हज़रत मौलाना क़ारी ख़्वाजा जलालुद्दीन खिज़्र रूमी शाह रहमतुल्लाह अलैह

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हयाते मुबारका हज़रत मौलाना क़ारी ख़्वाजा जलालुद्दीन खिज़्र रूमी शाह रहमतुल्लाह अलैह

सुलतानुल औलिया हज़रत कि़बला ख़्वाजा हसन शाहؓ ने अपने जि़ंदगी का हर लम्हा, सिलसिलए आलिया जहांगीरिया को बढ़ाने व फैलाने के लिए वक़्फ़ कर दिए। इस कुरबानी व मेहनत का ये नतीजा निकला कि हिन्दुस्तान व उसके बाहर के इलाकों में इस सिलसिले का परचम लहराने लगा और आसमाने तसव्वुफ़ में कई सितारे अपनी चमक बिखेरने लगे।

ऐसे ही एक सितारे हज़रत मौलाना क़ारी ख़्वाजा जलालुद्दीन खिज़्र रूमीؓ, जिन्होंने न जाने कितने दिलों को मारफ़त की चमक से रौशन कर दिया, न जाने कितने प्यासों को रूहानियत का जाम पिलाया और न जाने कितनों की जि़ंदगी में मुहब्बत भर दिया। आपके चाहनेवाले आपको कभी आपके लक़ब ‘खिज़्र’ से याद करते हैं तो कभी ‘इमामुल मुहब्बत’ (यानी मुहब्बत के ईमाम) पुकारते हैं। आप अपनी मिसाल आप हैं।

आपका ताल्लुक भारत के दिल यानी मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) से है। अगर ये कहा जाए कि आप यहां के ‘रूहानी सुल्तान’ हैं तो ग़लत न होगा। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर, वो खुशनसीब और मुबारक शहर है, जिसे आपके ‘आबाई वतन’ (यानी मातृभूमि) होने का फ़ख्र हासिल है। आपको हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, फ़रसी और अरबी जैसी ज़बानों के साथ साथ ‘छत्तीसगढ़ी’ में भी महारत हासिल थी। आपके ईल्म का हर कोई लोहा मानता और दूर दूर तक आपके चर्चे थे।

जलाल व जमाल से आरास्ता आपकी ज़ाते गिरामी, कुदरत की सख़ावत से भी मालामाल थी। ज़हानत व ज़क़ावत से भी कुदरत ने आपको नवाज़ा। तालीमी दर्सगाह में क़ाबिल उस्ताद, लायक और फ़रमाबरदार शागिर्द इकट्ठे हो जाएं तो तहसील ईल्म के नताजे, यक़ीनी तौर पर बेहतरीन बर आमद होंगे।

आपने ज़ाहिरी ईल्म हासिल करने के बाद आपने रायपुर को अपनी इमामत से भी नवाज़ा। फिर आपने ड्राफ्ट्समैन की नौकरी की। लेकिन आपकी जुस्तजू रूहानियत की तरफ़ ज़्यादा रही। इसी वास्ते आपने बहुत से सफ़र भी किए, पर आपको सुकून नहीं मिला। मिलता भी कैसे, कुदरत ने तो आपको सिलसिलए जहांगीरी के लिए मुक़र्रर कर रखा था।

फ़राएज़ शरय्या की अदायगी के साथ मुलाज़मत के फ़राएज़ भी, ज़िम्मेदारी और हुस्नो खुबी के साथ अन्जाम देते रहे। लेकिन साथ ही अपने तौर से ज़िक्र व फि़क्र का सिलसिला भी जारी रखा। इन्हीं अय्याम में ताजदारे सिलसिलए जहांगीरी यानी सुल्तानुल आरफे़ीन हज़रत मुहम्मद नबी रज़ा शाहؓ से रूहानी तौर पर निसबत क़ायम हुई। जिसकी वजह से मुजाहिदे में फ़ैज़ान का रंग साफ़ झलकने लगा। लेकिन इस फ़ैज़ान का ज़हूर और तकमील उस वक़्त हुई, जब हज़रत ख़्वाजा हसन शाहؓ के दस्ते हक़ पर बैअत हुए। इसके बाद आपके ज़ाहिर व बातिन में बहुत ज़्यादा बदलाव आया। कुर्ता, सदरी और तहबंद के साथ सर पर ताजे जहांगीरी, इस लिबास में जो भी आपको देखता, हज़ार जान से फि़दा हो जाता।

