सुल्तान मोहम्मद फातेह

(1)सुलेमान शाह
(बेटे)
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(2)गाज़ी अल तुगरल (Ertgrule Gaazi)
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(3)सुल्तान उस्मान गाजी
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(4)सुल्तान ओरहान गाज़ी
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(5)सुल्तान मुराद गाज़ी अव्वल
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(6)सुल्तान बा-यज़ीद अव्वल
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(7)सुल्तान मोहम्मद अव्वल
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(8)सुल्तान मुराद सानी
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(9)सुल्तान मोहम्मद फातेह

⚔️⚡तारीख की अज़ीम जंग कुस्तुन्तुनिया⚡⚔️

सुल्तान मोहम्मद अल फातेह इससे पहले दो बार सुल्तान बने उनके वालिद ने उन्हें 14 साल की उम्र पहली बार फिर एक बार उसके बाद गद्दी पर मुन्तख़ब किया ,लेकिन ना कामयाब रहे । इसके बाद सुल्तान मुराद सानी ने मोहम्मद फातेह को दीनी तालीम हासिल करने के लिए एड्रिन भेजा जहा उन्होंने दीनी तालीम हासिल की इस्लाम की तारीख को पढा उसके बाद जब तीसरी मर्तबा वो सुल्तान बने मुराद सानी के विसाल के बाद उस वक़्त अवाम का ये ख्याल था के वो एक काबिल सुल्तान साबित नही होंगें लेकिन सुल्तान की काबिलियत धीरे धीरे सब को समझ मे आने लगी ।

उनके गद्दी नशीन होते ही सौतेले भाई को क़त्ल करने वाला जेनिससेरी फ़ौज़ का सिपाह सालार, जो असल में एक जासूस था ,उसको हिकमत अमली से मौत की सजा देना और जेनिस्सेरी फ़ौज़ का भरोसा बनाये रखना काबिले तारीफ था ।

नोट: ये सब वाक़ियात इस सीजन के बाद जब ,जासूसों, पे सीरिज बनाऊँगा तो तफसील से सारी दास्तान बयान करुंगा, अभी सिर्फ जंगो ओर फतुहात को बयान कर रहा हु.

सुल्तान मोहम्मद फातेह ने कुस्तुन्तुनिया फ़तेह करने के लिए सबसे पहले दो काम किए एक तो आस पास की रियासतों से मुहाइदा करलिया ताके अमन क़याम रहे और उनको कुस्तुन्तुनिया के अलावा दूसरी तरफ कोई जंग ना करनी पड़े इसी के साथ दूसरा ये की एक ऐसी ताक़तवर तोप बनवाई जाए जो कुस्तुनुतिया कि दीवार को ढा सके.

15 वी सदी के शूरू में जो तोपे बनती थी वो Sulfur, Saltpeter, ओर Chrcoal से गोले तय्यार किए जाते थे और इन सारी चीज़ों को मैदान जंग में ही मिक्स करके तोप में भरा जाता था ,ओर जब फायर किया जाता तो ये गोला टारगेट पे गिरने के बाद धमाके से नही फटता था ,धीरे धीरे जलता रहता था इस वजह से टारगेट को ज्यादा नुकसान नही होता था.

इस मसले की वजह से सुल्तान चाहते थे कि कोई नई तकनीक से बेहतर तोप बने जो टारगेट को ज्यादा नुकसान पोहचाए

सुल्तान मोहम्मद फातेह के दौर में तोप के माहिरीन ने ऐसी तोपे बनाना शूरू करदी थी जिसके गोले टारगेट से टकरा ते ही ब्लास्ट हो जाते फ़ढ़ जाते थे, गोलो के साथ तोपे भी मज़बूत हो गई थी , लोहे की जगह अब Bronze (कांसा कांस्य तांबे या ताम्र-मिश्रित धातु मिश्रण ) से बनने लग गई थी इसमे पहले के मुकाबले खर्चा तो ज्यादा होता था लेकिन डिजाइन बेहतर हो जाती थी.

ओर ब्रोंज(Bronze) हासिल करना ज्यादा मुश्किल नही था, बलकान के गिरजाघरो में ब्रोंज(Bronze)से बनी घण्टियो को तोड़ कर उनसे ब्रोंज(Bronze) हासिल किया ओर फिर उसको इस्तिमाल में लिया जाने लगा

उस वक़्त की तोपे 16 फुट लम्बी ओर साढ़े सात सो पाउंड वजन के गोले फेक सकती थी, सुल्तान मोहम्मद फातेह को इससे भी बड़ी तोप चाहिए थी इतनी बड़ी के कम गोलो में ज्यादा दीवार को नुकसान पोहचाया जा सके

सुल्तान चाहते थे कि कोई कमी ना रहे , किसी भी सूरत ना-कामी हाथ ना लगे ,,

सुल्तान को जरूरत थी एक ऐसे इंजीनियर की जो इतनी पावरफूल तोप बना सके जितनी वो चाहते थे , ओर वो मिल गया हंगेरियन तोप इंजीनियर ओर्बन के रूप में.

