ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर

बाबर 
===============
पूरा नाम – ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर
अन्य नाम- मुग़ल शाह, अल-सुल्तानु इ आज़म वा इ हकाम, पादशाह-ए-ग़ाज़ी
जन्म – 14 फ़रवरी, सन् 1483 ई.
जन्म भूमि- अन्दीना (फ़रग़ना राज्य की राजधानी)
मृत्यु तिथि – 26 दिसम्बर, सन् 1530 ई.
मृत्यु स्थान- आगरा
पिता/माता -उमर शेख़ मिर्ज़ा, क़ुतलुगनिग़ार ख़ानम (यूनुस की पुत्री)
संतान- पुत्र- हुमायूँ, कामरान, अस्करी, हिन्दाल, पुत्री- गुलबदन बेगम
उपाधि -ग़ाज़ी (खानवा के युद्ध में विजय के बाद)
शासन काल- सन 1526 से 1530 ई.
शा. अवधि -4 वर्ष
राज्याभिषेक- 8 जून, सन् 494 ई. 
युद्ध -पानीपत का प्रथम युद्ध, खानवा का युद्ध, चंदेरी का युद्ध, घाघरा का युद्ध
निर्माण- क़ाबुली बाग़ मस्जिद,, जामी मस्जिद , आगरा की मस्जिद , नूर अफ़ग़ान, बाबरी मस्जिद
उत्तराधिकारी- हुमायूँ
राजघराना- चग़ताई वंश
वंश -तैमूर और चंग़ेज़ ख़ाँ का वंश 
मक़बरा -क़ाबुल
भारत पर आक्रमण- बाजौर एवं भीरा आक्रमण 1518 से 1519 ई., पेशावर आक्रमण 1519 ई., स्यालकोट, भीरा आक्रमण 1520 ई., सुल्तानपुर, लाहौर, दीपालपुर आक्रमण 1524 ई.
रचनाऐं – बाबरनामा या तुज़ुक़-ए-बाबरी, दीवान , रिसाल-ए-उसज , मुबइयान

ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर (अंग्रेज़ी: Babur, जन्म- 14 फ़रवरी, 1483 ई., फ़रग़ना; मृत्यु- 26 दिसम्बर, 1530 ई., आगरा) जो कि भारतीय इतिहास में बाबर के नाम से प्रसिद्ध है, मुग़ल शासक था। वह भारत में मुग़ल वंश का संस्थापक था। बाबर तैमूर लंग के परपोता था और विश्वास रखता था कि चंगेज़ ख़ान उसके वंश का पूर्वज था। 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में दिल्ली सल्तनत के अंतिम वंश (लोदी वंश) के सुल्तान इब्राहीम लोदी की पराजय के साथ ही भारत में मुग़ल वंश की स्थापना हो गई थी। इस वंश का संस्थापक ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर था। बाबर का पिता उमर शेख़ मिर्ज़ा, फ़रग़ना का शासक था, जिसकी मृत्यु के बाद बाबर राज्य का वास्तविक अधिकारी बना। पारिवारिक कठिनाईयों के कारण वह मध्य एशिया के अपने पैतृक राज्य पर शासन नहीं कर सका। उसने केवल 22 वर्ष की आयु में क़ाबुल पर अधिकार कर अफ़ग़ानिस्तान में राज्य क़ायम किया था। वह 22 वर्ष तक क़ाबुल का शासक रहा। उस काल में उसने अपने पूर्वजों के राज्य को वापिस पाने की कई बार कोशिश की, पर सफल नहीं हो सका।

जन्म एवं अभिषेक
===========
14 फ़रवरी, 1483 ई. को फ़रग़ना में ‘ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर’ का जन्म हुआ। बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का पाँचवा एवं माता की ओर से चंगेज़ ख़ाँ (मंगोल नेता) का चौदहवाँ वंशज था। उसका परिवार तुर्की जाति के ‘चग़ताई वंश’ के अन्तर्गत आता था। बाबर अपने पिता ‘उमर शेख़ मिर्ज़ा’ की मृत्यु के बाद 11 वर्ष की आयु में शासक बना। उसने अपना राज्याभिषेक अपनी दादी ‘ऐसान दौलत बेगम’ के सहयोग से करवाया। बाबर ने अपने फ़रग़ना के शासन काल में 1501 ई. में समरकन्द पर अधिकार किया, जो मात्र आठ महीने तक ही उसके क़ब्ज़े में रहा। 1504 ई. में क़ाबुल विजय के उपरांत बाबर ने अपने पूर्वजों द्वारा धारण की गई उपाधि ‘मिर्ज़ा’ का त्याग कर नई उपाधि ‘पादशाह’ धारण की।

बाबर की भारत विजय
===========
बाबर का भारत के विरुद्व किया गया प्रथम अभियान 1519 ई. में ‘युसूफजाई’ जाति के विरुद्ध था। इस अभियान में बाबर ने ‘बाजौर’ और ‘भेरा’ को अपने अधिकार में किया। यह बाबर का प्रथम भारतीय अभियान था, जिसमें उसने तोपखाने का प्रयोग किया था। 1519 ई. के अपने दूसरे अभियान में बाबर ने ‘बाजौर’ और ‘भेरा’ को पुनः जीता साथ ही ‘स्यालकोट’ एवं ‘सैय्यदपुर’ को भी अपने अधिकार में कर लिया। 1524 ई. के चौथे अभियान के अन्तर्गत इब्राहीम लोदी एवं दौलत ख़ाँ लोदी के मध्य मतभेद हो जाने के कारण दौलत ख़ाँ, जो उस समय लाहौर का गवर्नर था, ने पुत्र दिलावर ख़ाँ एवं आलम ख़ाँ (बहलोल ख़ाँ का पुत्र) को बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करने के लिए भेजा। सम्भवतः इसी समय राणा सांगा ने भी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए निमत्रंण भेजा था।

बाबर को भारत आमंत्रण के कारण
===========
– बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित करने के पीछे सम्भवतः कुछ कारण इस प्रकार थे-
– दौलत ख़ाँ पंजाब में अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये रखना चाहता था।
– आलम ख़ाँ किसी भी तरह से दिल्ली के सिंहासन पर अपना अधिकार करना चाहता था।
– राणा सांगा सम्भवतः बाबर के द्वारा अफ़ग़ानों की शक्ति को नष्ट करवा कर स्वयं दिल्ली के सिंहासन को प्राप्त करना चाहता था।

अपने चौथे अभियान 1524 ई. में बाबर ने लाहौर एवं दीपालपुर पर अधिकार कर लिया। नवम्बर 1526 ई. में बाबर द्वारा किये गये पाँचवे अभियान में, जिसमें बदख्शाँ की सैनिक टुकड़ी के साथ बाबर का पुत्र हुमायूँ भी आ गया था, उसने सर्वप्रथम दौलत ख़ाँ को समर्पण के लिए विवश किया और बाद में उसे बन्दी बना लिया गया। शीघ्र ही आलम ख़ाँ ने भी आत्समर्पण कर दिया। इस तरह पूरा पंजाब बाबर के क़ब्ज़े में आ गया।

पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल, 1526 ई.)
===========
इस समय इब्राहीम लोदी दिल्ली का सुल्तान था और दौलत ख़ाँ लोदी पंजाब का राज्यपाल। दौलत ख़ाँ लोदी, इब्राहीम लोदी से नाराज़ था। उसने दिल्ली सल्तनत से विद्रोह कर बाबर को अपनी मदद के लिये क़ाबुल से बुलाया। बाबर ख़ुद भी भारत पर हमला करना चाह रहा था। वह दौलत ख़ाँ लोदी के निमन्त्रण पर भारत पर आक्रमण करने की तैयारी करने लगा। उस समय तुर्क-अफ़ग़ान भारत पर आक्रमण लूट से मालामाल होने के लिये करते रहते थे। बाबर एक बहुत बड़ी सेना लेकर पंजाब की ओर चल दिया।

यह युद्ध सम्भत: बाबर की महत्वाकांक्षी योजनाओं की अभिव्यक्ति थी। यह युद्ध दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी (अफ़ग़ान) एवं बाबर के मध्य लड़ा गया। 12 अप्रैल, 1526 ई. को दोनों ओर की सेनाएँ पानीपत के मैदान में आमने-सामने आ गईं और युद्ध का आरम्भ 21 अप्रैल को हुआ। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध का निर्णय दोपहर तक ही हो गया। युद्ध में इब्राहीम लोदी बुरी तरह से परास्त हुआ और मार दिया गया। बाबर ने अपनी कृति ‘बाबरनामा’ में इस युद्ध को जीतने में मात्र 12000 सैनिकों के उपयोग किए जाने का उल्लेख किया है। किन्तु इस विषय पर इतिहासकारों में बहुत मतभेद है। इस युद्ध में बाबर ने पहली बार प्रसिद्ध ‘तुलगमा युद्ध नीति’ का प्रयोग किया। इसी युद्ध में बाबर ने तोपों को सजाने में ‘उस्मानी विधि’ (रूमी विधि) का प्रयोग किया था। बाबर ने तुलगमा युद्ध पद्धति उजबेकों से ग्रहण की थी। पानीपत के ही युद्ध में बाबर ने अपने प्रसिद्ध निशानेबाज़ ‘उस्ताद अली’ और ‘मुस्तफा’ की सेवाएँ लीं।

इस युद्ध में लूटे गए धन को बाबर ने अपने सैनिक अधिकारियों, नौकरों एवं सगे सम्बन्धियों में बाँट दिया। सम्भवत: इस बँटवारे में हुमायूँ को वह कोहिनूर हीरा प्राप्त हुआ, जिसे ग्वालियर नरेश ‘राजा विक्रमजीत’ से छीना गया था। इस हीरे की क़ीमत के बारे में यह माना जाता है कि इसके मूल्य द्वारा पूरे संसार का आधे दिन का ख़र्च पूरा किया जा सकता था। भारत विजय के ही उपलक्ष्य में बाबर ने प्रत्येक क़ाबुल निवासी को एक-एक चाँदी का सिक्का उपहार स्वरूप प्रदान किया था। अपनी इसी उदारता के कारण उसे ‘कलन्दर’ की उपाधि दी गई थी। पानीपत विजय के बाद बाबर ने कहा, ‘काबुल की ग़रीबी अब फिर हमारे लिए नहीं’। पानीपत के युद्ध ने भारत के भाग्य का तो नहीं, किन्तु लोदी वंश के भाग्य का निर्णय अवश्य कर दिया। अफ़ग़ानों की शक्ति समाप्त नहीं हुई, लेकिन दुर्बल अवश्य हो गई। युद्ध के पश्चात् दिल्ली तथा आगरा पर ही नहीं, बल्कि धीरे-धीरे लोदी साम्राज्य के समस्त भागों पर भी बाबर ने अधिकार कर लिया।

खानवा का युद्ध (17 मार्च, 1527 ई.)
===========
उत्तरी भारत में दिल्ली के सुल्तान के बाद सबसे अधिक शक्तिशाली शासक चित्तौड़ का राजपूत राणा साँगा (संग्राम सिंह) था। उसने दो मुसलमानों, इब्राहीम लोदी और बाबर के युद्ध में तटस्थता की नीति अपनायी। वह सोचता था कि बाबर लूट-मारकर वापिस चला जायेगा, तब लोदी शासन को हटा दिल्ली पर कब्ज़ा किया जायेगा । जब उसने देखा कि बाबर मुग़ल राज्य की स्थापना का आयोजन कर रहा है, तब वह उससे युद्ध करने के लिए तैयार हुआ। राणा सांगा वीर और कुशल सेनानी था। वह अनेक युद्ध कर चुका था, उसे सदैव विजय प्राप्त हुई थी। उधर बाबर ने भी समझ लिया था कि राणा सांगा के रहते हुए भारत में मुग़ल राज्य की स्थापना करना सम्भव नहीं हैं; अत: उसने भी अपनी सेना के साथ राणा से युद्ध करने का निश्चय किया।

17 मार्च, 1527 ई. में खानवा का युद्ध बाबर और राणा सांगा के बीच लड़ा गया। इस युद्ध के कारणों के विषय में इतिहासकारों के अनेक मत हैं। पहला, चूँकि पानीपत के युद्ध के पूर्व बाबर एवं राणा सांगा में हुए समझौतें के तहत इब्राहिम लोदी के ख़िलाफ़ सांगा को बाबर के सैन्य अभियान में सहायता करनी थी, जिससे राणा सांगा बाद में मुकर गया था । दूसरा, सांगा बाबर को दिल्ली का बादशाह नहीं मानता था। इन दोनों कारणों से अलग कुछ इतिहासकारों का मानना है कि, यह युद्ध बाबर एवं राणा सांगा की महत्वाकांक्षी योजनाओं का परिणाम था, परिणामस्वरूप दोनों सेनाओं के मध्य 17 मार्च, 1527 ई. को युद्ध आरम्भ हुआ। इस युद्ध में राणा सांगा का साथ मारवाड़, अम्बर, ग्वालियर, अजमेर, हसन ख़ाँ मेवाती, बसीन चंदेरी एवं इब्रहिम लोदी का भाई महमूद लोदी दे रहे थे।

इस युद्ध में राणा सांगा के संयुक्त मोर्चे की ख़बर से बाबर के सैनिकों का मनोबल गिरने लगा। बाबर ने अपने सैनिकों के उत्साह को बढ़ाने के लिए शराब पीने और बेचने पर प्रतिबन्ध की घोषणा कर शराब के सभी पात्रों को तुड़वा कर शराब न पीने की कसम ली, उसने ‘तमगा कर’ न लेने की घोषणा की। तमगा एक प्रकार का व्यापारिक कर था, जिसे राज्य द्वार लगाया जाता था। इस तरह खानवा के युद्ध में भी पानीपत युद्ध की रणनीति का उपयोग करते हुए बाबर ने राणा सांगा के विरुद्ध एक सफल युद्ध की रणनीति तय की।