पीरो मुर्शिद की महफि़ल में अपने साथ के लोगों में आपको कुदरती तौर पर नुमायां खुसूसियात हासिल थी। आप अक्सर ऐसी मजलिसों में उर्दू व फ़ारसी के बामक़सद व बेहतरीन अश्आर व ग़ज़लें निहायत ही पुरसोज़ और वालेहाना अंदाज़ में इस तरह पढ़ते कि अहले महफि़ल पर वज्द तारी हो जाता। फ़ातेहा के मौके पर कुरान की कि़रत हो या शजरा ख़्वानी हो हमेशा आप ही आगे होते। आपका लिखा ‘शिजरा मन्जूम अरबी’ आज भी खानकाहे हसनी और खानकाहे जहांगीरी में मक़बूल है।

आपके पीरो मुर्शिद दीन के मामले में बहुत सख़्त मिजाज़ थे। उनका हुक्म पत्थर की लकीर हुआ करती थी। जो काम बोलते मुरीद पर उसे अदा करना ज़रूरी होता था। ये सख़्ती दरअस्ल जौहरी का वो हुनर था, जो एक हीरे को पहचानता था। और अंदाज़ भी निराला, मुरीदों को आराम नहीं करने देते, हमेशा किसी न किसी काम में मशगूल रखते। कहीं भी इबादत रियाज़त में लगा देते, न दिन देखते न रात, न जगह न हालात। कभी किसी कब्रस्तान में रात भर ज़िक्र करने कहते तो कभी सुनसान इलाके में चिल्ला करवा देते।

12 सालों तक इसी भट्टी में पक कर खिज़्र रूमी शाहؓ एक हज पैदल अदा फ़रमाए और एक हज अपने पीरो मुर्शिद के साथ अदा फ़रमाए। कई चिल्ले किए और कई साल रूहानी सफ़र में रहे, जिसमें पैदल चिटगांव (बंगलादेश) का सफ़र भी शामिल है। इसी सफ़र का ज़िक्र करते हुए आप फ़रमाते हैं. ‘हुज़ूर ने मुझे यकायक चिटगांव के सफ़र में जाने का हुक्म दे दिया। मेरे पास न ज़रूरी सामान था और न ही कोई तैय्यारी थी। लेकिन पीर का हुक्म खुदा का हुक्म होता है। मैं सफ़र पर निकल गया। कभी मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगती तो मैं पलट पलट कर देखता, हुज़ूर को याद करता। यक़ीन जानिए हुज़ूर हमेशा मेरे साथ ही रहे। सफ़र में मुझे कोई न कोई मिल जाता जो खाना खिला देता। इससे बड़े करम की बात क्या होगी कि मेरे हुज़ूर ने कभी मुझे तीन दिनों से ज़्यादा भूखा नहीं रखा। ये उन्हीं की इनायत है कि मुझसे अपना काम ले लिया।’

पीरो मुर्शिद ने आपको शफ़ेर् खिलाफ़त से नवाज़ा और ‘सी.पी. एण्ड बरार’ में सिलसिले के रूहानियत को फैलाने पर मामूर किया। (पहले मध्यप्रदेश व विदर्भ मिलकर एक प्रदेश था, जिसका का नाम ‘सी.पी एण्ड बरार’ था और राजधानी नागपूर थी। बाद में विदर्भ अलग होकर महाराष्ट्र में मिल गया। अब तो मध्यप्रदेश से भी छत्तीसगढ़ अलग हो गया है।) पीर ने हीरे होने की तस्दीक कर दी थी। अब रौशनी बिखेरने का वक़्त आ गया। आपने वो रौशनी बिखेरी कि लाखों दिलों को रूहानियत से रौशन कर दिया। आज भी वो दीवानगी देखी जा सकती है। आपने कुछ वक़्त बाराबंकी व रायपुर को इमामत से सरफ़राज़ करने के बाद, दुर्ग में खानकाह की बुनियाद रखी। उस इलाके में ये किसी भी सिलसिले की पहली खानकाह थी। आपने भी बहुत से ख़लिफ़ा मुकर्रर किए। इनकी तादाद 40 मानी जाती है लेकिन ‘निगारे यज़दां’ में 60 के करीब बताई गयी है।

