विलायत ए अली की वसीयत

हज़रते अम्मार बिन यासिर रदिअल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फरमाया : जो मुझ पर ईमान लाया और मेरी तस्दीक़ की उसे मैं विलायत ए अली की वसीयत करता हूँ, जिसने उसे (अली को) वली जाना और मुझे वली जाना उसने अल्लाह को वली जाना और जिसने अली से मोहब्बत की उसने मुझसे मोहब्बत की और जिसने मुझसे मोहब्बत की उसने अल्लाह से मोहब्बत की और जिसने अली से बुग्ज़ (दुश्मनी) रखा उसने मुझसे बुग्ज़ (दुश्मनी) रखा और जिसने मुझसे बुग्ज़ रखा उसने अल्लाह से बुग्ज़ (दुश्मनी) रखा

हवाला 📒
1- हैसमी मजमुअज़्ज़वाइद 9:108,109
2- इब्ने असाकिर तारीख़ दमिश्क़ अल कबीर 45:181,182
3- हिसाम अल दीन हिंदी कंज़ुल अल अमाल 11:611 रक़म 32958

अल्लाह उस का वली हे दोस्त हे ज़िसका अली वली है
ओर ज़िसने अली को वली नहीं माना .वो सारी ज़िन्दगी हज़ करे उमराह करे तोहीद बताये दर्श करता फिरे दाड़ी रख ले तबलिग करे मस्जीद बानये सब करता फिरे ..
तो फिर हुक्म होगा तुमहे पता नहीं क्या तुम ने सूना नहीं मेरे मुस्तुफा का एलान गदिर ए खुम के मुकाम पर रिसालत से निसबत उस को है ज़िसकी निसबत विलायत ए अली से है ओर तोहीद को भी निसबत उस से है ज़िसकी निसबत विलायत ए अली से हे ज़ो अली का नहीं वो किसी का नहीं ज़िसका मुर्तुजा नहीं उसका मुस्तफा नहीं ओर ज़िसका मुस्तुफा नहीं उसका तो खुदा भी नहीं …

😘सलल्लाहो अलेही वा आलेही वस्सलम🙇🏻

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