Hazrat Sayyiduna Abdullah Bin Abdul Muttalib رَضِیَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَنْهُمَا

 

 

जनाब सैय्यदना अब्दुल्लाह रज़िअल्लाहु तआला अन्हु (वालिदे मोहतरम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम)– हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह अपने वालिद सैय्यदना अब्दुल मुत्तलिब के बड़े लाडले बेटे थे! क्योंकि हामिल नूरे मोहम्मदी थे इसलिए हुसनो जमाल मे बेमिसाल थें इनका लक़ब ज़बीह था! इसकि वजह ये बयान किया जाता है कि जब अब्दुल मुत्तलिब ने ग़ैबी इशारा पाकर चाहे ज़म-ज़म खोदने का इरादा फ़रमाया तो क़ुरैश ने सख़्त मुख़ालफ़त किया और उन्होंने इनको सख़्त परेशान किया सबब इसका ये था कि चाह ज़म-ज़म के मक़ाम के पास दो बुत नस्ब थे जिनका नाम असाफ़ और नाएला था और क़ुरैश नही चाहते थे कि इनके बुतों के दर्मियान कुँवे को खोदा जाए, लेकिन हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कुवां खोदना शुरु कर दिया (उस वक़्त उनके बेटे हारिस उनके साथ थे) उस वक़्त हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने जबकि ज़म-ज़म ज़ाहिर हो गया “नज़र” मानी की अगर अल्लाह तआला उनको दस बेटे अता फ़रमाए और वो सब जवान होकर उनके मददगार बने तो वो उनमे से एक को अल्लाह के राह मे क़ुरबान कर देंगे! एक शब हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ख़ाना काबा के क़रीब सोए हुए थे कि इन्हे ग़ैब से सुनाई दिया कि ”ऐ अब्दुल मुत्तलिब अपनी नज़र को पूरा करो जो तूने रब्बे काबा से मानी थी, वो ख़्वाब से बेदार हुए और लरज़ने लगें उन्होंने फौरन एक दुम्बां क़ुरबान करवाकर खाना बनवाया और उसे फुक़रा और मसाकीन मे तक़्सीम कर दिया! इसके बाद फिर इन्हे ख़्वाब आया कि इससे बड़ी क़ुरबानी पेश करो तो उन्होंने गाय की क़ुरबानी दिया लेकिन फिर ख़्वाब मे हुक्म हुआ कि इससे बड़ी क़ुरबानी दो तो उन्होंने ऊँट क़ुरबान करवाकर फुक़रा मे तक़्सीम करवाया इसके बाद फिर साफ़ साफ़ बता दिया गया कि तुमने अपने फरज़न्दों मे से एक को क़ुरबान करने की मन्नत मांगी थी! इस ख़्वाब पर आप निहायत दर्जा ग़मगीन हो गए और तमाम फरज़न्दों को अपने ख़्वाब से आगाह फ़रमया तो तमाम फरज़न्दों ने एक ज़बान होकर कहा कि अगर आप हममे से किसी को क़ुरबान करना चाहते हैं तो हम तैयार हैं! हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि तुम क़ुरआ अन्दाज़ी कर लो तो जिसका नाम आए उसको क़ुरबान करुंगा! जब क़ुरआ निकाला गया तो हज़रत अब्दुल्लाह का नाम आया अब्दुल्लाह निहायत हसीन जमील और बहादुर थे और हज़रत अब्दुल मुत्तलिब इनसे बहुत ज़्यादा मोहब्बत फ़रमाते थे लेकिन इसके बावजूद हज़रत अब्दुल मुत्तलिब उठे और हज़रत अब्दुल्लाह का हाथ पकड़ कर असाफ़ और नाएला के क़रीब ख़ाने काबा से मिले क़ुरैश के क़ुर्बानगाह मे ले आएं ये देखकर क़ुरैश अपनी मजलिसों से उठकर आपके पास आ गए और पूछा कि ”ऐ अब्दुल मुत्तलिब ये तुम क्या करने जा रहे हो? तब आपने पूरा वाक़ेआ उनपर वाज़ेह कर दिया! क़ुरैश ने कहा ख़ुदा तआला की क़सम ऐसा नही होगा जब तक आप मजबूर न हो जाएं इसको ज़िबाह न करे अगर आप ऐसा करेंगे तो फिर आपको देखकर हर शख़्स अपना बच्चा लाया करेगा और इस तरह नस्ले इन्सानी ख़त्म हो जाएगी! मुगैरह बिन अब्दुल्लह ने कहा अगर इसका फ़िदिया हमारे माल से है तो हम देने को तैयार है हुक्म फ़रमाएं (हज़रत अब्दुल्लाह की माँ जनाब सैय्यदा फ़ातिमा बिंत अमरू मुग़ैरह बिन अब्दुल्लाह के ख़ानदान से थीं) इसके बाद सब ने ये हल तज्वीज़ किया कि हिजाज़ मे एक अर्राफ़ा (यानी ग़ैब की बात बताने वाली) रहती है वह हालात सही सही बता देती है उसके पास चलकर इसका हल पूछते हैं! वो सब उसके पास गएं और उसने इसका हल ये बताया कि तुम अपने बेटे और दस ऊँटों को पास पास रखो और क़ुरआ करो अगर तुम्हारे बेटे का नाम क़ुरआ मे आया तो तुम दस दस ऊँटों को बढ़ाते जाओ और क़ुरआ उस वक़्त तक करते जाओ कि जब तक तुम्हारे बेटे के बजाए ऊँटों का नाम ना आ जाए और तुम्हारा रब राज़ी ना हो जाए! हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने यही किया और यहाँ तक ऊँटों की तादाद सौ हो गई और इस पर क़ुरआ ऊँटों पर आया तो सब ने रब का शुक्र अदा किया और उन ऊँटों को क़ुर्बान कर के गरीबों मे तक़्सीम किया गया!