ये मुख़्तसर सी सवाने हयात तो एक तरह से तारूर्फ ही है। आपने रूहानियत का वो मुक़ाम हासिल किया और वो कारनामा अंज़ाम दिया है कि अगर उसे कलमबंद किया जाए तो अलग से एक ज़ख़ीम किताब तैय्यार हो जाए। जबकि आपने 12 साल जो पीरो मुर्शिद की ख़िदमत में गुज़ारे और जो रूहानी मामलात गुज़रे, उन्हें बयान करने की हमारे क़लम की हैसियत ही नहीं।

हयाते मुबारका हज़रत मौलाना क़ारी ख़्वाजा जलालुद्दीन खिज़्र रूमी शाह रहमतुल्लाह अलैह

सुलतानुल औलिया हज़रत कि़बला ख़्वाजा हसन शाहؓ ने अपने जि़ंदगी का हर लम्हा, सिलसिलए आलिया जहांगीरिया को बढ़ाने व फैलाने के लिए वक़्फ़ कर दिए। इस कुरबानी व मेहनत का ये नतीजा निकला कि हिन्दुस्तान व उसके बाहर के इलाकों में इस सिलसिले का परचम लहराने लगा और आसमाने तसव्वुफ़ में कई सितारे अपनी चमक बिखेरने लगे।

ऐसे ही एक सितारे हज़रत मौलाना क़ारी ख़्वाजा जलालुद्दीन खिज़्र रूमीؓ, जिन्होंने न जाने कितने दिलों को मारफ़त की चमक से रौशन कर दिया, न जाने कितने प्यासों को रूहानियत का जाम पिलाया और न जाने कितनों की जि़ंदगी में मुहब्बत भर दिया। आपके चाहनेवाले आपको कभी आपके लक़ब ‘खिज़्र’ से याद करते हैं तो कभी ‘इमामुल मुहब्बत’ (यानी मुहब्बत के ईमाम) पुकारते हैं। आप अपनी मिसाल आप हैं।

आपका ताल्लुक भारत के दिल यानी मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) से है। अगर ये कहा जाए कि आप यहां के ‘रूहानी सुल्तान’ हैं तो ग़लत न होगा। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर, वो खुशनसीब और मुबारक शहर है, जिसे आपके ‘आबाई वतन’ (यानी मातृभूमि) होने का फ़ख्र हासिल है। आपको हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, फ़रसी और अरबी जैसी ज़बानों के साथ साथ ‘छत्तीसगढ़ी’ में भी महारत हासिल थी। आपके ईल्म का हर कोई लोहा मानता और दूर दूर तक आपके चर्चे थे।

जलाल व जमाल से आरास्ता आपकी ज़ाते गिरामी, कुदरत की सख़ावत से भी मालामाल थी। ज़हानत व ज़क़ावत से भी कुदरत ने आपको नवाज़ा। तालीमी दर्सगाह में क़ाबिल उस्ताद, लायक और फ़रमाबरदार शागिर्द इकट्ठे हो जाएं तो तहसील ईल्म के नताजे, यक़ीनी तौर पर बेहतरीन बर आमद होंगे।

आपने ज़ाहिरी ईल्म हासिल करने के बाद आपने रायपुर को अपनी इमामत से भी नवाज़ा। फिर आपने ड्राफ्ट्समैन की नौकरी की। लेकिन आपकी जुस्तजू रूहानियत की तरफ़ ज़्यादा रही। इसी वास्ते आपने बहुत से सफ़र भी किए, पर आपको सुकून नहीं मिला। मिलता भी कैसे, कुदरत ने तो आपको सिलसिलए जहांगीरी के लिए मुक़र्रर कर रखा था।

