इस्लाम और मानवाधिकार

#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 45

जनसभा के आयोजन का अधिकार पहली पीढ़ी के मानवाधिकार के सबसे अहम अधिकारों में है कि जिसे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न दस्तावतेज़ों में नागरिक व राजनैतिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी है।

यह अधिकार लोगों को एक साथ इकट्ठा होने अपने संयुक्त हितों पर चर्चा करने, उसे बेहतर से बहेतर बनाने और उसकी रक्षा करने के लायक़ बनाता है। इस तरह की जनसभा के आयोजन की आज़ादी का उद्देश्य राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, व्यवसायिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सहित दूसरे क्षेत्रों में संयुक्त हितों की प्राप्ति है।

जनसभा ऐसे लोगों के जमघट को कहते हैं जहां लोग किसी निर्धारित समय पर किसी विशेष स्थान पर थोड़े समय के लिए इकट्ठा होते हैं ताकि सामाजिक व राजनैतिक समस्याओं को पेश और संयुक्त हितों की रक्षा करें। जब यह जनसभा सरकार या जनता का ध्यान खींचने के लिए सड़कों पर आयोजित होती है तो उसे प्रदर्शन कहा जाता है।

जनसभा के आयोजन की आज़ादी मूल आज़ादी में से है। इस आज़ादी का अर्थ है लोग शांतिपूर्ण ढंग से एक जगह इकट्ठा हों, एक दूसरे के विचार से लाभ उठाएं और उनके इकट्ठा होने पर किसी तरह की रुकावट न हो।

जनसभा व प्रदर्शन के आयोजन की आज़ादी प्रजातंत्र के प्रतीकों में से है कि जिसके ज़रिए जनता सीधे तौर पर अपनी बात सरकार को पहुंचाती है। कभी मुमकिन है समाज के लोगों की आम आज़ादी व अधिकार के व्यवहारिक होने में रुकावट पैदा हो। ऐसी स्थिति में लोगों का इकट्ठा होना और आपस में सहानुभूति उन्हें जनसभा के ज़रिए यह शक्ति प्रदान करती है कि वे सरकार और आम लोगों का ध्यान अपनी मांग की ओर खींचे।

इस आधार पर जनसभा की आज़ादी का अर्थ यह है कि हर व्यक्ति को यह अधिकार हासिल है कि वह अपने कुछ दृष्टिकोण को बयान करने के लिए किसी निश्चित स्थान व समय पर उन लोगों के साथ इकट्ठा हो जो उसके विचार से सहमत हों। ऐसी जनसभाओं में भाषण, बैठक, कॉन्फ़्रेंस या शास्त्रार्थ भी होता है और आम अनुशंसाओं व नियमों के साथ एक घोषणापत्र से संपन्न होती है।

जनसभाओं का आयोजन अस्थायी होता है और जब उनमें शामिल लोग अपने विचार व्यक्त कर लेते हैं तो एक दूसरे से अलग हो जाते हैं। इसी प्रकार जनसभाएं लोगों के विचार जानने के उद्देश्य से पूर्व सूचना के साथ आयोजित होती हैं। इस प्रकार की सभाओं में विशेष प्रकार की व्यवस्था पायी जाती है जो दूसरों से इसे भिन्न बनाती है।

जनसभा के आयोजन के अधिकार का स्वरूप यह है कि यह एक व्यक्तिगत अधिकार है न कि सामूहिक या गुट का अधिकार । हालांकि इस अधिकार को लागू करने में अनेक लोग एक दूसरे के साथ सहभागी हो सकते हैं और किसी गुट का गठन कर सकते हैं लेकिन इसके साथ ही यह चीज़ इसके सदस्यों को इस अधिकार से लाभ उठाने से नहीं रोक सकती। इस बिन्दु का उल्लेख ज़रूरी है कि जनसभा के आयोजन से अभिप्राय यह है कि यह, लोगों को शांतिपूर्ण जनसभा के आयोजन का अधिकार देता है। इस अधिकार में वे जनसभाएं शामिल नहीं हैं जो हिंसक लक्ष्य के साथ आयोजित होती हैं।

जनसभा के अधिकार को मानवाधिकार के अनेक स्रोतों में मान्यता दी गयी है। इन महत्वपूर्ण स्रोतों में मानवाधिकार के प्रतिज्ञापत्र व दस्तावेज़ शामिल हैं। मानवाधिकार के दस्तावेज़ों में जो राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पारित हुए हैं, इस अधिकार को इंसान के अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी और व्यापक स्तर समर्थन किया गया है।

1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र के 20वें अनुच्छेद में आया है, “हर व्यक्ति को शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए संगठन व सोसाइटी के गठन का अधिकार है।”