 

हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह और सैय्यदा आमिना का निकाह– मक्का की बहुत सी नौजवान और ख़ूबसूरत लड़कियों और औरतों ने आप के हुस्न जमाल से मुतास्सिर होकर आप से शादी करने की बहुत कोशिश किया कुछ ने तो बहुत दौलत की पेशकश भी किया लेकिन आपने सब की पेशकश ठुकरा दिया! कुछ अहले किताब बाज़ निशानियों से पहचान गए थे कि नबी आख़िरुज़्ज़मां का वजूदे गिरामी हज़रत अबदुल्लाह के सुल्ब मे जलवागर है इसलिए वो इनको हलाक करने की नियत से मक्का मे आने लगे! एक दिन हज़रत अब्दुल्लाह जंगल मे किसी काम के गरज़ से तशरीफ़ लेगएं वहां मुल्के शाम के कुछ अहले किताब तल्वारों से आप पर हमलावर हो गए इत्तेफ़ाक़न हज़रत आमिना के वालिद वहब बिन मुनाफ़ भी जंगल मे मौजूद थे वो इन हमलावरों को देख कर फिक़्रमंद हो गए फिर उन्होंने देखा कि यका यक चंद सवार ग़ैब से नमुदार हुए और उनकी शकल सूरत आम इंसानो जैसी नही थी उन्होंने उन हमलावरों को मार भगाया! वहब बिन मुनाफ़ इस वाक़िये से बहुत मुतास्सिर हुए और उन्होंने ये सोच लिया कि मै अपनी लख़्ते जिगर आमिना का निकाह इनसे करूँगा! आपने अपने दोस्तों से ये पैग़ाम हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के पास भिजवाया जनाब अब्दुल मुत्तलिब जब इस बात से आगाह हुए तो वो बहुत खुश हुए और इस रिश्ते को ख़ुशि-ख़ुशि तस्लीम कर लिया और हज़रत अब्दुल्लाह का निकाह हज़रत आमिना से हो गया!