फ़राएज़ शरय्या की अदायगी के साथ मुलाज़मत के फ़राएज़ भी, ज़िम्मेदारी और हुस्नो खुबी के साथ अन्जाम देते रहे। लेकिन साथ ही अपने तौर से ज़िक्र व फि़क्र का सिलसिला भी जारी रखा। इन्हीं अय्याम में ताजदारे सिलसिलए जहांगीरी यानी सुल्तानुल आरफे़ीन हज़रत मुहम्मद नबी रज़ा शाहؓ से रूहानी तौर पर निसबत क़ायम हुई। जिसकी वजह से मुजाहिदे में फ़ैज़ान का रंग साफ़ झलकने लगा। लेकिन इस फ़ैज़ान का ज़हूर और तकमील उस वक़्त हुई, जब हज़रत ख़्वाजा हसन शाहؓ के दस्ते हक़ पर बैअत हुए। इसके बाद आपके ज़ाहिर व बातिन में बहुत ज़्यादा बदलाव आया। कुर्ता, सदरी और तहबंद के साथ सर पर ताजे जहांगीरी, इस लिबास में जो भी आपको देखता, हज़ार जान से फि़दा हो जाता।

पीरो मुर्शिद की महफि़ल में अपने साथ के लोगों में आपको कुदरती तौर पर नुमायां खुसूसियात हासिल थी। आप अक्सर ऐसी मजलिसों में उर्दू व फ़ारसी के बामक़सद व बेहतरीन अश्आर व ग़ज़लें निहायत ही पुरसोज़ और वालेहाना अंदाज़ में इस तरह पढ़ते कि अहले महफि़ल पर वज्द तारी हो जाता। फ़ातेहा के मौके पर कुरान की कि़रत हो या शजरा ख़्वानी हो हमेशा आप ही आगे होते। आपका लिखा ‘शिजरा मन्जूम अरबी’ आज भी खानकाहे हसनी और खानकाहे जहांगीरी में मक़बूल है।

आपके पीरो मुर्शिद दीन के मामले में बहुत सख़्त मिजाज़ थे। उनका हुक्म पत्थर की लकीर हुआ करती थी। जो काम बोलते मुरीद पर उसे अदा करना ज़रूरी होता था। ये सख़्ती दरअस्ल जौहरी का वो हुनर था, जो एक हीरे को पहचानता था। और अंदाज़ भी निराला, मुरीदों को आराम नहीं करने देते, हमेशा किसी न किसी काम में मशगूल रखते। कहीं भी इबादत रियाज़त में लगा देते, न दिन देखते न रात, न जगह न हालात। कभी किसी कब्रस्तान में रात भर ज़िक्र करने कहते तो कभी सुनसान इलाके में चिल्ला करवा देते।

12 सालों तक इसी भट्टी में पक कर खिज़्र रूमी शाहؓ एक हज पैदल अदा फ़रमाए और एक हज अपने पीरो मुर्शिद के साथ अदा फ़रमाए। कई चिल्ले किए और कई साल रूहानी सफ़र में रहे, जिसमें पैदल चिटगांव (बंगलादेश) का सफ़र भी शामिल है। इसी सफ़र का ज़िक्र करते हुए आप फ़रमाते हैं. ‘हुज़ूर ने मुझे यकायक चिटगांव के सफ़र में जाने का हुक्म दे दिया। मेरे पास न ज़रूरी सामान था और न ही कोई तैय्यारी थी। लेकिन पीर का हुक्म खुदा का हुक्म होता है। मैं सफ़र पर निकल गया। कभी मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगती तो मैं पलट पलट कर देखता, हुज़ूर को याद करता। यक़ीन जानिए हुज़ूर हमेशा मेरे साथ ही रहे। सफ़र में मुझे कोई न कोई मिल जाता जो खाना खिला देता। इससे बड़े करम की बात क्या होगी कि मेरे हुज़ूर ने कभी मुझे तीन दिनों से ज़्यादा भूखा नहीं रखा। ये उन्हीं की इनायत है कि मुझसे अपना काम ले लिया।’

