मुसलमानों की बर्बादी की वजह

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नवाब राहत सईद खान छ्त्तारी साहब 1940 में उत्तर प्रदेश के गवर्नर थे अंग्रेजो ने ये अहम पोस्ट उन्हें इसलिए दी थी क्योकि वह कांग्रेस या मुस्लिम लीग के साथ ना जाकर अंग्रेजो के वफादार थे जब वो नोकरी पर थे उन्हें एक बार उन्हें सरकार काम से लंदन बुलाया गया जब वह लंदन में थे तो उनके एक बहुत ही पक्के अग्रेज दोस्त ने जो भारत में कलेक्टर रह चूका था नवाब साहब से कहा कि कि चलो तुम्हे आज एक ऐसी जगह कि सेर करा कर लाता हू जिसे आजतक कोई देख कर नही गया उस जगह पर जाने के लिये सरकार से लिखित इजाज़त लेनी होती थी इसलिए उसने सरकार से इजाज़तनामा लिया और अगले दिन वो अपनी मोटरकार से नवाब साहब को लेकर वहाँ के लिये रवाना हो गया शहर से बाहर निकलने के बाद जंगल शुरू हो चूका था और उसी जंगल से एक पतली से सड़क कटती थी गाड़ी उसी पतली सड़क पर चलने लगी जेसे जेसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी जंगल घना होता जा रहा था और दूर दूर तक किसी भी गाड़ी का नामो निशान भी नहीं था एक लंबे सफर के बाद सामने एक बड़ा गेट दिखाई दिया गेट पर पहुचने पर बहुत दूर एक ईमारत दिखाई देने लगी थी उस जगह के चारो तरफ फोजियो बहुत ही सख्त पहरा था चिड़िया का बच्चा भी बिना इजाज़त अंदर नही जा सकता था गेट पर पहरेदारो ने गाड़ी रुकवा ली और इजाज़तनामें को गौर से देखा उसके बाद कहा कि अपनी गाड़ी यही छोडिये इससे आगे आपको हमारे फोजियो कि गाड़ी में जाना होगा वह फोजियो कि गाड़ी में बैठकर आगे जाने लगे थोड़ी दूर जाने के बाद लाल पत्थर कि एक बड़ी सी इमारत नज़र आई कुछ दूर पहले अग्रेज ने गाड़ी रोक दी और कहा इससे आगे आपको पेदल ही जाना होगा अंग्रेज ने नवाब साहब से कहा हम यहाँ सिर्फ देखने आये है ध्यान रहे यहाँ कुछ भी बोलने या सवाल करने की बिलकुल भी इजाज़त नही है इमारत के शुरू में एक बहुत ही बड़ा मदन था और आगे बहुत से बड़े बड़े कमरे थे

मैदान में पहुचे तो दिखाई दिया कि एक कमरे से एक नौजवान निकलता हुआ दिखाई दिया जिसने अरबी कड़े पहने थे और सर पर अरबी रुमाल बांध रखा था दुरसे कमरे से भी कुछ ऐसे ही नौजवान निकले उन लोगो ने एक दूसरे को अरबी लहजे में सलाम किया नवाब साहब हेरान हो गए कुछ पूछना ही चाहते थे कि अंग्रेज ने इशारे से मना कर दिया आगे एक कमरे के आगे से गुज़रे तो देखा कमरे में मस्जिद जेसा फर्श पढ़ा हुआ है और एक उस्ताद नौजवानों को उसी तरह सबक पढ़ा रहे है जेसे इस्लामी मदरसों में पढ़ाया जाता है तलबा कभी अरबी तो कभी अंग्रेजी में उस्ताद से सवाल भी कर रहे थे नवाब साहब से देखा किसी कमरे में कुरानमजीद पढाया जा रहा है कही कुरान सिखाया जा रहा है कही कुरान की तफसीर का दर्स हो रहा है कही बुखारी शरीफ का दर्स हो रहा है कही मुस्लिम शरीफ का एक कमरे में मुसलमानों और ईसाइयों में मुनाजरा हो रहा था एक कमरे में मसाईलो आर बात हो रही थी सबसे बड़े कमरे में अलग अलग ज़बानों में कुरान का तर्जुमा सिखाया जा रहा था

नवाब साहब ने नोट किया बारीक़ मसले मसाईल पर हर जगह जोर दिया जा रहा था जेसे गुसल का तरीका, वजू रोज़े नमाज़ और सजदे सहू के मसाईल, विरासत के झगडे, लिबास और दाढ़ी की लम्बाई, गा कर आयात पढ़ना, गुसल जाने के आदाब, घर के बाहर आने जाने के आदाब, हज के मसले, बकरा दुम्बा केसा हो, छुरी केसी हो, कव्वा हलाल या हराम, हज बदल और कज़ा नमाज़ो की बहस, ईद का दिन केसे तय किया जाये और हज का केसे, मेज़ पर खाना खाना, पैंट पहनना जायज़ हे या नाजायज़, ओरत की अकी नापाकी के झगडे, हुजुर की मेराज रूहानी थी या जिस्मानी, इमाम के पीछे सुराह फातिहा पड़ी जायेगी या नही, तराबी आठ है या बीस, नमाज़ के दोरान वजू टूट जाये तो आदमी क्या करे, सूद जायज़ है या नाजायज़, ऐतकाफ के मसले, मिस्वाक का इस्तमाल, रोज़ा टूटने जुड़ने के मामले, ओरत बुरका पहने या चादर ओढ़े, ऊंट पर बहन भाई बेठे तो आगे बहन हो या भाई, कोनसे वजीफे पढ़े जाये

ये सब देख कर वापस हुए तो नवाब छात्तारी अंग्रेज कलेक्टर से पूछा इतने अज़ीम मदरसे को आपने छुपा कर क्यों रखा है अंग्रेज ने जवाब दिया इन सब में कोई मुसलमान नही था ये सब ईसाई है तालीम पूरी होने पर इन सभी को मुस्लिम मुल्को में खासतोर पर हिंदुस्तान, ईरान, तुर्की जेसी जगहों पर भेज दिया जाता है वहाँ जाकर ये नमाजियो से कहते है कि वो यूरोपी मुस्लमान है और उन्होंने मिस्र के जामिया अजहर जेसी यूनीवर्सिटीयो में तालीम पाई है और वो मुकम्मल आलिम है यूरोप में इतने इस्लामी इदारे मोजूद नही है जहाँ वो तालीम दे सके वो तनख्वाह नही चाहते सिर्फ खाना कपडा और सर छुपाने की जगह और खाना कपडा की दरकार है फिर वो मुअज्ज़िन, पेशइमाम या बच्चो को कुरान पढाने की खिदमत पेश करते है तालीमी इदारा हो तो उसमे उस्ताद मुकर्र हो जाते है जुमे का खुतबा तक देते है

नवाब साहब के अंग्रेज दोस्त ने यह कह कर उन्हें हेरान कर दिया कि इन मद्सो का मकसद मुसलमानों को रिवायत ज़िक्र के वजीफो और नजरी मसाइल में उलझा कर कुरान और हुजुर से दूर रखना

मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादयानी और बहाउल्लाह को नबी बनाकर खड़ा करने वाला भी यही इदारा है खबर है कि सलमान रुश्दी की किताब लिखवाने में भी इन्ही लोगो का हाथ है

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