बाबर की विजय
===========
राजस्थान के ऐतिहासिक काव्य ‘वीर विनोद’ में सांगा और बाबर के इस युद्ध का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है कि, बाबर बीस हज़ार मुग़ल सैनिकों को लेकर सांगा से युद्ध करने आया था। उसने सांगा की सेना के लोदी सेनापति को प्रलोभन दिया, जिससे वह सांगा को धोखा देकर सेना सहित बाबर से जा मिला। बाबर और सांगा की पहली मुठभेड़ बयाना में और दूसरी उसके पास खानवा नामक स्थान पर हुई थी। राजपूतों ने वीरतापूर्वक युद्ध किया। अंत में सांगा की हार हुई और बाबर की विजय। इस विजय कारण बाबर उनका आधुनिक तोपख़ाना था। राजपूतों से युद्ध करते हुए तुर्कों के पैर उखड़ गये, जिससे राजपूतों की विजय और तुर्कों की पराजय दिखाई देने लगी, किंतु जब बाबर के तोपख़ाने ने आग बरसायी, तब सांगा की जीती बाज़ी हार में बदल गई। बाबर ने राजपूतों के बारे में लिखा है,− ‘वे मरना−मारना तो जानते है; किंतु युद्ध करना नहीं जानते।’ सांगा और बाबर का यह निर्णायक युद्ध फ़तेहपुर सीकरी के पास खानवा नामक स्थान में 16 अप्रैल, सन् 1527 में हुआ था। इस तरह उस समय के ब्रजमंडल में जयचंद्र के बाद राणा सांगा की भी हार हुई।

इस युद्ध में राणा सांगा घायल हुआ, पर किसी तरह अपने सहयोगियों द्वारा बचा लिया गया। कालान्तर में अपने किसी सामन्त द्वारा ज़हर दिये जाने के कारण राणा सांगा की मृत्यु हो गई। खानवा के युद्ध को जीतने के बाद बाबर ने ‘ग़ाज़ी’ की उपाधि धारण की।

बाबर के जीवन में स्थिरता
===========
खानवा के युद्ध के उपरान्त बाबर के जीवन में स्थिरता आई। 29 जनवरी, 1528 ई. को बाबर ने ‘चंदेरी के युद्ध’ में वहाँ के सूबेदार ‘मेदिनी राय’ को परास्त किया। मेदिनी राय की दो पुत्रियों का विवाह ‘कामरान’ एवं ‘हुमायूँ’ से हुआ । 6 मई, 1529 ई. को बाबर ने ‘घाघरा के युद्ध’ में बंगाल एवं बिहार की संयुक्त सेना को परास्त किया। घाघरा युद्ध जल एवं थल पर लड़ा गया। परिणामस्वरूप बाबर का साम्राज्य ऑक्सस से घाघरा एवं हिमालय से ग्वालियर तक पहुँच गया। घाघरा युद्ध के बाद बाबर ने बंगाल के शासक नुसरत शाह से संधि कर उसके साम्राज्य की संप्रभुता को स्वीकार किया। नुसरत शाह ने बाबर को आश्वासन दिया कि वह बाबर के शत्रुओं को अपने साम्राज्य में शरण नहीं देगा।

मुग़ल राज्य की स्थापना
===========
इब्राहीम लोदी और राणा साँगा की हार के बाद बाबर ने भारत में मुग़ल राज्य की स्थापना की और आगरा को अपनी राजधानी बनाया। उससे पहले सुल्तानों की राजधानी दिल्ली थी; किंतु बाबर ने उसे राजधानी नहीं बनाया, क्योंकि वहाँ पठान थे, जो तुर्कों की शासन−सत्ता पंसद नहीं करते थे। प्रशासन और रक्षा दोनों नज़रियों से बाबर को दिल्ली के मुक़ाबले आगरा सही लगा। मुग़ल राज्य की राजधानी आगरा होने से शुरू से ही ब्रज से घनिष्ट संबंध रहा। मध्य एशिया में शासकों का सबसे बड़ा पद ‘ख़ान’ था, जो मंगोल वंशियों को ही दिया जाता था। दूसरे बड़े शासक ‘अमीर’ कहलाते थे। बाबर का पूर्वज तैमूर भी ‘अमीर’ ही कहलाता था। भारत में दिल्ली के मुस्लिम शासक ‘सुल्तान’ कहलाते थे। बाबर ने अपना पद ‘बादशाह’ घोषित किया था। बाबर के बाद सभी मुग़ल सम्राट ‘बादशाह’ कहलाये गये।

मृत्यु
===========
बाबर केवल 4 वर्ष तक भारत पर राज्य कर सका। लगभग 48 वर्ष की आयु में 26 दिसम्बर, 1530 ई. को बाबर की आगरा में मृत्यु हो गई। प्रारम्भ में उसके शव को आगरा के ‘आराम बाग़’ में रखा गया, पर अंतिम रूप से बाबर की अंतिम इच्छानुसार उसका शव क़ाबुल ले जाकर दफ़नाया गया, जहाँ उसका मक़बरा बना हुआ है। उसके बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र हुमायूँ मुग़ल बादशाह बना।

बाबर की उपलब्धियाँ
===========
सम्भवतः बाबर कुषाणों के बाद ऐसा पहला शासक था, जिसने काबुल एवं कंधार को अपने पूर्ण नियंत्रण में रखा। उसने भारत में अफ़ग़ान एवं राजपूत शक्ति को समाप्त कर ‘मुग़ल साम्राज्य’ की स्थापना की, जो लगभग पौने दो सौ वर्षों तक जीवित रहा। बाबर ने भारत पर आक्रमण कर एक नई युद्ध नीति का प्रचलन किया। बाबर ने सड़कों की माप के लिए ‘गज़-ए-बाबरी’ का प्रयोग का शुभारम्भ किया।

विद्वान् व्यक्ति
===========
बाबर योग्य शासक होने के साथ ही तुर्की भाषा का विद्वान् भी था। उसने तुर्की भाषा में अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ की रचना की, जिसका फ़ारसी भाषा में अनुवाद बाद में अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने किया। लीडेन एवं अर्सकिन ने 1826 ई. में ‘बाबरनामा’ का अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद किया। बेवरिज ने इसका एक संशोधित अंग्रेज़ी संस्करण निकाला। इसके अतिरिक्त बाबर को ‘मुबइयान’ नामक पद्य शैली का जन्मदाता भी माना जाता है। इसके अतिरिक्त बाबर ने ‘खत-ए-बाबरी’ नामक एक लिपि का भी अविष्कार किया। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में केवल पाँच मुस्लिम शासकों- बंगाल, दिल्ली, मालवा, गुजरात एवं बहमनी राज्यों तथा दो हिन्दू शासकों मेवाड़ एवं विजयनगर का उल्लेख किया है।

प्रमुख इतिहासकारों के मत
स्मिथ ने बाबर को अपने युग के एशियाई शासकों में सबसे अधिक प्रतिभाशाली एवं किसी देश तथा काल के सम्राटों में उच्च पद पानें योग्य बताया।
रशब्रुक ने तो एक व्यक्ति एवं शासक के रूप में बाबर की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
इलियट ने कहा कि, ‘प्रसन्न चित्त’, वीर, महान, विचारशील तथा निष्पक्ष व्यक्तित्व के कारण यदि बाबर का पालन-पोषण एवं प्रशिक्षण इंग्लैण्ड में होता तो अवश्य ही वह ‘हेनरी चतुर्थ’ होता।

===============

अगर “बाबर” न आता तो भारत कैसा होता?