पीरो मुर्शिद ने आपको शफ़ेर् खिलाफ़त से नवाज़ा और ‘सी.पी. एण्ड बरार’ में सिलसिले के रूहानियत को फैलाने पर मामूर किया। (पहले मध्यप्रदेश व विदर्भ मिलकर एक प्रदेश था, जिसका का नाम ‘सी.पी एण्ड बरार’ था और राजधानी नागपूर थी। बाद में विदर्भ अलग होकर महाराष्ट्र में मिल गया। अब तो मध्यप्रदेश से भी छत्तीसगढ़ अलग हो गया है।) पीर ने हीरे होने की तस्दीक कर दी थी। अब रौशनी बिखेरने का वक़्त आ गया। आपने वो रौशनी बिखेरी कि लाखों दिलों को रूहानियत से रौशन कर दिया। आज भी वो दीवानगी देखी जा सकती है। आपने कुछ वक़्त बाराबंकी व रायपुर को इमामत से सरफ़राज़ करने के बाद, दुर्ग में खानकाह की बुनियाद रखी। उस इलाके में ये किसी भी सिलसिले की पहली खानकाह थी। आपने भी बहुत से ख़लिफ़ा मुकर्रर किए। इनकी तादाद 40 मानी जाती है लेकिन ‘निगारे यज़दां’ में 60 के करीब बताई गयी है।

ये मुख़्तसर सी सवाने हयात तो एक तरह से तारूर्फ ही है। आपने रूहानियत का वो मुक़ाम हासिल किया और वो कारनामा अंज़ाम दिया है कि अगर उसे कलमबंद किया जाए तो अलग से एक ज़ख़ीम किताब तैय्यार हो जाए। जबकि आपने 12 साल जो पीरो मुर्शिद की ख़िदमत में गुज़ारे और जो रूहानी मामलात गुज़रे, उन्हें बयान करने की हमारे क़लम की हैसियत ही नहीं।

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हज़रत अबूदरदाؓ से मरवी है कि हज़रत मुहम्मदﷺ  ने फ़रमाया कि ‘‘अल्लाह के नज़दीक सबसे बेहतरीन अमल ज़िक्र है। ज़िक्र सबसे ज्यादा पाकीज़ा और रूहानी दरजात को बुलन्द करने वाला है। ये सोना चांदी ख़ैरात करने से और जिहाद करने से भी अफ़ज़ल अमल है।’’

(तिरमिजी:3377, इब्नेमाजा:379)

 

‘ऐ ईमानवालो! अल्लाह का ज़िक्र बहुत बहुत किया करो।’

(कुरान 41:33)

‘उस (अल्लाह) का ज़िक्र किया करो, जैसे (तरीक़े) उसने तुम्हें हिदायत फ़रमाई है।’

(कुरान 2:198)

 

ज़िक्र की बरकतों और अज़मतों की कोई हद नहीं है। जो जितनी यकसूई (ध्यान से) और तड़प से इसे अदा करेगा उसे उतना ही फ़ैज और फ़ायदा हासिल होगा। ज़िक्र, दिल की वो आग है जो ख़ुदा की याद के अलावा बाक़ी सब जला देती है। सिफ़ाते बशरीया का पहाड़ इसी ‘लाईलाहा इल्लल्लाह’ के ‘ला’ से तोड़ा जा सकता है और यही ‘ला’ ही सारे माबूदाने बातिल की नफ़ी करता है।

ख़्वाजा बन्दानवाज़ गेसूदराज़ؓ फ़रमाते हैं- जो भी ज़िक्र अज़कार, सूफ़ीयों की बारगाह में अदा किए जाते हैं, वो सब हज़रत मुहम्मदﷺ  से सीना ब सीना पहुंचे हैं। आपﷺ  ने सहाबा को ज़िक्र की तालीम फ़रमाई और करने का तरीक़ा व क़ाएदा बताया। बिल्कुल वही क़ायदा व तरीक़ा, खुलफाए राशिदीन से सहाबी, फिर उनसे ताबेईन, उनसे सिलसिले के बुजूर्गों से होता हुआ, सीना ब सीना हम तक पहुंचा है।

हुज़ूरﷺ  ने फ़रमाया- ऐ अलीؓ! आओ हम तुम्हें वो राह बताएं, जिससे तुम अल्लाह को देख सकोगे। फिर फ़रमाया- कहो ‘लाइलाहा इल्लल्लाह’। तो हज़रत अलीؓ ने फ़रमाया- या रसुलल्लाह! इसे तो हम हमेशा पढ़ते हैं। तो आपने फ़रमाया- जैसा मैं कहता हूं और जैसा करता हूं, वैसा करो। और इसी तरह आगे भी किया करो। और लोगों को भी बताया करो।

