Makhdoom Jahaniyan Jahangasht apne malfuzaat ke aaine me (मख़दूम जहानियाँ जहाँगश्त अपने मल्फ़ूज़ात के आईने में )

मख़दूम जहानियाँ सय्यद जलाल उद्दीन जहाँगश्त बुख़ारी का अस्ल नाम हुसैन था। पाकिस्तान के उच इलाक़ा में 707 हिज्री मुताबिक़ 1307 ईसवी में शब-ए-बरात की रात में पैदा हुए । ये हज़रत जलालउद्दीन सुर्ख़ पोश बुख़ारी के पोते और सय्यद अहमद कबीर के साहिब-ज़ादे थे।

उन्होंने इब्तिदाई ता’लीम अपने आबाई वतन उच में हासिल की और नौ-उमरी में ही अपने चचा सय्यद सदरुद्दीन से बैअ’त हो गए। आ’लम-ए-जवानी में ये मुल्तान तशरीफ़ ले गए और वहाँ  उन्होंने  अबुल-फ़त्ह रुकनुद्दीन सुह्रवर्दी की निगरानी में उलूम-ए-ज़ाहिरी और बातिनी का दर्स लेना शुरू कर दिया। जामिउल-उलूम में उन्होंने बा’ज़ मौक़ों पर अपने असातिज़ा का ज़िक्र फ़रमाया है और उस में उच के क़ाज़ी बहाउद्दीन का ज़िक्र भी किया हैं जिनसे उन्होंने इब्तिदाई ता’लीम हासिल की थी। अबुल-फ़त्ह रुकनुद्दीन ने अपने पोते  शैख़ मूसा और मौलाना मजदुद्दीन को बहाउद्दीन के इंतिक़ाल के बा’द उनका उस्ताद मुक़र्रर किया । हिदाया का दर्स उन्होंने मौलाना मजदुद्दीन से ही हासिल किया था।

उनकी ज़िंदगी का ज़्यादा-तर हिस्सा हुसूल-ए-इल्म और सैर-ओ-सियाहत में गुज़रा। मक्का मुकर्रमा में क़ियाम के दौरान उन्होंने बहुत सा वक़्त इमाम अबदुल्लाह याफ़ई की सोहबत में गुज़ारा उन्होंने ज़माना-ए-तालिब-इल्मी  में हदीस और  तसव्वुफ़ की जो किताबें मुल्तान और उच में पढ़ी थीं मक्का और मदीना में क़ियाम के दौरान उन सारे उलूम की तज्दीद की ख़ातिर दुबारा दर्स लिया और उनमें सनद हासिल किया। अद्दुर्रुल-मंज़ूम के मुताले’ से मा’लूम होता है कि मख़दूम जहानियाँ ने हिजाज़ में सहीह-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम, मुवत्ता इमाम मालिक, जामे’-ए-तिरमिज़ी, मुस्नद अहमद बिन हंबल, सुनन-ए-बैहक़ी और अल-मुस्तद्रक का गहरा मुतालेआ’ किया था। उन्होंने शहाबुद्दीन सुह्रवर्दी की अ’वारिफ़ु-लमआ’रिफ़ हरम-ए-नबवी में शैख़ अबदुल्लाह मतरी से पढ़ी। मख़दूम जहानियाँ फ़रमाते हैं कि अ’वारिफ़ु-लमआ’रिफ़ का जो नुस्ख़ा उनके ज़ेर-ए-मुतालिआ’ था वो शैख़ुश-शुयूख़ की नज़र से भी गुज़रा था। हरमैन-ए-शरीफ़ैन के क़ियाम के दौरान उन्हें ये मा’लूम हुआ कि इराक़ के एक गावँ में शहाबुद्दीन सुह्रवर्दी के एक ख़लीफ़ा  शैख़ महमूद तस्तरी मुक़ीम हैं और उन्होंने अ’वारिफ़ु-लमआ’रिफ़ शैख़ुश-शुयूख़ से म्जलिस दर मज्लिस पढ़ी थी । उन्होंने फ़ौरन उस गांव के सफ़र का इंतिज़ाम किया और जानिब-ए-मंज़िल गाम-ज़न हो गए और उनकी ख़िदमत-ए-मुबारका में हाज़िर हो कर अ’वारिफ़ुल-मआ’रिफ़ को लफ़्ज़न लफ़्ज़न उनसे सुना और उस की तश्रीह-ओ- तब्सिरा से भी मुस्तफ़ीज़ हुए। मख़दूम जहानियाँ फ़रमाते हैं कि उस वक़्त शैख़ महमूद तस्तरी की उम्र 132 साल थी और उनकी सेहत का आ’लम ये था कि वो अ’सा की मदद से थोड़ा बहुत चल फिर लेते थे।

मख़दूम जहानियाँ ने कुछ अ’र्सा दिल्ली में हज़रत शैख़ नसीरुद्दीन चिराग़  दिल्ली की ख़िदमत में भी गुज़ारा और उनकी निगरानी में मनाज़िल-ए-सुलूक तय किए। हज़रत मख़दूम के दिल्ली आने का ग़रज़ बादशाह-ए-वक़्त से मिलने का होता था और इस वसीले से वो हज़रत शैख़ नसीरुद्दीन चिराग़ दिल्ली से मुलाक़ात का शरफ़ भी हासिल कर लेते और उनकी मजालिस की ज़ीनत भी बनते थे। सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ को मख़दूम जहानियां से बहुत अ’क़ीदत थी जब ये दिल्ली का रुख़ करते  तो सुल्तान फ़िरोज़ शाह उनके हालात-ए-सफ़र का जायज़ा अपने दरबारियों से लेते रहते और जब आप दिल्ली पहुंचने वाले होते तो सुल्तान फ़िरोज़ शाह अपने लश्कर के साथ शहर से बाहर निकल कर उनका इस्तिक़बाल  करता और बड़ी इज़्ज़त और अ’क़ीदत के साथ उन्हें शहर में लाता। मख़दूम  साहिब सात से दस दिन के वक़्फ़े से सुल्तान से मिलने जाते; रास्ते में ज़रूरत-मंद अपनी अ’र्ज़ीयां उनके पालकी में डाल देते और ये बादशाह से मुलाक़ात के वक़्त सलाम-ओ-दुआ’ के बा’द सबसे पहले तमाम अ’र्ज़ियाँ बादशाह के सामने रख देते और जब तक सारे अ’र्ज़ियों के जाइज़ मुतालबात पूरे ना हो जाते मख़दूम जहानियाँ सुल्तान से मुलाक़ात की कोई ग़रज़ पेश ना करते।
शाही ख़ानदान से उनके गहरे मरासिम थे और हर एक छोटे बड़े, उमरा वुज़रा और शहज़ादे उनकी ता’ज़ीम बजा लाते थे। एक रोज़ शहज़ादा महमूद ख़ान  मख़दूम जहानियाँ की ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो उन्होंने उसे टोपी पहनाई और कुछ तबर्रुक दिया और रुख़्सती के वक़्त फ़रमाया कि सुल्तान को उनका सलाम पहुंचाए। दो रोज़ बा’द शहज़ादा ज़फ़र ख़ान, उनका बेटा, शहज़ादा तुग़लक़ शाह और चंद अराकीन-ए-सल्तनत सुल्तान का पैग़ाम लेकर मख़दूम जहानियाँ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उनसे ये इल्तिजा की कि सुल्तान की ये ख़्वाहिश है कि जनाब शाही महल में तशरीफ़ फ़रमाएँ। मख़दूम जहानियाँ उसी वक़्त उनके साथ चलने को तैयार हो गए। शहज़ादा तुग़लक़ शाह ने उनका हाथ पकड़ कर उनको पालकी में सवार किया और शाही महल में लाए। क़ियाम के दौरान एक दिन सुल्तान फ़िरोज़ शाह का पोता शहज़ादा मुबारक ख़ान मख़दूम जहानियाँ की ख़िदमत में हाज़िर हुआ । उस के सर पर एक ना-मशरूअ’ टोपी थी ।  मख़दूम जहानियाँ ने फ़ौरन ए’तराज़ किया । इस नसीहत से ये पता चलता है कि मख़दूम जहानियाँ बड़े से बड़े शख़्स के सामने भी अम्र बिल-मा’रुफ़ और नह्-य अ’निल मुन्कर से नहीं चूकते थे।

