”मौलाना_हमीदुद्दीन_फ़राही” इस्लामिक जगत में आज भी यह नाम बड़े अदब से लिया जाता है

अल्लामा शिब्ली नोमानी, राहुल सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की इस धरती पर एक ऐसे भी शख्स ने जन्म लिया जिसका नाम भारतीय इतिहास के पन्नों में भले ही दबकर रह गया हो लेकिन इस्लामिक जगत में आज भी यह नाम बड़े अदब से लिया जाता है। इनकी पुस्तकें अरबी, उर्दू, फारसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। यही नहीं इन्होंने गुलामी के समय अंग्रेज हुक्मरान वाय सराय लार्ड कर्जन को अरब देशों में राजनीतिक सम्बन्ध बनाने के लिए दौरा कराया था। पूरे दौरे के दौरान कर्जन के दुभाषिए के रूप में साथ रहे। रिश्ते में वह अल्लामा शिब्ली नोमानी के ममेरे भाई थे। दोनों बचपन में खेले और खेलकर बड़े हुए। शिक्षा के लिए इन्होंने अपनी तमाम जमीन भी दान कर दी।

हम बात कर रहे हैं फरिहां गांव के रहने वाले मौलाना हमीदुद्दीन फराही की। इनका जन्म 18 नवम्बर वर्ष 1863 को फरिहां गांव में हुआ था। इनके पिता अब्दुल करीम आजमगढ़ के बड़े जमींदार व अधिवक्ता थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में हुई। सबसे पहले इन्होंने हाफिजा किया। उसके बाद फारसी की शिक्षा मौलवी मेंहदी हसन साहब से हासिल की। इसके बाद अरबी और फारसी की उच्च शिक्षा अपने फुफेरे भाई प्रख्यात इतिहासकार अल्लामा शिब्ली नोमानी और प्रसिद्ध #अरबिक_आलिम_फारुख_चिरैयाकोट से ली। इसके बाद अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करने के लिए इलाहाबाद के कर्नलगंज कालेज में प्रवेश लिया। हाईस्कूल, इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एएमओ कालेज अलीगढ़ में दाखिला लिया। वर्ष 1894 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री हासिल की। वर्ष 1895 में अरबी से एमए करना चाहा लेकिन नहीं कर सके। वर्ष 1897 में मदरस्तुल इस्लाम कराची में शिक्षक हो गये। वर्ष 1906 तक यहां अध्यापन का कार्य किया।

इसी दौरान भारत के वायसराय लार्ड कर्जन ने राजनीतिक सम्बन्ध मजबूत बनाने के लिए अरब देशों के दौरे की योजना बनाई। उसे ऐसे शख्स की जरूरत थी जो अरबी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं का जानकार हो और दुभाषिए की भूमिका निभा सके। काफी खोजबीन के बाद मौलाना हमीदुद्दीन फराही का नाम आया। अंग्रेज हुक्मरान ने उनसे बात की लेकिन वे लार्ड कर्जन के साथ अरब जाने से इनकार कर दिये। बाद में फुफेरे भाई अल्लामा शिब्ली नोमानी के दबाव में वे करजन के साथ विदेश जाने को तैयार हो गये। पूरे दौरे के दौरान उन्होंने दुभाषिए का काम किया। लौटने के बाद वर्ष 1907 में उनकी नियुक्ति अलीगढ़ एएमओ कालेज में बतौर अरबी प्रोफेसर के रूप में हुई। कुछ समय बाद वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अरबी प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हुए।

इनकी सेवा आन्ध्र प्रदेश के हैदराबाद निजाम ने दारुल उलूम हैदराबाद के प्रधानाचार्य पद के लिए हासिल किया। हैदराबाद में रहते हुए उनके दिमाग मेें एक ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार आया जिसमें पुरानी और नयी उर्दू की शिक्षा दी जाये। उन्होंने इसके लिए प्रस्ताव तैयार कर सरकार के सामने रखा जिसका किसी ने विरोध नहीं किया और हैदराबाद में #उस्मानियां_विश्वविद्यालय की स्थापना हो गयी। 1919 तक वे हैदराबाद में रहे और उसके बाद वहां से त्यागपत्र देकर अपने पैतृक गांव फरिहां आ गये। उसके बाद अपने गृह क्षेत्र में मदरसुल इस्लाह सरायमीर को एक उच्च शिक्षा संस्थान के रूप में विकसित करने का काम किया। अपना पूरा जीवन मदरसे के प्रचार-प्रसार व देखरेख में समर्पित कर दिया।

अपने जीवन में उन्होंने अस्सी के आसपास पुस्तकों का लेखन किया। इसमें 54 पुुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। शेष पुस्तकों के प्रकाशन के पूर्व उनके पौत्र अरबी विश्वविद्यालय लखनऊ के प्रोफेसर उबैद फराही उसका अध्ययन कर रहे हैं। निजामुल कुरआन इनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक मानी जाती है। इसके अतिरिक्त जमहरतुल बलागह, अकसामुल कुरआन, मफरेदातुल कुरआन, दलाऐल निजाम, असालिबुल कुरआन, दीवाने हमीद, असबाकन्ह नौह, दीवाने फैज आदि पुस्तकें भी विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हैं। मौलाना फराही की लिखी पुस्तकें अरबी, उर्दू, फारसी विश्वविद्यालयों में पढ़ायी जा रही हैं। उनकी ज्यादातर पुस्तकेें अरबी भाषा में लिखी गयी हैं। इस कारण अरब देशों में हमीदुद्दीन फराही काफी प्रसिद्ध हैं। जीवन के अन्तिम समय में वे बीमारी से परेशान रहे। सिर में दर्द आदि से गम्भीर रूप से ग्रसित होने दौरान 11 नवम्बर 1930 को मौलाना फराही का इन्तकाल हो गया। इन्हें मथुरा के कब्रिस्तान में में दफन किया गया। अपने जीवन काल में वे शिब्ली एकेडमी और मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी के सक्रिय सदस्य रहे।

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