ख़्वाजा बन्दानवाज़ؓ ने ज़िक्र अज़कार करने के तरीक़े के बारे में, हज़रत अलीؓ, हज़रत सिद्दीक़ؓ, हज़रत बिलालؓ, हज़रत सलमानؓ जैसे सहाबियों से और बड़े बड़े मशायखों से मरवी तकरीबन 54 रिवायतें, अपने रिसाले में दर्ज किए हैं।

ज़िक्र ज़र्ब ख़फ़ी का तरीक़ा

अच्छी तरह पाकसाफ व बावजू होकर, पीर के सामने दोजानू होकर बैठें। अगर पीर साहब हाज़िर न हों तो उनका तसव्वुर कर, उन्हें शामिले हयात समझें। दोजानू इस तरह बैठें कि सीधे पैर का पंजा खड़ा हो और दूसरा लेटा हो, और हाथ जानू पर रखें। पहले दरूद शरीफ़ पढ़ें।

फिर सिर को बाएं घुटने की तरफ़ (दिल की तरफ) झुका लें और ‘ला’ कहते हुए दाहिने घुटने तक ले आएं। फिर ‘इलाहा’ कहते हुए, सिर को दाहिने कंधे से थोड़ा पीछे की तरफ़ ले जाएं। और ये ख़्याल करें कि ‘रब के सिवा दिल में जो कुछ भी है, उसे दूर फेंकता हूं।’ फिर ‘इल्लल्लाह’ कहते हुए सिर को सामने, दिल की तरफ़ ज़ोर से ज़र्ब लगाएं। और ये ख़्याल करें कि ‘सिर्फ उस एक ज़ात को अपने दिल में बसाता हूं।’ इसे ‘चार ज़रबी’ भी कहते हैं, क्योंकि इसमें चार ज़र्ब हैं। 1.बाएं घुटने पर, 2.दाएं घुटने पर, 3.दाएं कंधे पर और 4.दिल पर।

ज़िक्र पास अनफ़ास ख़फ़ी

इसके लिए सांस बाहर छोड़ते वक़्त ‘ला ईलाहा’ दिल में पढ़ते हुए ये तसव्वुर करें कि ‘रब के सिवा दिल में जो कुछ भी है, उसे दूर फेंकता हूं।’ और सांस लेते वक़्त ‘इल्लल्लाह’ ख्याल करते हुए, दिल पर ज़र्ब करें। और ये तसव्वुर करें कि ‘सिर्फ उस एक ज़ात को अपने दिल में बसाता हूं।’ इस ज़िक्र में जुबान से कुछ नहीं कहते और न ही सर या हाथ वगैरह हिलाते हैं। और न ही बहुत ज़ोर ज़ोर से सांस की आवाज़ निकालें। इस ज़िक्र को चलते, फिरते, काम करते हुए भी कर सकते हैं।

यहां ये याद रखें कि ज़िक्र का पूरा तरीका लिखकर नहीं समझाया जा सकता।

इसे अपने पीरो मुर्शिद से सीख कर और उनकी इजाज़त से ही, सहीं तौर पर अदा किया जा सकता है।

 

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यहां हम सूफ़ी जलालुद्दीन ख़िज़्र रूमी रज़ी. की तालिमात से फ़ैज़ हासिल करेंगे।

आप ज़िक्र की बहुत तालीम फ़रमाते हैं इसलिए आईए सबसे पहले इसी के बारे में बात करते हैं...

शौक़ है गर, हक़ परस्ती का,

तो सुन, ऐ बेखबर!

कर परस्तिश ज़ाते मौला,

देख सूरत पीर की।

जुबां से ख़ुदा के नाम का विर्द करें

और दिल को जमाले मुर्शिद से रौशन रखें।

तुम मुझे याद करो मैं तुम्हें याद करूंगा…

क़ुरान 2:151

…अल्लाह ही के ज़िक्र से दिल को इत्मीनान मिलता है।

क़ुरान 13:28

हज़रत अबूहुरैरा रज़ी. से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया कि ”जो लोग अल्लाह का ज़िक्र करने बैठते हैं तो उनके चारों तरफ फरिश्ते भी आकर बैठ जाते हैं। अल्लाह की रहमतें बरसने लगती हैं। उन (ज़िक्र करनेवालों) को सुकून व चैन नसीब होता है। अल्लाह अपनी मजलीस में (फरिश्तों व पैगम्बरों की रूहों से) उनका ज़िक्र करता है।”