जामि-उल-उलूम के मुताबिक़ एक मर्तबा मख़दूम जहानियाँ अपने मुरीदीन को  ख़िताब कर रहे थे उस वक़्त उन्होंने अपनी अ’क़ीदत पर बात की और कहा कि उनके आबा-ओ-अज्दाद हनफ़ी-उल-मसलक थे ।

जहाँ तक मज्लिस-ए-समाअ’ की बात है तो उनका अ’क़ीदा था चार इमाम में से हर एक के यहाँ सिवाए निकाह की मज्लिस के दफ़ बजाना हराम है। इसी तरह जंग और क़ाफ़िले की रवानगी के वक़्त तबल बजाना जाइज़ है इन दो मौक़ों के अ’लावा तबल बजाना जाइज़ नहीं है। जामिउल-उलूम के मुरत्तिब तहरीर  फ़रमाते हैं कि एक शख़्स ने मख़दूम साहिब की मौजूदगी में नय बजाना शुरू किया तो मौसूफ़ ने उस से फ़रमाया कि ये फ़े’ल जाइज़ नहीं है। इसी तरह मख़दूम जहानियाँ गाना सुनना जाइज़ नहीं समझते थे। सय्यद अ’लाउद्दीन तहरीर फ़रमाते हैं कि मख़दूम जहानियाँ बग़ैर मज़ामीर के क़व्वाली सुनने के क़ाइल थे और कभी कभी सुन भी लिया करते थे।

ख़ज़ाना-ए-जवाहर-ए-जलालिया में मख़दूम जहानियाँ फ़रमाते हैं कि जो सुफ़िया समाअ’ के क़ाइल हैं उन्होंने उस के लिए बड़ी बड़ी शराइत आ’इद की हैं। जिस तरह नमाज़ बे-वक़्त और बे-वज़ू, रोज़ा बे-ईमसाक, औरत बे-निकाह, ज़राअ’त  बग़ैर तुख़्म, दरख़्त बे-मेवा, ख़ाना बे-दर और मुर्ग़ बे-पर नहीं होते ऐसे ही समाअ’ बग़ैर शराइत नहीं होती ।

अगर कोई शख़्स अपनी उम्र का कोई हिस्सा समाअ’ में सर्फ़  करना चाहे तो उसे चाहिए कि पहले तीन दिन तय का रोज़ा रखे या’नी इस दौरान में ना कुछ खाए और ना पिए। अलबत्ता वो एक क़तरा पानी के साथ रोज़ा इफ़्तार कर सकता है। इन अय्याम में वो किसी के साथ बात ना करे और ख़ल्वत में बैठ कर मुराक़बा  में मशग़ूल रहे। मख़दूम जहानियाँ फ़रमाते हैं कि बा’ज़ बुज़ुर्गों ने साहिब-ए-समाअ’ के लिए पाँच या सात दिन का तय का रोज़ा तज्वीज़ किया है। ये रोज़ा पूरा करने के बा’द वो किसी अ’ज़ीज़ या दरवेश से ग़ज़ल सुने। क़व्वाल किसी हाल में भी ना-आश्ना या बेगाना ना हो। समाअ’ सुनते वक़्त वो अपने दिल में शैतानी वस्वसा ना लाए। समाअ’ का वक़्त बड़ा नाज़ुक होता है। इसलिए बड़ी एहतियात बरतनी चाहिए। अगर समाअ’ में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़िक्र ना हो तो कुदूरत बढ़ने का इमकान होता है। समाअ’ के बाद खाना तनावुल ना करे। खाना पीना अह्ल-ए-ग़फ़लत की आ’दत है। अगर समाअ’ की हाजत हो तो उसे आ’दत ना बनाए बल्कि एक दो या तीन हफ़्ते के बा’द समाअ’ सुने।

इसी तरह मख़दूम जहानियाँ का अ’क़ीदा हजामत बनवाने के मुतअ’ल्लिक़ भी है। जामिउल-उलूम में फ़रमाते हैं कि अगर कोई शख़्स अपने सर पर उस्तुरा फिरवाना चाहे तो उसे चाहिए कि पहले अपनी बीवी से इजाज़त हासिल कर ले। अगर वो शादी-शुदा  ना हो तो अपनी वालिदा से इजाज़त ले ऐसा ना हो कि उस की ये शबीह उस की बीवी या वालिदा को अच्छी ना लगे। इसी तरह ख़ज़ाना-ए-जवाहर-ए-जलालिया में एक जगह हल्क़ (हजामत) करवाने, मूँछें बढ़ाने, नाख़ुन काटने और आईना देखने के मुतअ’ल्लिक़ गुफ़्तुगू करते हुए फ़रमाते हैं कि महलूक़ होना सुन्नत है इस से ग़ुस्ल में शुबहा बाक़ी नहीं रहता। एक अंदाज़े के मुताबिक़ मख़दूम जहानियाँ ने अ’रब-ओ-इराक़ की लगभग चालीस बरस तक सियाहत की थी। इसलिए अपने मुशाहिदे की बुनियाद पर फ़रमाते हैं कि अ’रब-ओ-इराक़ में लोग ज़ुल्फ़ वाले  को मुख़न्नस समझते हैं।अपने मुरीदों को मज़ीद  ताकीद के लिए फ़रमाया कि सबसे पहले शैतान ने ज़ुल्फ़ें रखीं , उस के बा’द क़ौम-ए-लूत ने ये फ़ैशन अपनाया अब ये मुल्हिदों का शिआ’र है।
मख़दूम जहानियाँ का मा’मूल था कि सर्दी में एक-बार और गर्मी के मौसम में सर पर दो बार उस्तुरा फिरवाते थे। सुल्तान फ़िरोज़ तुग़ल्लुक़ ने हजामत बनवाना शुरू कर दिया। शायद उसे उस की तर्ग़ीब दिलाने में मख़दूम जहानियाँ का हाथ था या वो उनकी अ’क़ीदत में ख़ुद हजामत बनवाता था।