फिर वो हुआ जिससे सारी कायनात का निज़ाम बदलने वाला था, जिससे तमाम आलम को रौनक़ मिलने वाली थी, जिससे ज़िन्दगी को शऊर मिलने वाला था, जिससे फूलो को ख़ुशबू और कलियों को तबस्सुम मिलने वाला था, जिससे बहार को ताज़गी मिलने वाली थी, जिससे हवा को मौज और दरिया को रवानगी मिलने वाली थी, जिससे मशअले तारीख़ को एक नई रौशनी मिलने वाली थी, गोया पूरे कायनात को वो सब कुछ मिलने वाला था जो इससे क़ब्ल नही मिला था! वो नूर इस दुनिया मे जलवागर होने वाला था कि जिसकी दुआ इब्राहीम अलैहिस्स्लाम ने किया था, कि जिसकी बशारत ईसा अलैहिस्सलाम ने दिया था, कि जिसे जनाब सैय्यदा आमिना ख़ातून ने ख़्वाब मे देखा था!  “ दुआए ख़लील बशारते मसीहा हुआ आमिना के पहलू से हुवैदा

 

Sayyiduna Abdullah Bin Abdul Muttalib رَضِیَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَنْهُمَا is the illustrious father of our Prophet  صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَاٰلِهٖ وَسَلَّم. His honourable name is Abdullah, his kunyahs (patronymic names) are Abu Qasam (gatherer of goodness and blessings), Abu Muhammad and Abu Ahmad, and his title (laqab) is Zabeeh. (Seerat-e-Walidayn-e-Mustafa, pp. 49 – 42 abridged) His honourable father Abdul Muttalib was a leader of the Makkan Quraysh and a Chief of Banu Hashim. His real name is Shaybah and people commonly referred to him as ‘Shaybat-ul-Hamd’ due to his good deeds. (Madarij-un-Nubuwwah, vol. 2, pp. 12, abridged, Seerat-e-Walidayn-e-Mustafa, pp. 42 abridged) His honourable mother’s name is Fatimah Bint-e-Amr. (Tareekh-e-Tabari, vol. 2,, pp. 239).

Siblings (brothers and sisters)

Sayyiduna Abdul Muttalib رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ married six times on six various occasions hence Sayyiduna Abdullah has 20 siblings (brothers and sisters). Of these, he shared the same mother and father with 3 brothers and 5 sisters. With 11 of his brothers, he only shared a father and the same with one sister (she was from his father’s side only, they did not share the same mother). (Seerat-e-Walidayn-e-Mustafa, pp. 40 – 41)

Made a vow

Sayyiduna Abdul Muttalib رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ vowed that if he had ten sons and they grew up as protectors of the Quraysh he would sacrifice one of them next to the Holy Ka’bah in order to please Allah Almighty.

On the completion of this vow, he gathered his sons and informed them about his vow whilst asking them to fulfil it. They all submitted to their father’s wish. Via drawing-lots using the names of the ten sons the name of Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ was selected. Sayyiduna Abdul Muttalib proceeded to the Holy Ka’bah with his son in order to sacrifice him, however the people of Quraysh suggested not to sacrifice his son unless he had absolutely no other option, because if he went through with his intention to sacrifice his son then others would follow suit and everyone would sacrifice his son here.

Drawing lots

Thereafter the Quraysh proposed a suggestion: ‘You should take your son to visit a certain woman who is a fortune teller in Hijaaz. Tell her this issue, if she too endorses the idea of sacrificing your son then you will have total authority to sacrifice him. On the other hand, if she offers another solution which complies with the fulfilment of your vow and also prevents the sacrifice of Abdullah then you should accept that suggestion.’ Subsequently, they all embarked on the journey to visit the woman and disclosed the dilemma to her. She suggested:  ‘You should draw lots between your son and the amount of blood money that is stipulated among your people (in exchange for murder), which is ten camels; if your son’s name is drawn then increase the number of camels, repeat this until your Lord عَزَّوَجَلَّ gets pleased and a lot of the camels is drawn. Thereafter slaughter the camels in place of your son. By following my suggestion you will (both) please your Lord عَزَّوَجَلَّ as well as save your son.’ Following this conversation, they all returned to Makkah-tul-Mukarramah and drew lots between Sayyiduna Abdullah and ten camels. The name of Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ was drawn. So they added another ten camels. The number of camels gradually multiplied until it reached one hundred and only then a lot of the camels was drawn. Following this episode the people of the Quraysh and other people present there congratulated Sayyiduna Abdul Muttalib. Sayyiduna Abdul Muttalib رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ proclaimed: ‘I swear by Allah عَزَّوَجَلَّ! Unless a lot of the camels is not drawn three times I refuse to accept the result of this draw.’ Subsequently, this action was repeated thrice and each time it resulted in a lot of the camels being drawn. (As-Seerat-e-Nabawiyyah Li-ibn Hishaam, p.64 abridged)