14 फरवरी 1483 को एक ऐतिहासिक व्यक्ति और शायद विवादास्पद भी, का जन्म हुआ था. विवादास्पद इसलिए कि भारत में कुछ लोग उन्हें आक्रमणकारी कहते हैं और अयोध्या में बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद के लिए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया जाता है ।

लेकिन उनकी शख़्सियत विभिन्न रंगों से भरी थी. वे कोई और नहीं भारत में मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर थे ।

ज़हीरुद्दीन मोहम्मद बाबर 14 फ़रवरी 1483 को अन्दिजान में पैदा हुए थे, जो फ़िलहाल उज़्बेकिस्तान का हिस्सा है. आक्रमणकारी हों या विजेता, लेकिन ऐसा लगता है कि बाबर के बारे में आम तौर से लोगों को न तो अधिक जानकारी है और न ही दिलचस्पी ।

मुग़ल सम्राटों में अकबर और ताज महल बनवाने वाले शाहजहाँ के नाम सब से ऊपर हैं. लेकिन जैसा कि इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं, ”बाबर का व्यक्तित्व संस्कृति, साहसिक उतार-चढ़ाव और सैन्य प्रतिभा जैसी ख़ूबियों से भरा हुआ था.” ।

अगर बाबर भारत न आता तो भारतीय संस्कृति के इंद्रधनुष के रंग फीके रहते. उनके अनुसार भाषा, संगीत, चित्रकला, वास्तुकला, कपड़े और भोजन के मामलों में मुग़ल योगदान को नकारा नहीं जा सकता.

■ बाबर के बारे में कुछ दिलचस्प बातों पर एक नज़र:

1. बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई में जीत की ख़ुशी में पानीपत में ही एक मस्जिद बनवाई थी, जो आज भी वहीँ खड़ी है ।

2. बाबर दुनिया के पहले शासक थे, जिन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी. बाबरनामा उनके जीवन की नाकामियों और कामयाबियों से भरी पड़ी है ।

3. हरबंस मुखिया के अनुसार बाबर की सोच थी कि कभी हार मत मानो. उन्हें समरक़ंद (उज़्बेकिस्तान) हासिल करने का जुनून सवार था ।

4. उन्होंने समरक़ंद पर तीन बार क़ब्ज़ा किया, लेकिन तीनों बार उन्हें शहर से हाथ धोना पड़ा. अगर वे समरक़ंद का राजा बने रहते तो शायद काबुल और भारत पर राज करने की कभी नहीं सोचते ।

5. भारत में भले बाबर को वो सम्मान नहीं मिला, जो उनके पोते अकबर को मिला था, लेकिन उज़्बेकिस्तान में बाबर को वही दर्जा हासिल है जो भारत में अकबर को ।

6. उनकी किताब के कई शब्द भारत में आम तौर से प्रचलित हैं. ‘मैदान’ शब्द का भारत में पहली बार इस्तेमाल बाबरनामा में देखने को मिला. प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया कहते हैं कि आज भी भारत में बोली जाने वाली भाषाओँ में तुर्की और फ़ारसी शदों का प्रयोग आम है ।

उन्होंने 1930-40 में राज करने वाले एक मराठी हाकिम का उदाहरण देते हुए कहा कि उसने अपनी भाषा में उर्दू और फ़ारसी शब्दों से पाक करने के लिए एक फ़रमान जारी किया , उनके एक सलाहकार ने कहा कि हुज़ूर ‘फ़रमान’ समेत आपके फ़रमान में इस्तेमाल किए गए 40 प्रतिशद शब्द फ़ारसी और उर्दू के हैं 😆

7. प्रोफ़ेसर मुखिया के अनुसार तुर्क भाषा में कविता लिखने वाली दो बड़ी हस्तियां गुज़रीं, उनमें से एक बाबर थे ।

8. बाबर की कठोरता की मिसालें मिलती हैं, लेकिन उनकी मृदुलता के भी कई उदाहरण हैं. एक बार वे जंग की तैयारी में लगे थे कि किसी ने उन्हें ख़रबूज़ पेश किया. बाबर ख़ुशी के मारे रो पड़े. सालों से उन्होंने ख़रबूज़े की शकल नहीं देखी थी ।

9. बाबर 12 वर्ष की उम्र में राजा बने, लेकिन 47 साल की उम्र में मरते दम तक वे युद्ध में जुटे रहे । इसके बावजूद बाबर ने पारिवारिक ज़िम्मेदारियां निभाईं. उनकी ज़िन्दगी पर माँ और नानी का गहरा असर था जिन्हें वे बेइंतहा प्यार करते थे. वे अपनी बड़ी बहन के लिए एक आदर्श भाई थे ।

10. मुग़ल बादशाह हुमांयूं बाबर के सबसे बड़े बेटे थे. उनके लिए बाबर एक समर्पित पिता थे. हुमांयूं एक बार बहुत बीमार पड़ गए. बाबर ने बीमार हुमांयू के जिस्म के तीन गर्दिश किए और ख़ुदा से दुआ मांगी कि उनके बेटे को स्वस्थ कर दे और उसकी जगह पर उनकी जान ले ले ।

हुमांयू तो ठीक हो गए. लेकिन कुछ महीनों में बाबर बीमार हुए और उनकी मौत हो गई ।

source : BBC Hindi

==============

मुग़ल साम्राज्य का इतिहास 
================
मुग़ल साम्राज्य की शुरुवात 1526 में हुयी, जिसने 18 शताब्दी के शुरुवात तक भारतीय उप महाद्वीप में राज्य किया था। जो 19 वी शताब्दी के मध्य तक लगभग समाप्त हो गया था। मुग़ल साम्राज्य तुर्क-मंगोल पीढी के तैनुर वंशी थे। मुग़ल साम्राज्य – Mughal Empire ने 1700 के आसपास अपनी ताकत को बढ़ाते हुए भारतीय महाद्वीपों के लगभग सभी भागो को अपने साम्राज्य के नीचे कर लिया था।

तब तक उस समय इस साम्राज्य के निचे लगभग 12 करोड़ लोग थे। जिसका पहला बादशाह बाबर और अंतिम बादशाह बहादुर शाह द्वितीय था। तो आईये इन दोनों बादशाह के बिच का मुग़ल साम्राज्य का इतिहास जानते हैं।