मशहूर मोअर्रिख़ शम्सुद्दीन अ’फ़ीफ़ का अपनी तालीफ़ तारीख़-ए-फ़िरोज़ शाही में सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के महलूक़ होने के मुतअ’ल्लिक़ ये जुमला काफ़ी मा’नी-ख़ेज़ है:
तर्जुमा: ज़ाहिर है कि बादशाह को ये तमाम बरकात उलमा-ओ-मशाइख़ की मुहब्बत और पैरवी से हासिल हुईं।
मख़दूम जहानियाँ ने 1384 ईसवी में 77 साल की उम्र में वफ़ात पाई और उनके भाई हज़रत सदरुद्दीन अबुल-फ़ज़्ल मुहम्मद उल-मारूफ़ ब-राजू क़त्ताल उनके सज्जादा-नशीँ हुए। मख़दूम जहानियाँ ने ब-क़ौल हज़रत शाह-आ’लम बुख़ारी 2,01,173 अफ़राद को बैअ’त किया ।उनमें से 12,750 मुरीदों को ख़िलाफ़त अ’ता फ़रमाई ।उनके ख़ुलफ़ा में उनके भाई राजू क़त्ताल के अ’लावा  सय्यद सिकन्दर तिरमिज़ी, शैख़ क़वामउद्दीन अब्बासी लखनवी और अख़ी जमशेद राजगीरी ख़ास तौर पर मा’रूफ़ हैं।

मख़दूम जहानियाँ जहाँ गश्त के मुरीदीन ने उन मल्फ़ूज़ात को तर्तीब दिया जिसमें जामिउल-उलूम, सिराजुल-हिदाया, ख़ज़ाना-ए-जलाली, जवाहर जलाली, मज़हर-ए-जलाली और मनाक़िब-ए-मख़दूम जहानियाँ बहुत अहम हैं।
मल्फ़ूज़ात  क़लम-बंद करने का रिवाज दर-हक़ीक़त  सुफ़िया-ए-किराम के यहाँ ता’लीम-ओ-तर्बीयत एक रस्मी तरीक़ा है। मल्फ़ूज़ात  दो तरह से क़लम-बंद किए जाते हैं। पहला तरीक़ा ये है कि मुरीद मुर्शिद के हर एक वा’ज़ को जो अपने मुरीदों और अपने अ’क़ीदत-मंदों को किया करते थे  उस को क़लम-बंद करते थे लेकिन सभी मुरीद और अक़ीदत-मंद तो मुर्शिद के वा’ज़ को क़लम-बंद नहीं करते बल्कि बग़ौर समाअ’त करते हैं। वा’ज़ के बा’द कोई एक या कुछ मख़सूस  मुरीदीन जिनको अपने मुर्शिद से बे-इंतिहा अ’क़ीदत और मुहब्बत होती है वो अपने मुर्शिद के हर एक लफ़्ज़ और बात को ज़हन-नशीँ कर लेते हैं और उस को क़लम-बंद कर लेते हैं। कभी कभी मुरीद अपने लिखे हुए  मल्फ़ूज़ को अपने मुर्शिद से इस्लाह  भी कराते हैं। जिस तरह ख़्वाजा गेसू दराज़ के मल्फ़ूज़ात  जवामेउल-कलिम को तर्तीब देने के बा’द गेसू दराज़ के साहिबज़ादे सय्यद मुहम्मद अकबर हुसैनी ने इस्लाह के लिए अपने वालिद के सिपुर्द किया। मल्फ़ूज़ात  को पढ़ने के बा’द गेसू दराज़ ने फ़रमाया इस में किसी तरह की इस्लाह की ज़रूरत नहीं है अगर मैं भी लिखता तो यही लिखता मज्लिस के ए’तबार से मल्फ़ूज़ात  को तर्तीब देते ।दूसरा तरीक़ा-ए-कार यह है कि मुरीद अपने मुर्शिद के पास बैठ कर कोई उनवान शुरू कर देते हैं और शैख़ उस उनवान पर अपना इज़हार-ए-ख़याल करने लगते हैं। कुछ ज़हीन और ज़ी-इल्म मुरीद इस गुफ़्तुगू को नक़्ल कर लेते, बा’ज़ मुरीद इस तहरीर को अपने मुर्शिद को दिखा लेते हैं। इस तरह मल्फ़ूज़ात  की इस्लाह भी हो जाती है और इस तहरीर को दर्जा-ए- इस्तिनाद भी हासिल हो जाता है। हज़रत मख़दूम जहानियाँ जहाँ गशत बड़े  साहिब-ए-इल्म-ओ-फ़ज़्ल सूफ़ी शैख़ थे। इस्लामी उलूम में उनको मुमताज़ मक़ाम हासिल था। उनके मल्फ़ूज़ात मज़हब-ओ-तसव्वुफ़ के दाइरातुल-मआ’रिफ़ का दर्जा रखते हैं। हज़रत मख़दूम के मल्फ़ूज़ात  का ज़िक्र कुछ इस तरह है।

