करते। ये ख़ास सहाबी जो तकरीबन 70 थे, हुजूरﷺ  की ख़ास पैरवी करने वाले पीर हुए और इन्हें सूफ़ी समझा गया।’’

लेकिन इस बारे हज़रत इश्तियाक़ आलम शहबाज़ीؓ फ़रमाते हैं कि ‘‘जब हम तसव्वुफ़ और सूफ़ीया का असल, किताबो सुन्नत को क़रार दे चुके हैं, तो इस मामले के लिए भी किताबो सुन्नत की तरफ़ ही रूजूअ करते हैं। इससे बेहतर कुछ दूसरा नहीं हो सकता। अल्लाह ने कुरान में फ़रमाया. ‘‘ऐ चादर ओढ़नेवाले!’’ (74:1) और ‘‘ऐ कमली ओढ़ने वाले! (73:1)। ये लिबास अल्लाह के सारे पैगम्बरों और हुज़ूरﷺ  का पसंदीदा लिबास रहा है। लेकिन कुरान में ये सिर्फ़ हुज़ूरﷺ  के लिए ही कहा जा रहा है। अब आप इसे कंबली कहें या कमली, सफू़ कहें या गोदड़ी, पशमीना का बना कहें या दलक का, बात वही है।’’

सूफ़ी, सफू़ से बना कपड़ा इसलिए नहीं पहनते कि हज़रत आदमؑ ने पहना, बल्कि इसलिए पहनते हैं क्योंकि हुज़ूरﷺ  ने पहना है। तन्हाईपसंद व इबादतगुज़ार हैं तो सिर्फ इसलिए कि हुज़ूरﷺ  ने ऐसा किया। जो भी बातें सूफ़ी की सिफ़त में शामिल है, वो सारी हुज़ूरﷺ  की प्यारी सुन्नतें ही हैं, उनकी प्यारी अदाएं ही हैं। एक सूफ़ी, सारी उन्हीं बातों की पैरवी करते हैं, जो हुज़ूरﷺ  ने अपनी ज़िदगी में कर के दिखाया। सूफ़ी होना दरअस्ल हुज़ूरﷺ  के बताए जैसा बनने की कोशिश करना ही है। जब अल्लाह को सबसे ज्यादा महबूब हुज़ूरﷺ  ही हैं और सबसे पहले हुज़ूरﷺ  ही का नूर पैदा किया गया तो ये बात भी बिल्कुल साफ़ है कि सबसे पहले सूफ़ी हज़रत मुहम्मदﷺ  ही हैं।

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