मुग़ल साम्राज्य के बादशाहों के नामों की सूची 
================

1. बाबर– 1526 – 1530
बाबर भारत में मुगल वंश का संस्थापक था। जिसका पूरा नाम ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर था। बाबर का जन्म फ़रगना घाटी के अन्दीझ़ान नामक शहर में हुआ था। भारत में मुग़ल साम्राज्य की नीव बाबर ने ही रखी थी। भारत में मुग़ल साम्राज्य की नीव बाबर ने ही रखी थी। जहां बाबर के पूर्वजों ने भारत में आकर लुट पाट, मार काट कर के चले गये वही बाबर भारत आकर यही के हो गये।

2. नसीरुद्दीन मोहम्मद हुमायूँ – 1530-1540
मुगल शासक हुमायूँ मुग़ल साम्राज्य के दुसरे बादशाह थे। जिन्होंने अपने पिता बाबर के बाद 1556 तक राज किया। हुमायूँ के मृत्यु तक मुग़ल साम्राज्य बहुत ज्यादा बढ़ गया था।

3. शेर शाह सूरी – 1540-1545
शेर शाह सूरी सूरी साम्राज्य के संस्थापक था। जिसने मुग़ल साम्राज्य के एक छोटेसे सेनापति के रूप में काम किया था। और एक सैनिक के रूप में काम करते करते बढ़त पाकर सेनापति बन गया। जब मुग़ल शासक हुमायूँ किसी अभियान पर था तभी शेर शाह सूरी ने मुग़ल शासक के विरोध में जाकर बंगाल पर अपना कब्ज़ा जमाकर सूरी साम्राज्य की स्थापना की।

4. इस्लाम शाह सूरी – 1545-1554
इस्लाम शाह सूरी ने अपने पिता शेर शाह सूरी के साम्राज्य को आगे बढाया। जिसे उसने 1545 से लेकर 1554 तक चलाया। लेकिन बादमें मुग़ल शासक हुमायूँ ने वापिस जीत लिया।

5. नसीरुद्दीन मोहम्मद हुमायूँ – 1555-1556
हुमायूँ ने 1555 में अपने हारे हुए साम्राज्य को ईरान साम्राज्य की मदत लेकर इस्लाम शाह सूरी को हराकर मुग़ल साम्राज्य को वापिस से प्रस्थापित किया। लेकिन उसके एक साल बाद 1556 में हुमायूँ की मृत्यु हो गयी।

6. जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर – 1556-1605
अकबर अपने पिता के मृत्यु के बाद 14 वर्ष की आयु में ही मुग़ल साम्राज्य के अगले शासक बने जो एक नए ढंग से मुग़ल साम्राज्य को चलाने के लिए जाने और माने जाते हैं। अकबर ने 1605 मृत्यु तक मुग़ल साम्राज्य पर राज किया।

7. नुरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीर – 1605-1627
अपने पिता अकबर के मृत्यु के बाद जहाँगीर ने सत्ता संभाली। जहाँगीर ने 1605 से अपनी मृत्यु 1627 तक मुग़ल साम्राज्य पर राज्य किया।

8. शहाबुद्दीन मोहम्मद शाहजहाँ – 1627-1658
शाहजहाँ अपनी पिता जहाँगीर के मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य के बादशाह बने जो मुग़ल साम्राज्य के सबसे बड़े लोकप्रिय और चर्चित रहने वाले बादशाह थे, जो खास तौर पर अपनी बेग़म मुमताज महल के लिए दुनिया का सबसे खुबसूरत ताजमहल बनाने के लिए याद किए जाये हैं।

9. मोइनुद्दीन मोहम्मद औरंगजेब आलमगीर – 1658-1707
औरंगजेब मुगल साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली और धनि बादशाह थे। जिनके कार्यकाल में मुगल साम्राज्य ने सबसे ज्यादा विस्तार किया। अपने जीवनकाल में औरंगजेब ने लाल किले में मोती मज्जिद, लाहोर की बादशाही मज्जिद, और बीबी का मकबरा जैसे निर्माण कियें।

10. बहादुरशाह जफर I उर्फ शाह आलम I – 1707-1712
बहादुरशाह जफर I उर्फ शाह आलम I मुग़ल साम्राज्य पर 1707 से लेकर 1712 तक पांच साल राज्य किया।

11. जहान्दर शाह – 1712-1713
जहान्दर शाह बहुत छोटी सी अवधी के लिए मुग़ल साम्राज्य के शासक बने। जिन्होंने 1712 से 1713 तक एक साल मुग़ल साम्राज्य पर राज्य किया।

12. फुर्रूखसियर – 1713-1719
फुर्रूखसियर का जन्म 20 अगस्त 1685 में हुआ। वे 1713 से लेकर 1719 तक मुग़ल साम्राज्य के शासक बने।

13. रफी उल-दर्जात – 1719
रफी उल-दर्जात छोटीसी अवधी के लिए मुग़ल साम्राज्य के शासक बने।

14. रफी उद-दौलत उर्फ शाहजहाँ II – 1719
रफी उद-दौलत उर्फ शाहजहाँ II बहुत कम समय मुग़ल साम्राज्य के शासक बनकर बिताया।

15. निकुसियर – 1719
निकुसियर बहुत छोटी सी अवधी के लिए मुग़ल साम्राज्य के शासक बने।

16. मोहम्मद इब्राहिम – 1720
मोहम्मद इब्राहिम छोटीसी अवधी के लिए मुग़ल साम्राज्य के शासक बने।

17. मोहम्मद शाह – 1719-1720, 1720-1748 
मुहम्मद शाह मुगल सम्राट था, जिन्हें रोशन अख्तर भी कहते थे। उनकी मृत्यु 1748 में हुयी और वो उनकी मृत्यु तक मुग़ल शासक बने रहे।

18. अहमद शाह बहादुर – 1748-54
अहमद शाह बहादुर अपने पिता के बाद 15 वर्ष की उम्र में मुग़ल शासक बने।

19. आलमगीर II – 1754-1759
आलमगीर II 1754 से लेकर 1759 तक मुग़ल साम्राज्य के शासक बने वे बादशाह जहांदार शाह के पुत्र थे।

20. शाहजहाँ III – 1759
शाहजहाँ III औरंगज़ेब का कनिष्ठ पुत्र थे। जिनका कार्यकाल बहुत काम अवधी का रहा।

21. शाह आलम II – 1759-1806, 1806-1837
शाह आलम II को मुग़ल साम्राज्य की गद्दी अपने पिता, आलमगीर II से मिली।

22. बहादुर ज़फ़र शाह II – 1837-1857

बहादुर ज़फ़र शाह II मुग़ल साम्राज्य के आखिरी बादशाह थे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रजो के खिलाफ़ लढ़े जिसमे उन्हें हार प्राप्त हुयी। हार के बाद अंग्रजों ने उन्हें अभी के म्यांमार में भेज दिया जह वो उनके मृत्यु तक रहे। और इस तरह उनके मृत्यु के साथ मुग़ल साम्राज्य का अंत हो गया।सूरी वंश के साशक थे|
============