जामिउल-उलूम: हज़रत सय्यद जलालउद्दीन मख़दूम के मल्फ़ूज़ात  का उर्दू तर्जुमा अद्दुर्रुल-मंज़ूम के नाम से 1890 में दिल्ली से शाऐ’ हुआ। इस के उर्दू तर्जुमा के फ़राइज़ को मशहूर आलिम मौलवी ज़ुल्फ़क़ार अहमद सारंगपूरी ने अंजाम दिए हैं। हज़रत सय्यद के मुरीद अबदुल्लाह अ’लाउद्दीन बिन सा’द हुसैनी इब्न-ए-अशरफ़ देहलवी 1275 में हज़रत मख़दूम के मुरीद हुए उनकी ख़्वाहिश थी कि वो अपने मुर्शिद से मुलाक़ात की ग़रज़ से उच का सफ़र करें और इत्तिफ़ाक़ ऐसा हुआ कि सुल्तान फ़िरोज़ के अह्द1379 में अपनी वफ़ात से आठ साल क़ब्ल सय्यद मख़दूम साहिब दिल्ली तशरीफ़ लाए और तक़रीबन हर दो साल पर वो दिल्ली तशरीफ़ लाते रहते थे। 1379 ईसवी में जब ये दिल्ली तशरीफ़ लाए उस वक़्त सुल्तान फ़िरोज़ शाह एक शाही मुहिम के तहत सुमाना में मुक़ीम था इसलिए सय्यद मख़दूम को तक़रीबन दस महीने के लिए दिल्ली में क़ियाम करना पड़ा इस मौक़ा को ग़नीमत जान कर  मख़दूम जहानियाँ हज़रत चिराग़ दिल्ली के यहाँ जाने लगे।ठीक इसी तरह अ’लाउद्दीन ने भी इस मौक़ा को ग़नीमत समझा और शब-ओ-रोज़ हज़रत  मख़दूम की ख़िदमत में रहे और 28 रबीउल-अव्वल से 17 मुहर्रम 1379-80 ईसवी तक ब-क़ैद-ए-तारीख़-ओ-वक़्त तक़रीबन 9 महीना सय्यद मख़दूम  के मल्फ़ूज़ात  को जम्अ’ करते रहे। सय्यद मख़दूम को इस बात का इल्म हो गया था कि अ’लाउद्दीन उनके पंद व नसाइह और वा’ज़ को क़लम-बंद कर रहे हैं इसलिए जब कभी वा’ज़ फ़रमाते तो उनको ज़रूर मुख़ातिब करते कि ऐ अ’लाउद्दीनन इस तक़रीर को क़लम-बंद कर लो। अगर कभी सय्यद मख़दूम  के तक़ारीर में कोई भी बात समझने में दुशवारी होती तो वो उनकी क़ियाम-गाह पर जा कर उस मसले को हल कर लेते। ये रवैय्या सिर्फ़ अ’लाउद्दीन अ’ली ही नहीं अपनाते थे बल्कि दूसरे मुरीदीन भी अपने मसाइल के हल के लिए उनके घर पर तशरीफ़ ले जाते और वो उनकी ख़ातिर-ख़्वाह मदद करते।
इन मल्फ़ूज़ात  में हम-अ’स्र वाक़िआ’त और शख़्सियतों के अक्सर हवाले आए हैं। जामिउल-उलूम में क़ुव्वतुल-क़ुलूब, अ’क़ाइद-ए-नफ़्सी, शर्ह-ए-औराद-ए-कबीर, जामिउल-फ़तावा, फ़तावा-ए-कामिल, जामेअ’-ए-सग़ीर, शर्ह-ए-अ’ज़ीज़ी, किताब-ए-काफ़ी, किताब-ए-मुत्तफ़िक़, शर्ह-ए-नवद व नोह, फ़िक़्ह-ए-अकबर, मिश्कातुल-मसाबीह, मशारिक़ुल-अनवार, अ’वारिफ़ुल-मआ’रिफ़, शर्ह-ए-कबीर, चहल रस्म, रिसाला-ए-मक्कीया और क़सीदतुल उम्मीया की तो इस क़दर तश्रीहात हैं कि अद्दुर्रुल-मंज़ूम से ही इन किताबों की मुख़्तसर शर्ह तैयार की जा सकती हैं।
जामिउल-उलूम का उर्दू तर्जुमा अद्दुर्रुल-मंज़ूम फ़ी तर्जुमाति मल्फ़ूज़िल मख़दूम के नाम से दो जिल्दों पर मुश्तमिल1891 में मत्बा’ अंसारी दिल्ली से पहली जिल्द शाए’ हुई दूसरी जिल्द एक साल बा’द शाए’ हुई। इस तर्जुमा का क़लमी नुस्ख़ा किसी ने नवाब सिद्दीक़ हसन ख़ान को नज़्र किया , नवाब साहिब ने इस नुस्ख़ा को मौलवी ज़ुलफ़क़ार अहमद को दिखाया और उस की तबाअ’त के लिए उनको आमादा किया और उस की तल्ख़ीस शाए’ करने का ख़्याल भी ज़ाहिर किया लेकिन नवाब साहिब की नागहानी वफ़ात के बाइस उस की तबाअ’त ना हो सकी लेकिन उस के तब्अ’ की ज़िम्मेदारी उनके बड़े फ़र्ज़ंद नवाब नूरुल-हसन ने अपने ज़िम्मा ली और इस किताब का उर्दू तर्जुमा शाए’  किया और इस का उर्दू तर्जुमा मौलवी ज़ुल्फ़क़ार अहमद ने किया।अद्दुर्रुल-मंज़ूम की दोनों जिल्दें 871 सफ़हात पर मुश्तमिल हैं। इस में तसव्वुफ़ के हक़ायक़-ओ-मआ’रिफ़ और ब-कस्रत शरई, फ़िक़ही, अख़लाक़ी और मुआ’शरती मसाइल का बयान है। जामिउल-उलूम मुख़्तलिफ़ मौज़ूआ’त हदीस व तफ़्सीर-ओ-फ़िक़्ह और तसव्वुफ़ पर मुश्तमिल है। राक़िम ने बा’ज़ जगह एक दिन के कई कई इर्शादात को रक़म किया है और बा’ज़ अय्याम जिस दिन मुअल्लिफ़ को मुर्शिद की क़दम-बोसी का शरफ़ हासिल नहीं हुआ उन्होंने इस को दर्ज नहीं किया। उन्होंने किसी और मुरीद के नुस्ख़े और उनकी समाअ’त पर इत्मीनान ज़ाहिर नहीं किया। मुअल्लिफ़ ने इस तसनीफ़ में 188 उलूमका मजमूआ क़रार दिया है। लेकिन उनमें बहुत से ऐसे हैं जो इल्म , अख़लाक़ और तसव्वुफ़ के ज़ुमरे में ही आएँगे। मसलन इल्म-ए- सब्र, इल्म-ए-शुक्र, इल्म-ए-ख़ौफ़, इल्म-ए-रजा, इल्म-ए-तवाज़ो’, इल्म-ए- तकब्बुर, इल्म-ए-फ़िराक़-ओ-विसाल वग़ैरा, बा’ज़ अहम उलूम दर्ज ज़ैल हैं ।  इल्म-ए-क़िराअत-ओ-तजवीद, इल्म-ए-तफ़्सीर, इल्म-ए-अहादीस, फ़िक़्ह, उसूल-ए- फ़िक़्ह, इल्म-ए-कलाम, इल्म-ए-मआ’नी, मंतिक़, सर्फ़-ओ-नह्व, इल्म-ए-लुग़त, इल्म-ए-अरूज़, इल्म-ए-हिक्मत, इल्म-ए-तिब्ब, इल्म-ए-नुजूम, इल्म-ए-मुनाज़रा, इल्म-ए-मईशत, इल्म-ए-सुलूक (तौहीद, मा’रिफ़त, मुशाहिदा, मलकूत-ओ-जबरूत) इल्म-ए-दा’वत, इल्म-ए-इज्तिहाद, इल्म-ए-माहियत-ए-बशर (माहियत-ए- जिन-ओ-हैवानात) क़िसस-ओ-हिकायात, इल्म-ए-अ’क़ाइद, (ईमान-ओ-इस्लाम) इल्म-ए-माहियत-ए-फ़राइज़-ओ-नवाफ़िल (माहियत-ए-सौम, तिलात,अम्र-ओ-नह्-य, ज़कात)
अस्ल फ़ारसी जामिउल-उलूम के नुस्ख़ा का आग़ाज़ इस तरह होता है:
मसलकी मसलकुल इरादतुल मख़दूम बि-इरादातिहि…… चहार कुतुब क़िराअत कर्दम यके दर फ़िक़्ह-ए-इल्म-ए-शरीअ’त व  यके इल्म-ए-अहादीस-ए-नबवी व दोउम दर इल्म-ए-सुलूक-ओ-तरीक़त-ओ-हुक़ूक़-ए-पीरी बूद,  हुक़ूक़-ए-उस्तादी नीज़ वाजिब शुद व चंद कुतुब समाअ’ कर्दम।
जामिउल-उलूम का एक ख़ुश-ख़त और बहुत अच्छा नुस्ख़ा उच बुख़ारी के  सज्जादा नशीँ के पास है।
जामिउल-उलूम का एक क़लमी नुस्ख़ा सैंटर्ल लाइब्रेरी हैदराबाद दक्कन (तिलंगाना) में भी है। लेकिन इस नुस्ख़ा पर सन-ए-किताबत दर्ज नहीं है। लेकिन कुछ मुहरें हैं जो नुस्ख़ा के किर्म-ख़ुर्दा होने कि वजह से वाज़िह नहीं हो पा रही है सिर्फ़ एक मुहर पर नवाज़-जंग 1744 ही पढ़ने के क़ाबिल है।
जामिउल-उलूम के दो नुस्खे़ रामपूर रज़ा लाइब्रेरी रामपूर में भी मौजूद हैं। एक नुस्ख़ा कामिल है जिसमें 205 औराक़ हैं जब कि दूसरा नुस्ख़ा नाक़िस है। यहाँ पहले नुस्ख़ा से तरक़ीमा की इबारत नक़्ल की जाती है:
तमाम शुद किताब-ए-जामिउल-उलूम अज़ ज़बान-ए-मख़दूम जहानियां मिन  तालीफ़-ए-अलाउद्दीन चिशती, अल-हसनी रहमतुल्लाहि अलैहिव अला जमी इल-मोमिनीन अलअहया मिनहुम वल-अ मवात
जामिउल-उलूम का एक नुस्ख़ा एशियाटिक सोसाइटी आफ़ बंगाल (कोलकाता) में भी है जो अच्छी हालत में है। बहुत साफ़ , जली और नस्तालीक़ ख़त में लिखा हुआ है।ये नुस्ख़ा 1702 में नक़्ल हुआ है।