इसको सुल्तान का मुकद्दर ही कहेंगे, कि हेंगरी से एक इंजीनियर ओर्बन तोपे बनाने की पेशकस लेकर कुस्तुन्तुनिया Constantine XI Palaiologos के पास आता हे ओर उसे तोपसाजी की पेशकस की ,लेकिन इन तोपो के बदले में ओर्बन ने बोहोत बड़ी तनख्वाह ओर इनाम की पेशकस भी करदी कुस्तुन्तुनिया की माली हालत उस वक़्त बोहोत खराब थी उसपे कर्ज़ों का बोझ था Constantine XI ने तोपों से ज्यादा खज़ाना भरने की फिकर थी.

वो उस्मानों के नए सुल्तान मोहम्मद फातेह को कोई खतरा नही समझता था बल्कि मोहम्मद फातेह के सुल्तान बनने पर कुस्तुन्तुनिया से लेकर फ्रांस तक यूरोपी हुक्मरानों ने एक दूसरे को मुबारकबादे दी थी के आलमी ताकत के तख्त पर एक कमजोर सुल्तान आ बैठा हे.

Constantine XI सुल्तान मोहम्मद फातेह से कोई खतरा नही महसूस कर रहा था , इसलिए उसने ओर्बन तोप इंजीनियर को टाल दिया, ओर उसकी थोड़ी सी तनख्वाह मुकर्रर करदी,ताके इतना माहिर इंजीनियर कहि ओर ना चला जाए.

ओर्बन ने कुछ दिनों तक तो काम किया लेकिन इतनी कम तनख्वाह ओर वो भी टाइम पे ना मिलने साथ ही उसमे भी सरकारी अधिकारियों का डंडी मारने की वजह से ओर्बन ने सल्तनत ए उस्मानिया में नोकरी करने का फैसला किया, ओर यू सुल्तान की मुराद पूरी हो गई और उन्हें उनकी पसंद का इंजीनियर मिल गया

ओर्बन इस बात को जनता था कि सुल्तान कुस्तुन्तुनिया की दीवार गिराने के लिए बे करार हे लिहाज़ा उसने अच्छी तरह कुस्तुन्तुनिया की दीवारों के जायज़ा लिया ओर वहा से निकल कर 140 मिल दूर एड्रिन शहर में सुल्तान मोहम्मद फातेह के दरबार मे पोहच गया

तारीख की अज़ीम जंग कुस्तुन्तुनिया⚡⚔️

👑कुस्तुन्तुनिया फ़तेह होने की बसारते हुजूर ए पाकﷺ दी🇹🇷

आपﷺ ने फ़रमाया तुम जरूर कुस्तुन्तुनिया फ़तेह करोगे,पस बेहतर अमीर उसका अमीर होगा,ओर बेहतरीन लश्कर वो लश्कर होगा.

📚मुसनद अहमद जिल्द 4 शफा न 335

यही फरमाने रिसालतﷺ था ,जिसने हर दौर के मुस्लमान फातेहिन को कुस्तुन्तुनिया का परवाना बनाए रखा लेकिन पे-दर-पे कई हमलो का सामना करने के ब-वजूद भी इस कदीम शहर के दरवाजे मुस्लमान फातेह के लिए ना खुल सके पहले 44 हिजरी में फिर सहाबा लगातार इसपे हमले करते रहे,

दोराने ए मुहासरे कुस्तुन्तुनिया जलिलो क़द्र सहाबी हज़रत अय्यूब अंसारी रदिअल्लाहु तआला अन्हो बीमार होवे ओर शहीद हो गए, हज़रत अबु अय्यूब अंसारी ने आखिरी बार अपनी फ़ौज़ को कहा कि दुश्मन को पीछे दखेलते हुवे जितना अंदर जा सको जाओ और मुझे उस दीवार के करीब दफन करना, लिहाज़ा ऐसे ही किया मुस्लमान फ़ौज़ ने हज़रत अबु अय्यूब अंसारी रदिअल्लाहु तआला अन्हो को वही दफन किया,

🕌वही आपका मज़ार हे जिसे सुल्तान मोहम्मद फातेह ने बाद में तामीर किया साथ ही मस्जिद भी बनवाई.🕌

हज़रत उमर बिन अब्दुल अजीज रदिअल्लाहु तआला अन्हो, हुस्साम बिन अब्दुल मलिम, मेहदी अब्बासी , हारून अल राशिद जैसे पुर जलाल खुलफ़ा ने भी इस शहर को तस्करी करने के लिए जबरजस्त हमले किए लेकिन कुस्तुन्तुनिया फतह न हो सका.

