जेरुसलम की मुक़द्दस ज़मीन हज़रत इब्राहीम अलै से लेकर हज़रत ईसा अलै तक सैंकड़ों अंबिया अलै का घर रही है : रिपोर्ट

बैतुल मुक़द्दस 641 ई0 में हजरत उमर रजि0 की खिलाफत में हजरत खालिद बिन वलीद रजि0 और हजरत अबू उबैदा रजि0 की सिपहसालारी में रोमन हुकूमत से फतेह हुआ, यह पाक ज़मीन 1099 ई0 में मुसलमानों के हाथ से निकल गई और क्रूसेडर्स के कब्जे में चली गई जिसे सलाहुद्दीन अय्यूबी रह0 ने 1187 ई0 में 88 साल बाद फिर से फतह किया। 1099 ई0 में पोप की रहनुमाई और उकसावे से तमाम यूरोप की रियासतें सलीब यानी क्रास के नाम पर एक झण्डे के नीचे इकट्ठा होकर क्रास ही को साथ में लेकर फलस्तीन पर हमलावर हुई और काबिज़ हो गई… फिर 88 साल तक इस मुद्दे पर जंगें होती रही, इन्हीं जंगों को क्रूसेड कहते हैं, इनमें लडने वाले ईसाई लोगों को क्रूसेडर्स कहते हैं। 1948 ई0 में ब्रिटिश हुकूमत की मदद से फलस्तीन पर इसराइल का कब्जा हुआ मगर बैतुल मुक़द्दस मुसलमानों के पास ही रहा, फिर 1967 ई0 की अरब-इसराइल जंग में यह पाक ज़मीन यहूदियों के नापाक कब्जे में चली गई और तब से आज तक यहूदी यहाँ काबिज़ हैं।

बैतुल मुक़द्दस दरअसल पुराने जेरुसलम शहर को कहा गया है यह मुक़द्दस ज़मीन हज़रत इब्राहीम अलै0 से लेकर हज़रत ईसा अलै0 तक सैंकड़ों अंबिया अलै0 का घर रही है। मस्जिद अल अक्सा उस पूरे कंपाउंड को कहा गया है जिसमें वो चट्टान वाके है जहां से रसूल अल्लाह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि को सफरे मेराज में आसमानों की सैर करई गई। उस चट्टान पर आज पीला गुम्बद बना है इसी गुम्बद के नीचे वो चट्टान वाके है। यह गुम्बद खलीफा अब्दुल मलिक बिन मरवान ने तामीर कराया था। इसी कंपाउंड में एक मस्जिद भी है जिसे मस्जिदे अक्सा कहा जाता है लेकिन कुरआन पूरे कंपाउंड को मस्जिद अल अक्सा कहता है। जिस वक़्त हुजूर अलै0 को मेराज अता हुई उस वक़्त ये कंपाउंड रोमन इसाईयों की हुकूमत में था, यहां ना ही मौजूदा मस्जिद थी ना ही पीला गुम्बद था। सिर्फ यह चट्टान थी और कंपाउंड की चहारदीवारी थी। सफरे मेराज के वक़्त न कोई मस्जिद तामीर हुई थी ना ही हिजरत हुई थी। मस्जिदे नबवी भी हिजरत के बाद तामीर की गई। कहने का मकसद ये है कि कुछ मुसलमान मौजूदा छोटी मस्जिद को ही मस्जिदे अक्सा समझते हैं जबकि कुरआन के मुताबिक पूरा कंपाउंड मस्जिद अल अक्सा है।

इस कंपाउंड में हज़रत सुलेमान अलै0 का तामीरकरदा इबादत खाना था जिसे ईसाइ व यहूदी टेम्पल कहते हैं। कुरआन इसे मस्जिद कहता है लिहाज़ा हम भी मस्जिद ही कहते हैं। इस इबादतखाने को पहले 567 BC में इराकी बादशाह नमरूद (नबुकद नज्र) ने तोड़ा और बारह लाख यहूदियों में से छह लाख को क़त्ल किया बाकी छह लाख को कैप्टिव बनाकर बेबिलोन ले गया। डेढ सौ साल की गुलामी के बाद ईरानी शहंशाह हज़रत जुल्करनैन ने बेबिलोन पर हमला किया तो फतह होने पर यहूदियों को आज़ाद कर दिया। यहूदियों ने हज़रत उज़ैर अलै0 की क़यादत में फिर से इबादत गाह तैयार की और बैतुल मुक़द्दस शहर आबाद किया। सन 70 ईसवी में रोमी जरनैल टाइटस ने फिर से जेरुसलम पर हमला किया और यहूदियों को मार भगाया, तभी से यहूदियों का डायसपोरा यानी दौरे इंतिशार शुरू हुआ जो पिछली सदी में ब्रिटिश हुकूमत के ज़रिये 1948 में खत्म हुआ।

सन 641 ई0 में जब हज़रत उमर रज़ि के दौरे खिलाफत यह पाक शहर मुसलमानों के पास आया तो इस कंपाउंड में एक तरफ हज़रत ने नमाज़े शुकराना अदा की, इसी जगह पर मौजूदा छोटी मस्जिद बनाई गई थी। लिहाज़ा इस मस्जिद की अहमियत भी हमारे लिए कम नहीं लेकिन याद रखना चाहिए कि पूरा कंपाउंड ही मस्जिद अल अक्सा है। इस कंपाउंड में भी सबसे ज़्यादा अहमतरीन हिस्सा वो चट्टान है जहां से हुजूर अलै0 को मेराज पर ले जाया गया। उसी चट्टान पर मौजूदा पीला गुम्बद है। वस्सलाम 
#यहूदियत_और_इस्लाम़

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s