सिराजुलहिदाया: सय्यद जलालुद्दीन मख़दूम जहानियाँ जहाँ गशत के दूसरे मल्फ़ूज़ात का मजमूआ’ सिराजुलहिदाया  है। जिसे अहमद बरनी ने मुरत्तब किया है। तारीख़-ए-अदब के ए’तबार से इसकी  की बहुत एहमियत है। इस किताब में फ़िरोज़ शाह की मुहिम ठटा का ज़िक्र और हवाला अक्सर मिल जाता है। इन मल्फ़ूज़ात  में फ़िरोज़ शाह, आज़म ख़ाँ, ज़फ़र ख़ाँ और दूसरे उमरा-ए-ज़ी-मर्तबत के मुतअ’ल्लिक़ बहुत अच्छी मा’लूमात हैं। बरनी उस वक़्त सय्यद मख़दूम के हमराह था जब फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ठटा के हुक्मराँ के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहा था और शैख़ के साथ 1371 ईसवी में दिल्ली वापस आया।
सिराजुलहिदाया में  9 बाब हैं:
बाब अव्वल:दर बयान-ए-अहादीस-ए-पैग़ंबर, बाब-ए-दोउम:दर बयान-ए-रिवायत-ए- पीर-ओ-मुरीद गिरिफ़्तन ,फ़वाइद-ए-फ़िक़्ह-ओ-मसाइल-ए-दीनी, बाब-ए-सेउम:दर बयान-ए-फ़वाइद-ए-अहकाम-ए-शरा’, बाब-ए-चहारुम: दर बयान-ए-अहकामात-ए- लतीफ़ा, बाब-ए-पंजुम: दर बयान-ए-क़िससुल अंबिया, बाब-ए-शशुम:दर बयान-ए- हफ़्ताद-ओ-सिह मिल्लत, गिरोह-ए-बनी-आदम, बाब-ए- हफ़्तुम:दर बयान-ए- अहादीस-ए-मसाबीह-ओ-फ़ज़ाइल-ए-अहादीस, बाब-ए-हशतुम:दर बयान-ए-अशआ’र-ए-अ’रबी-ओ-नज़्म फ़ारसी व फ़ज़ाइल-ए- सूरा-ए-फ़ातिहा, बाब-ए-नहम:बर हुक्म-ए- हदीस-ए-पैग़ंबर व  दर बयान-ए-मसाइल-ए-मुतफ़र्रिक़ा
रामपूर रज़ा लाइब्रेरी में सिराजुलहिदाया के दो नुस्ख़ा मौजूद हैं। एक नुस्ख़ा 1601 ईसवी में कातिब शहरुल्लाह बिन अहमद बदायूनी ने इस की किताबत की है। इस नुस्ख़ा में मुरत्तिब अहमद बरनी का ख़ुतबा दर्ज है और इसी ख़ुतबा से किताब का आग़ाज़ होता है। इस का दूसरा नुस्ख़ा 1626 ईसवी में नूरुद्दीन सलीम जहाँगीर की शहनशाही के आख़िरी साल में लिखा गया। इस के कातिब मौलाना फ़र्ज़ुल्लाह क़ुरैशी का नाम दर्ज है।रामपूर रज़ा लाइब्रेरी के साबिक़ डायरेक्टर मौलाना अर्शी मरहूम ने अपने एक मकतूब मुअर्रख़ा यकुम मार्च 1961 ईसवी  में सिराजुलहिदाया के मुतअ’ल्लिक़ लिखा है कि हमारी लाइब्रेरी में इस का एक नुस्ख़ा मौजूद है और इस का कोई ख़ास मौज़ूअ’ नहीं बल्कि सिर्फ़ फ़िक़्ह, तसव्वुफ़ वग़ैरा पर मब्नी है
सिराजुलहिदाया का एक क़लमी नुस्ख़ा मुस्लिम यूनीवर्सिटी की मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी के शोबा-ए-मख़तूतात के हबीबगंज कलेक्शन में मौजूद है। इस नुस्ख़ा में तरक़ीमा का वरक़ मौजूद नहीं है।जिस से इस बात का अंदाज़ा  लगाया जा सके कि इस के कातिब का नाम क्या है और उस की सन-ए- किताबत क्या है?
सिराजुलहिदाया का नाक़िस नुस्ख़ा मुहम्मद इक़बाल मुजद्दी (लाहौर) के ज़ाती कुतुब-ख़ाने में भी है।
सिराजुलहिदाया का एक और नुस्ख़ा मुस्लिम यूनीवर्सिटी अलीगढ़ के इस्लामिया इंटर कॉलेज का हदिया शूदा ज़ख़ीरा में मौजूद है। ये नुस्ख़ा नाक़िस और किर्म-ख़ुर्दा है। लेकिन पढ़ने के क़ाबिल है इस के मुतालिआ’ से पता चलता है कि कातिब ने अ’रबी इबारतों को नक़्ल करने में बहुत ग़लतियाँ की हैं । इस नुस्ख़ा का पहला सफ़हा जिसमें हम्द-ओ-ना’त और मुरत्तिब का नाम होना चाहिए और आख़िर का सफ़हा जिसमें तरक़ीमा होता है नहीं है।लेकिन नुस्ख़ा के मुतालिआ’ से ये बात ज़रूर मा’लूम होती है कि ये ग्यारहवीं सदी हिज्री का लिखा हुआ है।