उजबेक साहित्यकार पिरिमकुल कादिरोव ने इस उपन्यास में जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर के बारे में लिखा है , जो मावराउन्नहर और हिंदुस्तान जैसे महान राज्यों का शासक होने के साथ -साथ अपने समय के विज्ञ व्यक्तियों में भी गिना जाता था । समरकन्द से लेकर हिंदुस्तान तक के बीच मौजूद जनसाधारण की तत्कालीन सोच-समझ के साथ बाबर के बहुआयामी व्यक्तित्व को जानने -समझने का मौका मिलेगा । एक शायर ,इतिहासकार और बादशाह के रूप में असाधारण व्यक्तित्व के धनी बाबर को केन्द्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास आज किस रूप में फिर से प्रभावित करता है ।

=======

·
मुगल साम्राज्य सन् 1526 से 1857 अर्थात 331 साल का था।

अर्थात बाबर सन् 1526 में भारत के बादशाह के रूप में गद्दी पर बैठे, अकबर, बाबर के पोते थे जो 1556 में हिन्दुस्तान के शहंशाह बने, अर्थात बाबर के 30 साल बाद। बीच में 1540 से 1554 अर्थात 14 साल देश में शेरशाह सूरी का शासन था।

1556 से अकबर के बादशाह का दौर सन् 1605 तक अर्थात 49 साल चला और इसी दौर में गोस्वामी तुलसीदास का जन्म 1511 को राजापुर चित्रकूट में हुआ और उनकी मृत्यु 1623 में वाराणसी के असीघाट पर हुई, अर्थात उनका कुल जीवन 112 वर्ष का रहा। रामचरित मानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास जब 16 साल के रहे होंगे तब बाबर गद्दी पर बैठे और 17-18 साल के तुलसीदास के सामने ही रामजन्मभूमि मंदिर तोड़ कर बाबरी मस्जिद बनी।

गोस्वामी तुलसीदास बादशाह अकबर के समकालीन रहे और केवल एक “राम चरित मानस” ही नहीं बल्कि 23 पुस्तकें लिखीं।

1- रामचरितमानस
2- रामललानहछू
3- वैराग्य-संदीपनी
4- बरवै रामायण
5- पार्वती-मंगल
6- जानकी-मंगल
7- रामाज्ञाप्रश्न
8- दोहावली
9- कवितावली
10-:गीतावली
11- श्रीकृष्ण-गीतावली
12-विनयपत्रिका
13-सतसई
14-छंदावली रामायण
15-कुंडलिया रामायण
16- राम शलाका
17-संकट मोचन
18-करखा रामायण
19-रोला रामायण
20- झूलना
21- छप्पय रामायण
22- कवित्त रामायण
23-कलिधर्माधर्म निरुपण

पर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के बारे में कहीं एक लाईन ना लिख सके।

जब ऐसा कुछ होता तब तो लिखते।

सोर्स : Muhammad Zahid

=======


क्या मुगलों ने लूट लिया था भारत ?

भगत सिंह जब पेशी पर अदालत मे हाज़िर हुए तो भरी कोर्ट मे अंग्रेज़ जज ने उनसे सवाल किया कि, भगत सिंह तुमने हमारे लोगों पर बम मारा जबकि हमें आये हुए सिर्फ़ 150 साल हुए हैं और ये मुसलमान तुम पर 800 साल से हुकूमत कर रहे थे तुमने कभी इन पर बम क्यों नहीं मारा ?”

भगत सिंह मुस्कुराये और कहा, “मुसलमानों ने हम पर हुकूमत की, और ऐसी हुकूमत की कि हमारे देश को सोने की चिड़िया बना दिया, और ऐसा सोने की चिड़िया बनाया कि इस चिड़िया की चहचहाहट आप को सात समंदर पार से यहां खींच लायी, और जज साहब आपने 150 साल यहाँ कैसे राज किया।

उसको एक लाइन मे कहना चाहूं तो आपने एक स्पंज की तरह राज किया, ये स्पंज गंगा के किनारे से हीरे मोती चूस कर ले जाता और इसे जब थेम्स (लंदन की नदी) के किनारे निचोड़ा जाता तो दौलत बरसने लगती, ये जो दौलत आप यहां से भिगो-भिगो कर ले गये हैं आज (आपके यहां) सारी औधोगिक क्रांति और कारखाने उसी से आये हैं और इन मुग़लों ने हमारे देश पर ऐसा राज किया कि इसे अपना घर बना लिया और इसी की धूल मिट्टी मे अपने आपको मिला दिया। जो पैसा यहां से लिया यहीं पर खर्च कर दिया और इस देश को सोने की चिड़िया बना दिया।

जिसको भी भगत सिंह के इस कथन पर संदेह है वह जाकर उस किताब को पढ़ ले -Avaidance In Book (ग्रोवर एंड ग्रोवर पेज 169)
=========

 

First Battle of Panipat

Battles Which Changed Course Of Indian History And Established Mughal Empire .This war took place between the invader Babur from Fargana, and Delhi’s Sultan Ibrahim Lodhi in 1526. Many books, including Babur’s biography, claim Babur was invited to attack India by Lodhi’s brother, Sikander Lodhi, and Mewar’s King Rana Sanga, who thought that war with Babur would weaken the Sultan enough to defeat him. But like Ghori, Babur was mesmerized with the riches of the beautiful India, and didn’t leave after defeating the Sultan. Instead, he laid the foundation of the Mughal Empire.

Babur, later in 1527, defeated Rana Sanga in the Battle of Khanwa. But the Mughal rule was cemented in the Second Battle of Panipat in 1556, when his grandson Akbar defeated Hemu.

===========


A Mughal invasion on the Rakhine people in 1660

Bengal was absorbed within the Mughal Empire during the reign of Akbar after the Battle of Tukaroi between the Mughals and the Karrani Sultanate of Bengal and Bihar.The History of India: The Hindú and Mahometan Periods By Mountstuart Elphinstone, Edward Byles Cowell, Published by J. Murray, Calcutta 1889, Public Domain From that time Dhaka became the capital of the Mughal province of Bengal. But due to its geographical remoteness the Mughals found it difficult to govern the region. In particular, the area east of the Brahmaputra River remained outside mainstream Mughal influence. The Bengali ethnic and linguistic identity further crystallised during this period, since the whole of Bengal was united under an able and long-lasting administration. Furthermore, its inhabitants were given sufficient autonomy to develop their own customs and literature.

In 1612, during Emperor Jahangir’s reign, the defeat of Sylhet completed the Mughal conquest of Bengal, except for Chittagong. During this time Dhaka rose in prominence by becoming the provincial capital of Bengal. Chittagong was later annexed to stop Arakanese raids from the east. A well-known Dhaka landmark, Lalbagh Fort, was built during Aurangzeb’s reign.
Under the Mughal Empire which had 25% of the world’s GDP, Bengal Subah generated 50% of the empire’s GDP and 12% of the world’s GDP. Bengal, the empire’s wealthiest province, was an affluent region with a Bengali Muslim majority and Bengali Hindu minority, and was globally dominant in industries such as textile manufacturing and shipbuilding.Junie T. Tong (2016), Finance and Society in 21st Century China: Chinese Culture Versus Western Markets, page 151, CRC PressJohn L. Esposito (2004), The Islamic World: Past and Present 3-Volume Set, page 190, Oxford University PressRay, Indrajit (2011). Bengal Industries and the British Industrial Revolution (1757-1857), Routledge, The capital Dhaka had a population exceeding a million people, and with an estimated 80,000 skilled textile weavers. It was an exporter of silk and cotton textiles, steel, saltpeter, and agricultural and industrial produce.