(मुस्लिम)

हज़रत अनस रज़ी. से रवायत है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया कि

”अल्लाह अल्लाह कहनेवाले किसी शख्स पर कयामत नहीं आएगी

यानि कयामत तब तक नहीं आएगी जब तक कि

एक भी अल्लाह अल्लाह कहनेवाला दुनिया में मौजूद है।”

(मुस्लिम:148, अहमद:12682, तिरमिजी:2207)

सूफ़ीयों के नज़दीक ज़िक्र के मायने है ख़ुदा को याद करना। अज़कार, ज़िक्र का बहुवचन है। सारे सिलसिलों में ज़िक्र पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। क्योंकि रूहानियत के आला से आला मुकाम व मरतबा हासिल करने के लिए ज़िक्र ज़रूरी है। रब की राह में सारा दारोमदार ज़िक्र पर है, इसके बग़ैर कोई उस तक नहीं पहुंच सकता।

हज़रत अब्दुल हई शाह रज़ी. फ़रमाते हैं कि ज़िक्र ज्यादा से ज्यादा होने से, रहमते मौला होती है और मुरीद, सुलूक में तरक्की करते हुए, उंचे से उंचा मरतबा हासिल करता है। ज़िक्र मकामे क़ल्ब से मकामे रूह तक पहुंच जाता है। यानि मलकूत से ज़िक्र तरक्की करते हुए जबरूत में असर करेगा और ज़ाकिर (ज़िक्र करनेवाले) के क़ल्ब में ‘अल्लाहू’ ज़िक्र इस्म ज़ात जारी होगा। इसके बाद मुरीद और तरक्की करके क़ल्बे मुदव्वर यानि उम्मुद्दिमाग़, जिसको मकामे लाहूत कहते हैं, में पहुंचेगा तो ज़िक्र ”हू” खुद ब खुद जारी होने लगेगा।

गैर हक़ की तरफ मशगुल रहना दिल की एक बीमारी है। ये तीन तरह के होती है- पहला नफसानी (इन्द्रिय), जिसमें आपका नफ्स हमेशा आपको बहकाता रहता है, दूसरा वो जो अचानक दिल में आ जाता है, तीसरा वो जिसकी वजह से दिल को सुकून नहीं रहता।

रूह की सही हालत ये है कि वो अपने रब से निसबत रखे और कोई चीज उससे दूर करने वाली न हो। अगर निसबत कायम न हो या इससे दूर करने वाली चीज मौजूद हो या दोनों हो तो ये मरज़े दिल की निशानी है।

इसका सबसे अच्छा इलाज ज़िक्र है। लेकिन ज़िक्र का मतलब सिर्फ जबानी शोरगुल नहीं है बल्कि दिलो दिमाग बदन में एक कैफ़ियत तारी होना चाहिए। इसके लिए एक सूनी व साफ़ जगह पर दोजानू बैठ जाएं और बड़े ही अक़ीदत व मुहब्बत से ख़ुदा के नाम का विर्द करें और दिल को जमाले मुर्शिद से रौशन रखें। ऐसा तब तक करें जब तक कि इस ज़िक्र की गर्मी पूरे बदन में रोएं रोएं में महसूस न होने लगे। इसी वक्त मकाशिफात व अनवार की आंख खुलती है और इन्सान इससे फैज़याब होता है।

ज़िक्र से खुद के कुछ न होने का और ख़ुदा का सबकुछ होने का एहसास होता है।

हज़रत मौलाना अब्दुल हई रज़ी. फ़रमाते हैं कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ को ज़िक्र नफ़ी व असबात कहते हैं। इसके चार तरीक़े हैं-

1.क़दिरिया जली,

2.ज़र्ब ख़फ़ी,

3.पासन्फ़ास ख़फ़ी और

4.हबस-ए-दम ख़फी।

 

नोट- ज़िक्र का पूरा तरीका लिखकर नहीं समझाया जा सकता। इसे अपने शैख़ की सरपरस्ती में ही पूरी तरह से अदा किया जा सकता है।