ख़ज़ाना-ए-जलाली: ख़ज़ाना-ए-जलाली का अस्ल नाम ख़ज़ीनतुल-फ़वाएदिल जलालिया है लेकिन मल्फ़ूज़ात  का ये मजमूआ’ ख़ज़ाना-ए-जलाली के नाम से मशहूर है।चूँकि सय्यद मख़दूम का नाम सय्यद जलालुद्दीन है इसी निस्बत से इस का नाम ख़ज़ीनतुल-फ़वाएदिल जलालिया रखा गया था लेकिन इस के नाम को इख़्तिसार के साथ आ’म किया गया।हज़रत सय्यद जलालुद्दीन मख़दूम का ये मजमूआ’ निहायत मशहूर-ओ-मा’रूफ़ है जिसको मख़दूम के मुरीद अहमद अल-मदऊ बिहा बिन हसन बिन महमूद बिन सुलेमान तलबनी ने मुरत्तब किया है। ये उलूम-ओ-मा’रिफ़तत का एक नादिर और बे-बहा ख़ज़ाना है। अख़बारुल-ख़ियार,सियरुल-आरिफ़ीन और ख़ज़ीनतुल- अस्फ़िया वग़ैरा किताबों के इक़्तिबासात और हवालाजात अक्सर मिल जाते हैं। ख़ज़ाना-ए-जलाली में मशारिक़ुल-अनवार, फ़तावा-ए-सिराजी, इरशादुल मुरीदीन, फ़वाइदुलफ़ुवाद, एहयाउल-उलूम, रौनक़ुल- मजालिस, फ़तावा-ए-ज़हीरी, किताब-ए-मुत्तफ़िक़, रिसाला-ए-अमीनुद्दीन गाज़रोनी, क़ुव्वत उल-क़ुलूब, किताब-ए-उम्दा, फ़िक़्ह-ए-अकबर, जामे’-ए-सग़ीर, फ़तावा मसउदी, तर्ग़ीबुस सलात, शर्ह-ए-नवद व नोह नामा (अज़ जलालुद्दीन तबरेज़ी ) औराद-ए-शैख़-ए-कबीर (बहाउद्दीन ज़करीया मुल्तानी) ऐनुल-इल्म, बवाक़ीतुल-मवाक़ीत, दुर्र-ए-मुख़्तार, रौज़तुर रियाहीन (अब्दुल्लाह याफ़ई) रिसाला-ए- मौलाना ज़ियाउद्दीन बरनी, जामिउल-कबीर, सीयरुस-सग़ीर (सरख़सी) फ़तावा-ए- नासिरी, फ़वाइदुस-सालिकीन, मिनहाजुल आ’बिदीन वग़ैरा किताबों के हवाले और इक़्तिबासात मिलते हैं।
इस के मुअल्लिफ़ के बारे में कुछ शुकूक-ओ-शुबहात का अंदेशा मुअल्लिफ़-ए-बह्र-ए-ज़ख़्ख़ार की तहरीर से होता है उन्होंने लिखा है कि इस के मुअल्लिफ़ सय्यद  मख़दूम जहानियाँ के ख़ास मुरीद मौलाना अहमद अल-मदउ ब-भाई याक़ूब बिन हुसैन हैं, मगर उस की दाख़िली शहादतों से पता चलता है कि इस के मुरत्तिब  हज़रत मख़दूम जहानियाँ जहाँ गशत के शायद कोई साहिबज़ादे हैं। चुनांचे ख़िर्क़ा –ए-सुफ़िया-ए-किराम के ज़िम्न में लिखा है।
‘वज़ अम्म-ए-ख़ुद सय्यद सदरुद्दीन बुख़ारी’
और सय्यद सदरुद्दीन मुहम्मद ग़ौस बुख़ारी सय्यद मख़दूम क़य्यूम बुजु़र्गवार थे और सय्यद सदरुद्दीन जो राजू क़त्ताल के नाम से मा’रूफ़ थे आपके भाई का भी नाम था। मगर इन सब के बावजूद उस की कोई पुख़्ता सनद नहीं मिलती कि इन मल्फ़ूज़ात  का मजमूआ’ आपके साहिबज़ादे का मुरत्तिब कर्दा है।
ख़ज़ाना-ए-जलाली का आग़ाज़ इस तरह होता है:
हम्द-ए-बे-हद्द-ओ-सना-ए-बे-अद्द मर साने’-ए-मौजूदात रा व ख़ल्क़-ए- मख़लूक़ात जल जलालुहू-ओ-अम्-म निवालुहू कि ब-गरदानीद उलमा रा हम चूं सितारगाँ कि ब-सबब-ए-इशाँ राह-ए-रास्त याबंद गुमराहाँ, तुह्फ़ा-ए-तहिय्यात बर सय्यद-ए-कायनात मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व बर सहाबा-ए-  किबार व मशाइख़-ए-बुजु़र्गवार कि मुक़्तदायान-ए-अह्ल-ए-दीं व हादियान-ए-राह-ए-यक़ीन अंद
किताब का इख़्तताम इस शे’र पर करते हैं:
अज़ सुख़न चूं सुख़न शवद हासिल
कार कुन कार लब ब-दंदाँ गीर
ख़ज़ाना-ए-जलाली एक मुक़द्दमा सतरह अबवाब पर मुश्तमिल है। इन सभी अबवाब के उन्नान दर्ज ज़ैल हैं:
इल्म, उलमा, ज़िक्र-ए-तौबा, ज़िक्र व अज़कार, ज़िक्र-ए-सलात, ज़िक्र-ए-मौत-ओ-ज़ियारत, ज़िक्र-ए-ज़कात-ओ-सख़ावत, ज़िक्र-ए-सौम-ओ-ए’तिकाफ़, ज़िक्र-ए-हज-ओ-ज़ियारत-ए-मक्का-ओ-मदीना, ज़िक्र-ए-सफ़र-ओ-तिजारत, ज़िक्र अक्ल-ओ-अस्नाफ़, ज़िक्र-ए-निकाह-ओ-तलाक़, ज़िक्र-ए-हुलयतुर रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, ज़िक्र-ए-औलाद-ए-रसूल व अज़वाजिहि, ज़िक्र-ए-फ़ज़ाइल-ए-सहाबा-ओ-अह्ल-ए-बैत रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, ज़िक्र-ए-ता’ज़ीम-ए-विलादत-ओ-आदाब, ज़िक्र-ए-मनाक़िब-ए-औलिया-ओ-मशाइख़, ज़िक्र-ए-मशाइख़ व सुफ़िया।
मल्फ़ूज़ात  के आख़िरी बाब में तिब्ब-ओ-हिक्मत वग़ैरा पर भी मवाद है और आख़िर में बा’ज़ ता’वीज़ के नुक़ूश वग़ैरा मिलते हैं। मसलन हिर्ज़-ए-इबराहीम, रुमूज़ुन-नजात, हिर्ज़-ए-यमानी, सज्दे वग़ैरा।
ख़ज़ाना-ए-जलाली का एक नुस्ख़ा कुतुब-ख़ाना उच  गिलानी में है। ये नुस्ख़ा ईसवी1829 का है और ये नुस्ख़ा सब से आख़िरी क़लमी नुस्ख़ा है । काफ़ी ख़ुश-ख़त नस्तालीक़ ख़त में उम्दा वरक़ पर  है इस के हर एक सफ़हा पर सुतूर की ता’दाद 17 है। उनवान को सुर्ख़ रौशनाई से लिखा गया है। नुस्ख़ा के वरक़ नंबर 2 के बा’द शुरूआती 14 सफ़हा मौजूद नहीं है। कुछ औराक़ ज़ाए’ होने के साथ साथ ये नुस्ख़ा नाक़िसुल-वस्त भी है अबवाब में छटा बाब भी इस नुस्ख़ा में शामिल नहीं है। मख़दूम शम्सुद्दीन सामिन ने ये नुस्ख़ा हाफ़िज़ अताउर रहमान शरर से 1960 ईसवी में ख़रीद कर कुतुब-ख़ाना के ज़ख़ीरा-ए-कुतुब में शामिल किया था।
ख़ज़ाना-ए-जलाली का एक निहायत साफ़, कामिल और ख़ुश-ख़त नुस्ख़ा नौबहार शाह उच बुख़ारी के पास 1960 ईसवी में था। ये नुस्ख़ा 424 सफ़हात पर मुश्तमिल है और सफ़हा पर 17 सुतूर हैं। यह नुस्ख़ा 1849 को पाया-ए-तकमील को पहुंचा। इस नुस्ख़ा में कातिब का नाम दर्ज नहीं है और उन्होंने उस का इख़्तताम मुंदरजा ज़ैल शे’र से किया है।
मन ब-नशिस्तम सर्फ़ कर्दम रोज़गार
मन न-मानम ईं ब-मानद रोज़गार
ख़ज़ाना-ए-जलाली का एक और नाक़िस नुस्ख़ा कुतुब-ख़ाना आसिफ़िया के मौजूदा सेन्टर्ल लाइब्रेरी के नादिर नुस्ख़ों में से एक है। ये नुस्ख़ा इस क़दर किर्म-ख़ुर्दा है कि इस का सन-ए-इशाअत तक मा’लूम ना हो सका क्योंकि ये नुस्ख़ा नाक़िसुल-अव्वल है। इस के इबतिदाई छः अबवाब इस नुस्ख़ा में मौजूद नहीं है। लाइब्रेरी की फ़िहरिस्त-ए-कुतुब में ये फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी के उनवान के तहत दर्ज है अक्सर फ़िक़्ह की किताबों में इस के हवाले मिलते हैं। अह्द–ए-औरंगज़ेब का एक बड़ा काम फ़तावा-ए-आ’लमगीरी का तर्तीब था जिस को औरंगज़ेब ने उलमा की एक मज्लिस  तशकील देकर उस के तर्तीब की ज़िम्मेदारी सौंपी थी उसी अह्द में जब फ़तावा-ए-आ’लमगीरी तर्तीब पा रहा था उसी वक़्त दीदारुन नबी वलद-ए-मौलाना जामी ने एक फ़िक़ही किताब हैरतुल फ़िक़्ह के नाम से तस्नीफ़ की जिसमें ख़ज़ाना-ए-जलाली के हवाला और माख़ज़ कसरत से इस्तिमाल हुए हैं। प्रोफ़ेसर ख़लीक़ अहमद निज़ामी के मुताबिक़ उस का नुस्ख़ा रॉयल एशियाटिक सोसाइटी आफ़ बंगाल में है
सरगोधा , पाकिस्तान में एक ज़ाती कुतुब-ख़ाना में ख़ज़ाना-ए-जलाली का एक नुस्ख़ा मौजूद है। जिसकी किताबत का साल 1623 ईसवी है।
इब्न-ए-ताहिर का नक़्ल किया हुआ ख़ज़ाना-ए-जलाली का एक और नुस्ख़ा मौलाना मुहम्मद अली कमहडी के ज़ाती कुतुब-ख़ाना जो अटक में वाक़े’ है मौजूद है।