============


♛ Officers of the Mughal Empire ♛

The Mughal Empire was one of the greatest empires ever. The Mughal Empire ruled hundreds of millions of people. Hindustan became united under one rule, and had very prosperous cultural and political years during the Mughal rule.

✿ Departments under the Mughal Empire ✿

Important Departments Functions

1. Diwan-i-Wazarat :- Department of revenue & finances
2. Diwan-i-Arz :- Military department
3. Diwan-i-Rasalatmuhtasib :- Foreign affairs department
4. Diwan-i-insha :- Custodian of govt. papers
5. Diwan-i-quza :- Justice department
6. Diwan-i-Barid :- Intelligence department
7. Diwan-i-Saman :- Dep. in charge of royal household

✿ Officers of the Mughal Empire (Centre) ✿

Central Officers :- Functions

1. Wazir :- Head of revenue department; but reduced power as 
compared to Sultanate
2. Diwan :- Responsible for all income and expenditure; control over 
Khalisa & Jagir
3. Mir Bakshi :- Headed military department, nobility, information 
and intelligence agencies
4. Mir Saman :- Incharge of imperial households (Karkhanas)
5. Diwan-i-Bayutat :- Maintained roads, govt. buildings
6. Mir Manshi :- Royal correspondence
7. Sadr-us-Sadr :- Incharge of charitable & religious endowments
8. Qazi-ul-Quzat :- Head of judicial department
9. Muhtasib :- Censor of public morals
10. Mushrif-i-Mumalik :- Accountant general
11. Mustauf-i-Mumalik :- Auditor general
12. Daroga-i-dak-chauki :- Officer in charge of imperial post
13. Mir-i-arz :- Officer in charge of petition
14. Waqia Navis :- News reporters

✿ Officers of the Mughal Empire (Province) ✿

Officer:Provincial Level Functions

1. Sipahsalar :- The Head executive
2. Diwan :- Incharge of revenue department
3. Bakshi :- Incharge of military department
4. Sadr :- Incharge of judicial department

✿ Officers of the Mughal Empire (District) ✿

Officer: District level Functions

1. Fauzdar :- Administrative Head
2. Amal/Amalguzar :- Revenue collection
3. Kotwal :- Maintenance of law & order; trial of criminal 
cases; price regulation

✿ Officers of the Mughal Empire (Pargana) ✿

Officer: Pargana Functions

1. Shiqdar :- Administrative head; combined fauzdar & 
kotwal
2. Amin, Quanungo :- Revenue officials

✿ Officers of the Mughal Empire (Village) ✿

Officer: Village Functions

1. Muqaddam :- Headman
2. Patwari :- Accountant
3. CHowkidar :- Watchman

=============


Mughal Coinage and Economy.
Coinage:-
Technically, the Mughal period in India commenced in 1526 AD when Babur defeated Ibrahim Lodhi, the Sultan of Delhi and ended in 1857 AD when the British deposed and exiled Bahadur Shah Zafar, the last Mughal Emperor after the great uprising. The later emperors after Shah Alam II were little more than figureheads.

The most significant monetary contribution of the Mughals was to bring about uniformity and consolidation of the system of coinage throughout the Empire. The system lasted long after the Mughal Empire was effectively no more. The system of tri-metalism which came to characterise Mughal coinage was largely the creation, not of the Mughals but of Sher Shah Suri (1540 to 1545 AD), an Afghan, who ruled for a brief time in Delhi. Sher Shah issued a coin of silver which was termed the Rupiya. This weighed 11.53 gms (178 grains) and was the precursor of the modern rupee. It remained largely unchanged till the early 20th Century.
Where coin designs and minting techniques were concerned, Mughal Coinage reflected originality and innovative skills. Mughal coin designs came to maturity during the reign of the Grand Mughal, Akbar. Innovations like ornamentation of the background of the die with floral scrollwork were introduced. Jahangir took a personal interest in his coinage. The surviving
gigantic coins, are amongst the largest issued in the world. The Zodiacal signs, portraits and literary verses and the excellent calligraphy that came to characterise his coins took Mughal Coinage to new heights.

The Mughal Indian coinage consisted of coins of three metals – the gold muhr , the silver rupee, and the copper dam or paisa . The basic coin constituting the main unit of account was the silver rupee. The gold muhr was used mainly either for ceremonial purposes or for hoarding. The copper dam or paisa constituted a major medium of handling small value transactions and was used extensively. A distinguishing feature of Mughal coinage was the extraordinarily high content of the relevant metal of a very high degree of purity in the coin. Thus the gold muhr which weighted 10.95 gms (169 grains troy) was practrically of unalloyed metal of high purity. The alloy content in the silver rupee, which weighted 11.53 gms (178 grains) until
Aurangzeb raised the weight to 11.66 gms (180 grains), was also never more than about 4 percent. The copper dam weighted 20.93 gms (323 grains) till 1663-4 when its weight was reduced to about two-thirds of its former value. The coins were manufactured in imperial mints spread all over the empire. The procedure followed was that of ‘free’ mintage under which anyone could bring bullion, old coins or foreign coins to a mint and obtain after a lapse of time new coins in exchange. The number of coins delivered against a given quantity of metal depended upon the purity level of the metal surrendered. This was determined at the mint. A charge was made at the mint to cover the seigniorage, the loss of metal in the process of coining, and the cost of coining which consisted partly of the cost of the necessary ingredients other than the metal and partly of the labour involved. As far as the question of the relative valuation of the coin of one metal in terms of each of the other two was concerned, this was left entirely to the market and depended upon the relative market supply and demand of each of the three metals. In the case of the silver rupee, the new coin delivered by the mint was known as the sikka rupee. The value of this coin corresponded broadly to the value of the metal contained in it, plus the minting charges including seigniorage. The problem of wear and tear of a coin through use was tackled ingeniously by a complex system of equivalence based on a varying degree of premium being enjoyed by a new coin over older issues. The sikka rupee, defined as a coin minted during the current or the previous year, enjoyed such a premium over all older issues which routinely carried the year of issue on them. The rate of this premium was controlled for all practical purposes by a class of highly experienced and influential money-dealers known as sarrafs. Once the premium enjoyed by a new over an earlier issue exceeded a threshold level, defined by the wear and tear and the cost of reminting, the old coin would simply be brought to the mint for recoinage. This would be encouraged by the government insofar as its income from seigniorage would go up. Since the coins were intrinsic and not token coins, the problem of debasement of coins did not plague Mughal coinage. It also seems that forgery of coins was generally not a major problem.