16 दिसंबर 1966 में पारित अंतर्राष्ट्रीय नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रतिज्ञापत्र के 21वें अनुच्छेद में इस अधिकार की विशेषता में आया है, “शांतिपूर्ण सभाओं के गठन के अधिकार को मान्यता दी जाती है। इस अधिकार के लागू होने में कोई सीमित्ता नहीं है मगर जो क़ानून के तहत एक प्रजातांत्रिक समाज में राष्ट्रीय सुरक्षा, आम सुरक्षा, क़ानून व्यवस्था, या आम नैतिकता या दूसरों के अधिकार व आज़ादी के लिए निर्धारित की गयी हैं।”

मानवाधिकार के क्षेत्रीय दस्तावेज़ों में भी जनसभा के आयोजन के अधिकार को साफ़ तौर पर स्वीकार किया गया है।

इस्लाम ने आरंभ से ही इंसान की मुक्ति के लिए कोशिश की और मानव समाज की सबसे जटिल समस्या से सबसे अच्छे ढंग से निपटा और इस पुरानी बीमारी के उपचार के लिए उचित व आनुक्रमिक हल पेश किया। इस्लाम ने अपने उदय के आरंभ में न्याय व मानवीय दानशीलता और भाईचारे व समानता के सिद्धांत को आधार बनाकर नई मानवीय व्यवस्था की बुनियाद रखी, इंसान को मुक्ति दिलाने की कोशिश की, इंसान को कंघी के सभी दांतो की तरह बराबर माना, जातीय व क़बायली पहचान को नकारा, इंसान को लिंग व जाति के बंधन से निकाल कर एक मानवीय प्रवृत्ति का स्वामी माना, सभी इंसान की मिट्टी से पैदाइश को मद्देनज़र रखा और एक पर दूसरे की वरीयता का आधार ईश्वर से डर को बताया। शरीर व विचार की आज़ादी का उपहार दिया। मशविरे के सांचे में इंसानी भागीदारी को इस्लामी सरकार में राजनैतिक ढांचे का मुख्य सिद्धांत क़रार दिया। विभिन्न मंचों पर व्यक्तिगत व सार्वजनिक आज़ादी दी सिवाए कुछ स्थान के जहां आज़ादी मानवीय मार्यादा या दूसरों के अधिकार से टकराती हो।

जनसभा का अधिकार मौजूदा सरकारों से संबंधित नहीं है। बल्कि कुछ संस्कार इस्लाम में शुरु से थे और हैं जैसे जुमे की नमाज़ कि जिसका उपासना के साथ राजनैतिक व सामाजिक आयाम भी है। इसी तरह हज और धार्मिक सभा का आयोजन भी इस्लाम के आरंभ से रहा है। दूसरी ओर इस्लामी सरकार के विरोधियों का भी सम्मान होता था और उनके ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार के अतिक्रमण को रोका जाता था।

इस संदर्भ में शहीद मुतह्हरी कहते हैं, “आपने इतिहास में कहां देखा होगा कि किसी राष्ट्र में सभी लोगों में धार्मिक भावना हो, ग़ैर धार्मिक लोगों को इस हद तक आज़ादी दी जाए कि वे मस्जिदुन नबी या मक्के में बैठें और जिस तरह की बात करना चाहें करें, ईश्वर का इंकार करें, पैग़म्बर को न मानें लेकिन इन सबके बावजूद धर्म के अनुयायी उनके साथ पूरे सम्मान के साथ व्यवहार करें।”

नागरिकों की विभिन्न प्रकार की आज़ादी व अधिकार से संपन्नता निरंकुश नहीं है बल्कि इसके साथ कुछ बिन्दु हैं जिन पर अमल ज़रूरी है। एक व्यक्ति अपनी आज़ादी के साथ साथ दूसरे लोगों की आज़ादी व अधिकार पर अतिक्रमण नहीं कर सकता। इसी प्रकार उसे ऐसे काम से बचना चाहिए जिससे आम सुरक्षा ख़तरे में पड़े या अराजकता फैले। इस लिए मानवाधिकार के मानदंड के आधार पर जनसभा के आयोजन के अधिकार के लिए भी कुछ शर्तें निर्धारित हो सकती हैं। जैसे आम सुरक्षा व्यवस्था व स्वास्थ्य और आम नैतिक सिद्धांतों के सामने मौजूद ख़तरे के मद्देनज़र कुछ प्रकार की जनसभा के आयोजन को रोका जा सकता है लेकिन इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि मानवाधिकार के मानदंड के पीछे अस्ल भावना जनसभा के आयोजन की आज़ादी का समर्थन करती है और क़ानून की ओर से कुछ शर्तें एक अपवाद की हैसियत रखती हैं। कुछ शर्तें या सीमित्ताएं एक प्रजातांत्रिक समाज के तक़ाज़ों के तहत लगायी जाती हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि क़ानूनी व तार्किक सीमित्ताएं आम नागरिकों के हितों के मद्देनज़र लगायी जाती हैं न कि सरकार के हित में। जो चीज़ एक जनसभा के आयोजन की आज़ादी को सीमित कर सकती है वह इसके आयोजन की मांग करने वालों या अन्य नागरिकों के स्वास्थ्य का ख़तरे में पड़ना है न सरकार के आलोचना का पात्र बनने का डर।

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