जवाहर-ए-जलाली: हज़रत मख़दूम के मल्फ़ूज़ात  का ये मजमूआ’ बहुत ज़ख़ीम है । फ़ज़लुल्लाह बिन ज़िया अल-अब्बासी ने इसे  मुरत्तब किया जो सय्यद मख़दूम  जहानियाँ जहाँ गशत के मुरीद और ख़लीफ़ा हैं। उन्होंने इसे  1379 ईसवी में  मुरत्तब किया।
जवाहर जलाली में मुंदरजा ज़ैल माख़ज़ का हवाला मिलता है।
अवारिफ़, फ़वाइदुलफ़ुवाद, सलात-ए-मसउदी, बुख़ारी, फ़तावा-ए- अयासिया,  मशारिक़ुल-अनवार, मिनहाजुल आ’बिदीन, औराद-ए-शैख़-ए-कबीर, फ़तावा-ए-मसउदी, उमदतुल-इस्लाम, जामिउल-कबीर, रौज़तुल-उलमा, मफ़ातीहुल-मसाइल, सिहाह-ए-सित्ता, ज़ादुतुलमुसाफ़िरीन, एहयाउल-उलूम, फ़तावा-ए-ज़हीरी, फ़तावा-ए-सुफ़िया , मुख़्तारुल-फ़तवा, हिदाया, सुनन-ए-अबी दाऊद, फ़तावा-ए-तातार ख़ानी, फ़तावा-ए-तोहफ़ा, मुसफ़्फ़ा, जामेउस-सग़ीर, नवादिरुस सलात, निहाया शर्ह-ए-हिदाया, मिश्कातुल-मसाबीह, शर्ह-ए-सग़ीर, शर्ह-ए-कबीर, उमदतुल आरीफ़ीन, फ़ुसुल-आदाब, तफ़्सीर–ए-कश्शाफ़ , फ़तावा-ए-हुसामी, फ़तावा–ए-सिराजी, रिसाला-ए-मक्कीया, जामिउल-फ़तावा, मज्मउल बहरैन, मफ़ातीहुल -मसाइल, ज़ख़ीरा-ए-फ़तावा-ए-कबीर, मुहीत, विक़ाया, फ़तावा-ए-अह्ल-ए-समरकंद, शर्ह-ए-हिदाया, सहीह मुस्लिम, मबसूत, फ़तावा-ए-नासिरी, शर्ह-ए-तहावी , ख़ज़ानतुल फ़िक़्ह, तफ़्सीर हद्दादी, तफ़्सीर ज़ाहिदी, ज़ुबदतु आरिफ़ीनल ,तुहफ़तु लबरात वग़ैरा।
ये मल्फ़ूज़ात  42 बाब और फ़्सल पर मुश्तमिल है। इस के उनवान जो अबवाब और फ़ुसूल में दर्ज हैं वो मुंदरजा ज़ैल हैं।
नमाज़ के मुतअ’ल्लिक़ उन्नान जो शुरू के 11 फ़स्ल पर मुश्तमिल है मुंदरजा ज़ैल हैं।
दो अ’दद रकाअ’त फ़राइज़ नमाज़-ए-शब-ओ-रोज़, वाजिब-ओ-सुन्नत, फ़राइज़ अंदर नमाज़, वाजिबात-ए-नमाज़, सुनन-ए-नमाज़, मुस्दतजिबात-ए-नमाज़, क़ुरआन-ओ-अहकाम-ए-नमाज़, आदाब-ए-नमाज़, करामत-ए-नमाज़, क़ाते’-ए-नमाज़, औराद-ओ-फ़राइज़-ए-बामदाद, दुरूदहा-ओ-दुआ’हा, दुआ’ बाद पंज फ़रीज़ा।
दीगर नमाज़-ए-ईद, आदाब, ज़िक्र-ओ-औराद वग़ैरा पर मब्नी फ़स्ल मुंदरजा ज़ैल है
दर सलात-ए-ईद-उल-अज़हा-ओ-कैफ़ियत-ए-अदईया, बैरून आमदन अज़ मस्जिद, तिलावत-ए-कलाम-ए- पाक,ज़िक्र-ए-अल्लाह, मुराक़बा, तफ़क्कुर व शराइत-ओ-कैफ़ियत, ख़ल्वत-ओ-उज़्लत, असरारआरिफ़ां, क़ैलूला-ओ-कैफ़ियत, नमाज़-ए- ज़वाल-ओ-अदईया, नमाज़-ए पेशीन, सलात-उल-अस्र, सलातुल-मग़्रिब, सलात-ए- इशा, सलात-ए-वित्र-ओ-दुआ’-ए-क़ुनूत, मशग़ूली बा अवराद, सलाम गुफ़्तन ब-रूह-ए- रसूल-ओ-सहाबा-ओ-मशाएख़, ख़्वाब कर्दन, तआ’म ख़ूर्दन, आब ख़ूर्दन, ज़ियाफ़त, आदाब-ए-दा’वत, जामा पोशीदन, बिना-ए-ख़ानहा-ओ-इमारत, हल्क़-ए- सर, शारिब-ओ-नाख़ुन, जमाअ’त कर्दन, ज़कात-ए-माल, हदाया-ओ-फ़ुतूह, तहीया-ओ-सलाम, दीदन-ए-माह-ए-नौ, माह-ए- ज़ीलहिज्जा, तारीफ़ कीफ़त, दुआ-ओ-तकबीरात-ए-तशरीक़।
जवाहर-ए-जलाली के नुस्ख़ा जात मुंदरजा ज़ैल लाइब्रेरी में मौजूद हैं:
जवाहर-ए-जलाली का एक नुस्ख़ा उच में सज्जादा नशीन नौबहार शाह के ज़ाती कुतुब-ख़ाना में मौजूद है। इस नुस्ख़ा में तरक़ीमा नहीं है। 379 औराक़ पर मुश्तमिल है और हर 17 सतर हर एक सफ़हा पर हैं इस का ख़त-ए-नसतालीक़ काफ़ी साफ़ और पाक है।
कुतुब-ख़ाना आसिफ़िया हैदराबाद दक्कन के सैंटर्ल लाइब्रेरी में भी इस का एक नुस्ख़ा मौजूद है इस में 325 वरक़ हैं। ये नुस्ख़ा किर्म-ख़ुर्दा है। इस के कातिब और सन का कोई ज़िक्र नहीं मिलता ।
जवाहर-ए-जलाली का एक नुस्ख़ा कराची के डाक्टर एस वी तिरमिज़ी के ज़ाती कुतुब-ख़ाना में मौजूद है। इस को अबू तालिब इब्न-ए-अमीन ने 1826 ईसवी में नक़्ल किया। इस में तरक़ीमा भी मौजूद है।