Economy :-
Economy in Mughal Empire was dependent on agriculture, trade and other industries. According to historians, since time immemorial agriculture has always been the backbone of economy of the country. Thus, in the Mughal era also agriculture was actually the biggest source of income. Moreover, it was also one of the main sources of livelihood of majority of the people in the country. The major crops that were grown during the Mughal era included millets, oilseeds, cereals, hemp, chilli, sugarcane, cotton, indigo, betel and other cash crops. Indigo cultivation was popular at that time in places various places like Agra and Gujarat. On the other hand, Ajmer was well known for the production of best quality sugarcane. Improved transport and communication facilities also helped the development of economy during the reign of Mughal emperors. There was tremendous demand for cash crops like silk and cotton as because the textile industry was flourishing during the Mughal period.

Further, during the reign of Mughal emperor Jahangir, Portuguese introduced the cultivation of tobacco and potato in India. Mughal emperor Babur introduced the cultivation of several other central Asian fruits in the country. Moreover, during the reign of Akbar Firoz Shah’s Yamuna canal was repaired for irrigation purposes. The Mughal Emperors preferred to settle in cities and towns. The artistic lifestyle of the Mughal rulers also encouraged art and architecture, handicrafts and trade in the country. During that era, the merchants and the trader class were divided into large business powers. During the Mughal era, trade both inside the country and outside grew tremendously. One of the main reasons cited by the historians for such development is the economic and political merger of India. Further, constitution of law and order over broad areas also created
favourable environs for trade and commerce.

Rapid development of trade and commerce was also supported by the improved transport and communications systems. The Mughal rulers also encouraged the monetisation of the economy. Another factor that helped in the tremendous growth of business in that period was the arrival of European traders and growth of huge European trade. Fatehpur Sikri, Lahore and Agra were the chief centres of silk weaving whereas Cambay, Broach and Surat in Gujarat were the major ports for foreign trade and business. By the time of the Mughals, cities had grown in importance. Urbanisation and fixed markets also helped in expanding economy in Mughal Empire. Initially, the weekly market concept was popular. Eventually several trade centres in prosperous cities with the growth of the economy. Besides the metalled highways, river transport system was also considered significant for navigation throughout the year. Such initiatives by the rulers were vital contributing factors in the developed economy of the era.

The Mughal Empire was one of the biggest centres of attraction for trade and commerce all over the World. There were great flourishing trade centres in Lahore, Agra, Ahmadabad, Sironj, Berhampore, Dhaka, Patna, Benares, Golconda, Deccan, Bijapur, and Daulatabad. Trade routes crisscrossed the country, the vibrant trade route of Surat- Agra passed through Sironj and Burhanpur. In fact Burhanpur had trade connections with Iran, Turkey, Russia, Poland, Arabia, and Egypt. Surat and Cambay were two prosperous ports in Gujarat which connected Mughal India with the markets of Asia and Europe. These urban centres of trade contributed about 19% to Mughal tax revenue.

Depending on the nature of trade we can classify these trade centres into two broad categories. Towns like Peshawar, Lahore, Sirhind, Allahabad, Patna and Qassimbazar (Kassimbazar) prospered because of their close proximity to the national highways or trade-routes. Secondly towns like Surat, Cambay, Satgaon, Chittagong, flourished because of their location near the sea. Apart from these towns there were manufacturing centres, each famous for its produce, Dhaka for textile, Patna for saltpetre, Biana and Sarkhel for indigo and so on. So in effect there was thriving trade going all over the Empire, both through land and sea. The commodities that were taken in and out of the country are specifically interesting. As its mentioned earlier that Bengal silk was a very attractive commodity for the Dutch and English traders. Apart from these Bengal supplied, fair amount of salt for domestic need, and handicrafts of ivory to the foreign traders. From Central Asia came horses, fruits, slaves, and gorgeous carpets, lavish dress and similar products which had huge demand in the Mughal court. The European traders brought gold bullion, choicest wine, innovative products, precious stones, glass works all the way from Europe. It is a point to remember that common Indians did not have much affinity for European products it was reserved for great connoisseurs of art and the Mughal court was full of these sorts of people. Take Jahangir for example he was presented with ‘a small whistle of gold, weighing almost an ounce, set with spark of rubies, which he took and whistled therewith almost an hour’. We may assume that Jahangir whistled better than all the birds of Mughal India put together! Jahangir’s father Shahjahan had special love for mastiffs and deer hounds. It is interesting to learn how far these presents or royal commerce were useful, in one occasion the President of Surat factory John Child was able to change the mind of the Mughal Governor by a present of two spaniels. As the common Indians did not buy anything, and the target customers of the Europeans being the Mughal royals a great amount of finance was needed to feed the European companies, it was so much that Sir Thomas Roe remarked, ‘Europe bleedeth to enrich Asia’. Cities in Gujarat like Ahmadabad, Surat, and Baroda were known for their textiles, silk weaving, in fact silk from Bengal was converted to dresses, apart from these there were various kinds of drugs and medicinal items that went abroad. To summarize the main imports of India to Europe were the calicoes (a plain-woven textile made from unbleached, and often not fully processed cotton) of Madras, the saltpetre of Bihar, silk and sugar of Bengal. As far as the exports of the Europeans were considered it was primarily to fan the fire of lavishness of the Royal Mughals while their subjects roamed the Great Empire with minimum clothing and few utensils.

Sources
●Co-existence of Standardized and Humble Money: The Case of Mughal India OM PRAKASH Delhi School of Economics University of Delhi
●SARRAFS (BANKERS) IN THE MUGHAL EMPIRE, Ishrat Alam, Department of History,A.M.U., Aliga
==============

The Gardens of Babur (Bagh-e Babur in Persian and Pashto) is a park in Kabul, Afghanistan, and also the last resting place of the first Mughal emperor, Babur. It is thought that the gardens were constructed around 1528, as detailed in Babur’s memoirs, the ‘Baburnama’. When the fifth Mughal emperor, Shah Jahan, visited it in 1638, he added a marble screen around the tombs, and built a mosque on the terrace below.

The gardens have changed much since the Mughal period. Emir Abdur Rahman Khan (d. 1901) added a pavilion and a residence for his wife, Bibi Halima, in 1880. It was converted into a public recreation space in 1933, with pools and fountains becoming the central focal point. A modern greenhouse and a swimming pool were added in the late 1970s. The grave enclosure is no longer present.

The independent Bagh-e Babur Trust has managed the gardens since 2008. Nearly 300,000 people visited the site in 2008.
============

यह वसीयतनामा बाबर का है 
This is the will of Emperor Zaheeruddin Mohammad Babur to his son Nooruddin Mohammad Humayun . In the will deed it is mentioned that Hindustan is a land of many religions & it is ur duty to give respect to all religions and its people and do justice with fair with every single person. Especially avoid slaughtering of cows, by doing this you may win the heart of Hindustani people. Give respect to temples and priests. The public should be happy with King and King with its people.

========

Emperor Babur’s tomb in Afghanistan
The one who started the Mughal Empire in Hindustan

 

==========

 

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s