हाफ़िज़ सैयद अब्दुल हसन (رحمتہ اللہ علیہ)

जब यूरोपियन देशो ने मुस्लिम इलाक़ो पे चढ़ाई शुरू की तो उनका मुकाबला करने के लिये कुछ ऐसी शेर दिल शख्सियात सामने आई जिन्होने न सिर्फ़ मुसलमानो की कीयादत और उन्हे अपनी विरासत की तरफ लौटने का पैगाम दिया बल्कि अंग्रेज़ो के सामने वो चैलेंज पेश किया की खुद अँग्रेज़ उनकी बहादुरी के सामने घुटने टेक दिये तो साथ मे उनके सामने हुस्न-ए-अख़लाक़ का वो नमूना पेश किया की जो अँग्रेज़ तारीख अब तक पेश करने मे नाकाम है जहाँ हिंदोस्तान मे अंग्रेज़ो से लोहा लेने वालो मे टीपू सुल्तान शहीद का नाम सबसे बुलंद मकाम पर है तो वही शाह अब्दुल अज़ी़ज़ मोहद्दिस देहलवी (रह.) की ज़ात-ए-मुबारका भी है जिन्होने उस समय मुल्क की कीयादत की जब इस मुल्क मे कीयादत का आकाल पड़ गया था बल्कि सैयद अहमद शहीद(रह.) ने मुज़ाहेदीन का वो लश्कर तय्यार कर दिया जिन्होने अंग्रेज़ो का मुकाबला आखरी दम तक किया और अंग्रेज़ो को मुल्क छोड़ने पे मजबूर किया ठीक इसी तरह लीबिया मे अमीर उमर मुख़्तार शहीद (रह.) ने इटली की ज़ालिम होकूमत से मुकाबला और आज़ादी के लिये जद्द-ओ-जहद की वो मिसाल कायम की आज भी दुनिया मे ज़ालिमो के खिलाफ इन्क़िलाब मे उनके नाम-ओ-तस्वीर की तख्तियो का इस्तेमाल करना काबिल-ए-फख्र और काबिल-ए-रहनुमाई समझा जाता है ठीक इसी तरह अल्जीरिया के शैख़ अब्दुल क़ादिर अल जेज़ायरी (रह.) का किरदार है..

इन्ही शख्सियात मे से एक अज़ीम मुजाहिद हैं सोमालिया के हाफ़िज़ सैयद अब्दुल हसन और ये तस्वीर उन्ही की है और मैं आज इनका मुख़्तसार सा तारूफ़ पेश कर रहा हू ताकि हम अपने माज़ी की कीयादत और उनकी जुर्रत-ओ-बहादुरी को देख सके और वैसा ही शौक पैदा करे इस उम्मत की सरबुलंदी के लिये जद्द-ओ-जहद और ज़ेहनी फ़िक्र का.

हाफ़िज़ सैयद अब्दुल हसन 7 अप्रील 1856 मे पैदा हुये

1875 मे 19 साल की उम्र मे हज करने मक्का गये और फिर जब वापस सोमालिया आये तो वहाँ अफ़रा तफ़री देखी और 1884 मे ब्रिटेन ने सोमालिया पे हमला कर वहाँ क़ब्ज़ा कर लिया था और उस समय सोमालिया के ठीक वही हालात थे जैसे हिंदोस्तान मे था यानी की छोटी छोटी रियासते थी जो आपस मे ही लड़ा करती थी ठीक वैसे ही सोमालिया मे मुसलमानो के मुख्तलीफ कबीले थे जो एक दूसरे के कट्टर दुश्मन थे और सिर्फ़ आपस मे ही लड़ा करते थे और ब्रिटेन ने इसी का फ़ायदा उठा के हमला किया और फ़ौरन बेगैर किसी परेशानी के सोमालिया पे क़ब्ज़ा कर लिया था

हाफ़िज़ सैयद अब्दुल हसन ने सभी कबीलो को इकट्ठा किया और उनके आपसी एख्तिलाफात को ख़त्म कर उन सभी को इस बात पे आमादा कर लिया की वो सब मुत्तहीद हो कर ब्रिटेन के ख़िलाफ लड़ेंगे और उन सब ने हाफ़िज़ सैयद अब्दुल हसन को अपना अमीर चुन लिया…..

हाफ़िज़ सैयद अब्दुल हसन ने सबसे पहले एक मस्जिद से ब्रिटेन के ख़िलाफ जिहाद का एलान कर ब्रिटेन की ताक़त से टकरा गये उस समय उनके पास कोई आर्थिक और न ही सैन्य मदद हासिल थी बस वो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के भरोसे ब्रीटेन से टकरा गये और जल्द ही ब्रिटेन को उन्होने शिकस्त देनी शुरू की और सिर्फ़ 7 साल के अंदर 1897 मे सोमालिया के एक तिहाई से अधिक हिस्से को ब्रीटेन से आज़ाद करा लिया और जो उन्होने इलाक़ा फ़तेह किया वहाँ इस्लामिक शरीयत नाफीज़ कर उसे दारूल इस्लाम घोषित कर दिया जिसे “दरवेश स्टेट” के नाम से जाना गया, इसलिए ब्रिटेन वाले उन्हे “पागल मुल्लाह” कह कर पुकारने लगे लेकिन ब्रिटेन ने अपनी पूरी ताक़त वहाँ झोंक दी और जंग मे इथोपीया और इटली भी ब्रिटेन की तरफ़ से कुद पड़े बिल आख़िर जंग जारी रहा “दरवेश स्टेट” 1920 तक एक आज़ाद रियासत के तौर पर क़ायम रही… लेकिन एक तरफ़ दुनिया की सुपर पावर का गठजोड़ और दुसरी जानिब क़बाईलो का लशकर जिनके पास कोई ना आर्थिक और न ही सैन्य मदद हासिल थी बस वो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के भरोसे जंग कर रहे और उन्हे कामयाबी भी मिली पर बिल आख़िर ये मर्दे मुजाहिद का लशकर 1920 मे जा कर जंग हार गया कयोंके इनके क़िले पर ब्रिटेन ने बमबारी कर तहस नहस कर दिया था..फिर हाफ़िज़ सैयद अब्दुल हसन नाम के मर्दे मुजाहिद का इंतक़ाल इफ़लुएंज़ा को वजह कर 64 साल की उमर मे 21 दिसम्बर 1920 को हो जाता है पर मरने से पहले इन्होने अपने मुल्क के लोगो को इतना इंक़लाबी बना दिया की आख़िरकार ब्रिटेन को सोमालिया आज़ाद करना पड़ा.

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