मज़हर-ए-जलाली: हज़रत मख़दूम के मल्फ़ूज़ात  का एक मजमूआ’ मज़हर-ए- जलाली के नाम से है। इस का एक नुस्ख़ा मख़दूम नौबहार शाह सज्जादा नशीन उच बुख़ारी के पास है। 320 वरक़ पर मुश्तमिल है और हर सफ़हा में 15 सुतूर हैं। वक़्त के इख़्तिसार की वजह से इस किताब  का तफ़्सीली जायज़ा नही लिया जा सका। मुरत्तिब का नाम भी सर-वरक़ या मुक़द्दमा-ए-किताब में तहरीर नहीं है।
किताब का आग़ाज़ इस तरह हुआ है:
.. व-फ़र्त-ए-अ’वारिफ़ इज़ाफ़त-ए-नअ’म-ओ-इज़ाफ़त-ए-करम…. हज़रत क़दम
इख़्तिताम यूं है:
फ़िरऔनुर रसूल फ़-अख़ज़नाहु अख़ज़व वबीला
किताब मुहर शूदा है मगर मुहर पढ़ने के क़ाबिल नहीं है, किताब के शुरू के कुछ उनवान दर्ज ज़ैल हैं।
ज़िक्र-ए-अव्वल दर मुक़द्दमा
1- दर बयान-ए-तौहीद 2- दर बयान-ए-फ़र्ज़ 3- दर बयान-ए-अ’ज़ीमत-ओ-रुख़्स्त 4- दर बयान-ए-शरीयत वग़ैरा
ज़िक्र दोउम: दर बयान-ए-तहारत-ओ-वुज़ू-ओ-ग़ुस्ल मुश्तमिल बर पानझ़दा फ़स्ल
1-दर आदाब-ए-क़ज़ा-ए-हाजत 2- अगर दर सहरा बाशद 3- दर इस्तिंजा 4-दर बयान-ए-बैरून आमदन 6- दर बयान-ए-इस्तिबरा 7- कैफ़ियत-ए-वुज़ू-ओ-बयान-ए- फ़राइज़-ओ-सुनन 8- दर बयान-ए-मिस्वाक कर्दन-ओ-कैफ़ियत-ए-आँ 9- दर बयान मस्ह-ए-मोज़ा 10- दर बयान-ए-तयम्मुम 11- नवाक़िज़-ए वुज़ू 12 दर बयान-ए-फ़राइज़-ओ-वाजिबात-ओ-मुस्तहब-ए-ग़ुस्ल 13-दर बयान-ए-तहीयत-ए-वुज़ू व आदाब-ओ-फ़ज़ाइल-ए-आँ
ज़िक्र-ए-सेउम: दर बयान-ए-तहज्जुद-ओ-फ़ज़ाइल-ओ-अदद रकाअ’त-ओ-अदईया
दर बाँग-ए-नमाज़-ओ-कैफ़ियत-ओ-शराइत-ओ-मसाइल-ए-आँ
दर बयान-ए-सुब्ह-ए-सादिक़-ओ-ख़्वान्दन सूरत-ओ-अदईया-ओ-तर्तीब-ए-आँ
दर बयान-ए-सुन्नत-ए-बामदाद-ओ-अदईया-ए-आँ
दर बयान-ए-मस्जिद रफ़्तन-ओ-कैफ़ियत–ए-अदईया-ए-आँ
दर बयान-ए-शुरू कर्दन-ए-नमाज़–ए-बामदाद-ओ-शराइत-ओ-कैफ़ियत मुश्तमिल बर दो फ़स्ल अस्त
फ़स्ल-ए-अव्वल : दर कैफ़ियत-ए-सलाम गुफ़्तन
फ़स्ल-ए-दोउम: दर बयान-ए-इक़ामत कर्दन
इस किताब का नुस्ख़ा और कहीं नहीं मिला, अलबत्ता इस के हवाले तारीख़ उल-औलीया मुअल्लिफ़ा इमामउद्दीन मतबूआ बंबई 1875 ईसवी में मिलते हैं। ये जवाहर-ए-जलाली से ज़्यादा ज़ख़ीम-तर है। बा’ज़ उनवान मुश्तरक मा’लूम होते हैं।
मनाक़िब-ए-मख़दूम जहानियाँ हज़रत मख़दूम के मल्फ़ूज़ात  का ये मजमूआ’ बहुत  नादिर है। इस का एक क़लमी नुस्ख़ा एशियाटिक सोसाइटी आफ़ बंगाल (कोलकाता) की लाइब्रेरी में है। दो किताबों के नाक़िसुत तरफ़ैन ना-मुकम्मल मल्फ़ूज़ात  एक ही जिल्द में बांध दिए गए हैं। पहली  किताब वज़ाइफ़-ए-शाही जा’फ़र बिन जलालउद्दीन  दरवेश से  मुतअ’ल्लिक़ है  और दूसरी किताब मख़दूम जलालउद्दीन बुख़ारी के मल्फ़ूज़ात  हैं। मुरत्तिब ने इन दोनों किताबों को एक किताब समझ लिया है। 159 वरक़ के बा’द दोनों किताब का काग़ज़ और ख़त बदल जाता है और सफ़हा 150 से मख़दूम जहानियाँ जहाँ गशत के मल्फ़ूज़ात  छयालीसवीं मज्लिस से शुरू हो जाते हैं। अफ़्सोस कि इस क़ाबिल-ए-क़द्र किताब का बहुत ही अहम हिस्सा ग़ायब है और किताब सत्रहवीं मज्लिस के दरमयान ख़त्म भी हो जाती है। ये किताब सुल्तान फ़िरोज़ शाह के इंतिक़ाल के बा’द मुरत्तब हुई थी क्योंकि इस को सुल्तान मरहूम लिखा गया है।
ये मल्फ़ूज़ात  बहुत अहम हैं इस में अह्द-ए-फ़ीरोज़ी के अक्सर सियासी वाक़ियात मुहिम-ए-ठटा और बग़ावत-ए-गुजरात वग़ैरा का ज़िक्र है। अक्सर उम्माल-ओ-उमरा-ओ-अ’माइद के नाम मिलते हैं। मुरत्तिब ने दरिया-ए-सतलुज में ब-ज़रीया-ए- कश्ती उच तक सफ़र करने का ज़िक्र किया है। मुरत्तिब ने सामाना के जुनूब में एक गांव निज़ामपुर रको आबाद किए जाने का भी ज़िक्र किया है। मुम्किन है उस गांव का नाम उसने अपने नाम पर रखा हो ।

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