कर्बला के वह आंकड़े जो शायद आप को न पता हों

यज़ीद की बैअत से इन्कार से लेकर आशूर तक इमाम हुसैन का आंदोलन 175 दिनों तक चला। 12 दिन मदीने में, 4 महीने 10 दिन मक्के में, 23 दिन मक्के और कर्बला के रास्ते में और 8 दिन कर्बला में।
कूफे से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को 12000 खत लिखे गये थे।
कूफे में इमाम हुसैन के दूत मुस्लिम बिन अक़ील की बैअत करने वालों की तादाद 18000 या 25000 या 40000 बतायी गयी है।
अबू तालिब की नस्ल से कर्बला में शहीद होने वालों की संख्या 30 है, 17 का नाम ” ज़ेयारत नाहिया में आया है 13 का नहीं।
इमाम हुसैन की मदद की वजह से शहीद होने वाले कूफियों की संख्या 138 थी जिनमें से 15 ग़ुलाम थे।
शहादत के वक्त इमाम हुसैन अलैहिस्सलमा की उम्र 57 साल थी। शहादत के बाद उनके बदन पर भाले के 33 घाव और तलवार के 34 घाव थे। तीरों की संख्या अनगिनत, बताया गया है कि शहादत तक इमाम हुसैन के बदन पर कुल 1900 तक घाव थे।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की लाश पर दस घुड़सवारों ने घोड़े दौड़ाए थे।
कूफे से इमाम हुसैन के खिलाफ जंग के लिए कर्बला जाने वाले सिपाहियों की तादाद 33 हज़ार थी। कुछ लोगों ने संख्या और अधिक बतायी है।
दसवीं मुहर्रम को इमाम हुसैन ने 10 शहीदों के लिए मर्सिया पढ़ा, उनके बारे में बात की और दुआ कीः हज़रत अली अकबर, हज़रत अब्बास, हज़रत क़ासिम, अब्दुल्लाह इब्ने हसन, अब्दुल्लाह, मुस्लिम बिन औसजा, हबीब इब्ने मज़ाहिर, हुर बिन यज़ीद रियाही, ज़ुहैर बिन क़ैन और जौन।
इमाम हुसैन कर्बला के 7 शहीदों के सिरहाने पैदल और दौड़ते हुए गयेः मुस्लिम बिन औसजा, हुर, वासेह रूमी, जौन, हज़रत अब्बास, हज़रत अली अकबर और हज़रत क़ासिम।
दसवी मुहर्रम को यज़ीद के सिपाहियों ने तीन शहीदों के सिर काट कर इमाम हुसैन की तरफ फेंकाः अब्दुल्लाह बिन उमैर कलबी, उमर बिन जनादा , आस बिन अबी शबीब शाकेरी।
दसवी मुहर्रम को 3 लोगों को यज़ीदी सिपाहियों ने टुकड़े – टुकड़े कर दियाः हज़रत अली अकबर, हज़रत अब्बास और अब्दुर्रहमान बिन उमैर
कर्बला के 9 शहीदों की माओं ने अपनी आंख से अपने बच्चों को शहीद होते देखा
कर्बला में 5 नाबालिग बच्चों को शहीद किया गया। अब्दुल्लाह इब्ने हुसैन, अब्दुल्लाह बिन हसन, मुहम्मद बिन अबी सईद बिन अकील, कासिम बिन हसन, अम्र बिन जुनादा अन्सारी
कर्बला में शहीद होने वाले 5 लोग पैग़म्बरे इस्लाम के सहाबी थेः अनस बिन हर्स काहेली, हबीब इब्ने मज़ाहिर, मुस्लिम बिन औसजा, हानी बिन उरवा और अब्दुल्लाह बिन बक़तर उमैरी
दसवी मुहर्रम को इमाम हुसैन के 2 साथियों को गिरफ्तार करने के बाद शहीद किया गयाः सवार बिन मुनइम और मौक़े बिन समामा सैदावी।
कर्बला में 4 लोग इमाम हुसैन की शहादत के बाद शहीद किये गयेः सअद बिन हर्स, उनके भाई अबू अलखनूफ, सुवैद बिन अबी मुताअ और मुहम्मद बिन अबी सअद बिन अक़ील, सुवैद बिन अबी मुताअ घायल होकर बेहोश हो गये तो, होश आया तो इमाम शहीद हो चुके थे, यह देख कर उन्होंने सिपाहियों पर हमला कर दिया और शहीद हो गये। सअद बिन हर्स, उनके भाई अबू अलखनूफ यज़ीदी सिपाही थे, इमाम हुसैन की शहादत देख कर उनसे बर्दाश्त न हुआ और तौबा करके यज़ीदी सिपाहियों पर हमला कर दिया और शहीद हो गये। मुहम्मद बिन अबी सअद बच्चे थे इमाम हुसैन की शहादत के बाद जब बीबियां रोने लगीं तो वह खेमे के दरवाज़े पर खड़े हो गये और एक यज़ीदी सिपाही ने उन्हें शहीद कर दिया।
कर्बला के 7 शहीद अपने बाप के सामने शहीद हुए।
कर्बला में 5 महिलाओं ने खैमों से निकल कर दुश्मनों पर हमला किया और उन्हें बुरा भला कहा।
कर्बला में शहीद होने वाले महिला, अदुल्लाह बिन उमैर कलबी की पत्नी और वहब की मां थीं।
आबिस बिन शबीब, को यज़ीदी सिपाहियों ने पत्थर मार – मार कर शहीद किया।
नाफे बिन हिलाह को कूफियों ने पकड़ लिया और बंदी बनाने के बाद शहीद कर दिया।
इमाम हुसैन के हाथों मारे जाने वाले यज़ीदी सिपाहियों की तादाद 1800 से 1950 तक बतायी गयी है।
बनी हाशिम के पहले शहीद हज़रत अली अकबर
सहाबियों में पहले शहीद मुस्लिम बिन औसजा
उबैदुल्लाह हुर जाफी को इमाम हुसैन की क़ब्र का पहला ज़ायर कहा जाता है।
पहली बार अब्बासी शासन काल में हारुन रशीद के आदेश पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र का निशान मिटा दिया गया और वहां की ज़मीन की जुताई कर दी गयी।
मामून के ज़माने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र पर उनका रौज़ा बनाया गया।
अब्बासी खलीफा, मुतवक्किल के काल में इमाम हुसैन की क़ब्र और आस – पास के घरों को ध्वस्त कर दिया गया और वहां की ज़मीन की जुताई करा दी गयी और फिर नदी का पानी बहा दिया गया लेकिन क़ब्र पर पानी नहीं चढ़ा। इमाम हुसैन के रौज़े को तबाह करने की ज़िम्मेदारी , नये नये मुसलमान बने इब्राहीम दीज़ज नाम के यहूदी को दी गयी थी।
बसरा और कूफे के लोगों ने फिर से रौज़ा बनाया लेकिन सन 247 हिजरी में मुतवक्किल ने फिर से रौज़ा ध्वस्त कराके जुताई करा दी लेकिन उसके बेटे मुन्तसिर के दौर में रौज़ा दोबारा बनाया गया।

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