Thereupon Sayyiduna Abdul Muttalib رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ proclaimed the Takbeer and sacrificed the camels between Safaa and Marwah. Sayyiduna Ikrimah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ reports on the authority of Sayyiduna Abdullah Bin Abbas رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُمَا: “The law in those days was that ten camels would be offered in exchange for one (human) life. Sayyiduna Abdul Muttalib رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ was the first ever individual to make an offering of one hundred camels in exchange for one life. Subsequently, this became a custom among the Quraysh as well as the rest of Arabia, and this law was maintained by Allah’s Beloved Rasool صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَاٰلِهٖ وَسَلَّم.’ (Tabaqaat-e-Ibn Sa’d, vol. 1, pp. 72)

Women who desired to marry him

Following the sacrifice event Sayyiduna Abdullah’s رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ popularity grew further.  Many young and beautiful women of Makkah-tul-Mukarramah were attracted to his handsome and captivating looks and consequently made strong endeavours to marry him.  Some even made large financial proposals (for this purpose). A few notable ones stand out more than others. A Jewish woman named Fatimah Bint-e-Murr Khath’amiyyah made a financial proposal in order to attain the Noor of the Beloved Rasool صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَاٰلِهٖ وَسَلَّم glowing from his forehead. (Tareekh-e-Tabari, vol. 2, pp. 224 abridged) Fatimah Shaamiyyah was the daughter of Syria’s king. She was second to none in beauty and appearance, she too travelled to Makkah-tul-Mukarramah in order to attain the Noor of the Beloved Rasool صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَاٰلِهٖ وَسَلَّم, but like others, she too returned without achieving her goal. (Seerat-e-Walidayn-e-Mustafa, pp. 57, 58, abridged, Shawahid-ul-Nubuwwah, pp. 28 abridged)

Conspiracy to murder Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ

Through certain signs, the people of the book realized that the existence of the Final Glorious Rasool صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَاٰلِهٖ وَسَلَّم had been entrusted in the loin (back) of Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ(Seerat-e- Walidayn-e-Mustafa, pp. 60, abridged, Madarij-un-Nubuwwah, vol.  2, pp. 12 abridged)

Therefore a group of Jews resolved not to return to their homes until they had assassinated Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ. One day he had gone outside Makkah for the purpose of hunting. These wretched individuals made an attempt to take advantage of the opportunity and withdrew their swords from their sheaths in order to launch their attack. However, in order to protect Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ, some riders appeared from the sky who assassinated those accursed Jews. By coincidence, Sayyidatuna Amina’s رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهَا noble father Sayyiduna Wahb Bin Abd-e-Munaaf witnessed this incident with his own eyes.(Madarij-un-Nubuwwah, vol. 1, pp. 182 abridged)

He gained a deep appreciation and admiration in his heart for Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ and subsequently he met Sayyiduna Abdul Muttalib رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ and expressed his desire to see his dear and beloved daughter Sayyidatuna ‘Aminah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهَا married to Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ. The proposal was accepted. Following which Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ and Sayyidatuna ‘Aminah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهَا got married. (Madarij-un-Nubuwwah, vol. 1, pp. 182 abridged)

Blessed demise

Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ accompanied caravan of the Quraysh to Syria on a business trip. During this business trip, he became ill. On its return, the caravan approached Madina-tul-Munawwarah and since Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ was ill he decided to reside in Madinah with the Banoo-Adee-Bin-Najjaar who were related to Sayyiduna Abdullah رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ through his father Abdul Muttalib’s رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ maternal grandparents. He رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُ passed away at this very place at the age of 25.  (Al-Muntazam, vol. 2, pp. 224 abridged)

Body intact even after 1400 years

According to the Nawaa-e-Waqt (a Pakistani newspaper) of 21 January 1978 during an excavation procedure in Madina-tul-Munawwarah for the expansion of Masjid Nabawi the blessed body of Sayyiduna Abdullah Bin Abdul Muttalib رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰی عَـنْهُمَا, the honourable father of our Beloved Rasool صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَاٰلِهٖ وَسَلَّم, was discovered in an absolutely intact and splendid condition despite being laid to rest more than fourteen centuries ago.

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