इश्क़ की इमारत

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लेकिन सच्ची मुहब्बत हदों से भी गुज़र जाती है और इसी के सहारे ये काम शुरू करने का इरादा किया गया। तुर्कों ने अपनी सल्तनत के अलावा सारी दुनिया में इस इरादे का ऐलान किया। ये भी ऐलान किया गया कि इस तामीर व तौसीअ से संबंधित कारीगर की हमें ज़रूरत है। ये सुनना था कि हिन्दुस्तान, अफगानिस्तान, चीन, ईरान, इराक़, शाम, मिस्र, यूनान, अफ्रीका वगैरह से और दुनिया के कोने कोने से अपने अपने काम में माहिर लोगों ने कुस्तुनतुनिया की तरफ़ रूख करना शुरू कर दिया। उधर कुस्तुनतुनिया में शहर के बाहर एक बहुत बड़ी बस्ती बसाई गई उन कारीगरों और उनके घरवालों के लिए। और उनके खाने पीने रहने का बंदोबस्त किया गया।

इस काम का पहला हिस्सा था अपने वक़्त के सबसे बेहतर कारीगरों की तलाश। इस तलाश ने, एक नए शहर को बसा दिया था, जिसमें तकरीबन 15 साल लग गए। अब दूसरा हिस्सा ये था कि हर कारीगर हाफि़ज़े कुरान भी हो। इस काम के लिए उन माहिर कारीगरों को कहा गया कि अपने बच्चे या शागिर्द को अपनी तरह माहिर बनाए। हुकूमत ने उन बच्चों के हाफि़ज़े (कुरान को बिना देखे याद करने) का इंतेज़ाम किया। साथ ही उन बच्चों की जिस्मानी कुवत व सवारी की तरबियत भी दी गई। इसके लिए 25 साल का वक्त मुक़र्रर किया गया।

इतने सब्र, मेहनत, मुहब्बत और हैरत का ये बिल्कुल अनोखा कारनामा इतिहास की नई इबारत लिख रहा था। इन 25 सालों के बाद तकरीबन 500 माहिर कारीगरों की एक नई और ख़ालिस नस्ल तैयार हुई। ये तीस से चालीस साल के नेक व सलीकेमंद नौजवान सिर्फ कारीगर ही नहीं थे, बल्कि आशिके रसूल भी थे और इतना सब करने की वजह सिर्फ ये थी कि हुज़ूरﷺ  की बारगाह में किसी तरह की बेअदबी न हो।

एक तरफ इन हुनरमंद कारीगरों को तैयार किया जा रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ इमारत की तामीर की प्लानिंग की जा रही थी। उसके लिए ज़रूरी सामान इकट्ठ किए जा रहे थे। इस प्लानिंग को राज़ रखा गया, यहां तक कि आज भी नहीं मालूम कि हुज़ूरﷺ  की बारगाह में इस्तेमाल हुआ पत्थर कहां से लाया गया था। लकड़ियां भी अनछुए जंगलों से लायी गयी और बीस साल तक मौसमी मार से गुज़ारा गया। रंगों के मामले में भी मज़बूत और खालिस रंगों को लिया गया। कांच, कलम के लिए बारीकी से काम किया गया। ख़त्ताती (केलीग्राफी) के लिए नील व यमुना नदी के किनारे पेड़ उगाए गए। इसी तरह हर काम की तैयारी बड़े करीने से की गई।

सारे सामान व सारे लोगों के साथ, समंदर व रेगिस्तान से होते हुए मदीना शरीफ़ पहुंचा गया। मदीना की सरहदों से बाहर तकरीबन 12 मील पहले, कारीगरी और रहने के लिए एक नई बस्ती पहले से ही तैयार कर ली गई थी। अब यहां ये सवाल उठता है कि जब मदीना में काम करना है तो इतनी दूर नई बस्ती बसाने क्या ज़रूरत थी। सीधे मदीना पहंचकर काम शुरू कर दिया जाता। लेकिन यहां फिर मुहब्बत काम कर रही थी। इतनी बड़ी इमारत तैयार होनी थी, जिसके वास्ते हज़ारों पत्थर काटे जाते तराशे जाते, मचान बनाए जाते, इसके अलावा भी बहुत से ऐसे काम होते जिससे शोर शराबा होता। लेकिन मुहब्बत को ये मन्जूर नहीं था। उसका ये ख़्याल था जिन फि़ज़ाओं में हुज़ूरﷺ  हैं, वहां अमनो अमान क़ायम रहे। वहां की हवाओं में जो सुकून है वो कायम रहे।

हर वो काम जिसमें ज़रा भी आवाज़ होती, तो उसे शहर के बाहर किया जाता। पत्थर अगर थोड़ा छोटा या बड़ा हो जाता, तो उसे वापस 12 मील दूर ले जाया जाता और उसे ठीक करके लाया जाता। मचान छोटी बड़ी हुई तो उसे वापस लाकर, ठीक करके ले जाया गया। यहां ये ख्याल रहे कि ये कोई मशीनी दौर नहीं था कि झट से गए झट से आ गए। एक छोटे से काम के लिए आने जाने में, कई दिन भी लग जाते थे।

सारे कारीगरों को अपने अपने हुनर और प्लानिंग के तहत काम की आज़ादी थी। लेकिन दो बातें उन पर ज़रूरी कर दी गई थी. पहली हुज़ूरﷺ  की बारगाह में हमेशा पाक व बावज़ू रहे और दूसरी हर वक़्त कुरान की तिलावत करते रहे। मुहब्बत की ऐसी मिसाल न कहीं सुनी है, न सुन सकेंगे।

इस तरह खुदा के कलाम को पढ़ते हुए कारीगरी के पूरे पंद्रह साल मस्जिदे नबवी की तामीर होती रही और एक सुब्ह इमारत के मुकम्मल होने का ऐलान किया गया। ये इमारत कैसी है, क्या है, कहां ले जाती है, इस पर कई किताबें लिखी जा सकती है। यहां सिर्फ इतना कह सकते हैं कि मुहब्बत और कुरबानी की ये इमारत, इस दुनिया में होते हुए भी इस दुनिया की नहीं है। खुद को कायम रख कर देखें तो ये कहीं और है, खुद से बाहर जाकर देखें तो ये कहीं और है, हम कुछ और हैं।

मुहब्बत मानीए अल्फ़ाज़ में लाई नहीं जाती।

ये वो इबादत है, जो समझी जाती है, समझाई नहीं जाती।

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