जैसा कि में बता चुका कुस्तुन्तुनिया एक ना-काबिल तसखिर शहर था, इसके तीन तरफ समुन्दर एक तरफ खुश्की, शहर के चारो तरफ 12 मीटर उची दीवार के 170 फिट के फासले पर मज़बूत टावर बने हुवे थे , दीवार के अंदर एक ओर दीवार थी ओर उन दोनों के बीचो बीच एक न काबिले उबुर खन्दक थी ,जिसकी चौड़ाई 60 फिट ओर गहराई 100 फिट थी ,एक तीसरी दीवार ने शहर की एक लाख से ज्यादा की आबादी को अपने दामन में पनाह दे रखी थी,ओर यू ये शहर फ़तेह करना करीब करीब ना-मुमकिन हो गया था,

सुल्तान मोहम्मद अल फातेह के वजीरे आज़म खलील पाशा सुल्तान को हमले से रोक रहे थे कि कुस्तुन्तुनिया पे हमला ना किया जाए इससे पूरे यूरोप के सलेबी मुकाबले पे आ सकते हे, वो इसको एक 22 साला नोजवान का जुनून से ज्यादा कुछ नही समझते थे.

लेकिन सुल्तान मोहम्मद फातेह हर हाल में इसको फ़तेह करना चाहते थे चाहे जो हो सुल्तान अब पीछे हटना नही चाहते थे

बहर-हाल

ओर्बन इस बात को जनता था कि सुल्तान कुस्तुन्तुनिया की दीवार गिराने के लिए बे करार हे लिहाज़ा उसने अच्छी तरह कुस्तुन्तुनिया की दीवारों का जायज़ा लिया ओर वहा से निकल कर 140 मिल दूर एड्रिन शहर में सुलतान मोहम्मद फातेह के दरबार मे पोहच गया

जब सुल्तान को बताया कि हंगरी से एक इंजीनियर तोपे बनाने की पेशकस लेकर आया हे सुल्तान ने उसे फोरी तलब कर लिया,

सुल्तान खुद भी जंगी टेक्नोलॉजी की बोहोत जादा समझ रखते थे, इस लिए उन्होंने ओर्बन से चंद टेक्निकल सवालात के बाद सीधे सवाल क्या तुम ऐसी तोप बना सकते हो जो कुस्तुन्तुनिया की दीवारों को गिरा सके❓

ओर्बन ने कहा मेने कुस्तुन्तुनिया की दीवारे बोहोत करीब से देखी हे,में ऐसी तोप बना सकता हु जो उस दीवार को गिरा देगी.

सुल्तान ने उसके मुंह मांगी रकम से भी 4 गुना ज्यादा देने का वादा किया और जल्द ही काम शूरू करवाने का हुक्म भी जारी कर दिया.

ओर्बन ने 3 महीने में एक तोप तय्यार करली थी जिसको एक मुकाम पे तैनात किया गया 1452 में इस तोप के एक गोले ने वीनस के बेहरी जहाज़ को डुबो दिया,ये जहाज़ कुस्तुन्तुनिया जा रहा था ये जहाज़ डूबने से ओर्बन की बनाई तोप की ताकत साबित होगई थी,

ये देख सुल्तान खुश हुवे ओर ओर्बन को हुक्म दिया कि वो उनकी सोची बड़ी तोप तय्यार करे फ़ौरन ही इसकी तय्यारीशूरू होगई.

इस बड़ी तोप सुपर गन को बनाने के लिए रस्सी ओर मट्टी से बना एक 27 फिट लम्बा साचा तय्यार किया गया, ओर्बन ने ईटो ओर पत्थरो से दो बड़ी बडी भट्टिया तय्यार की जिन्हें 1 हजार सेंटीग्रेड डिग्रीज तक गरम किया जाता था, ओर इनके चारो तरफ Charcoal की एक पहाड़ी बना दी इतनी उची की उप्पर से झाकने पर सिर्फ भट्टी का दहाना ही नज़र आता था , फिर भी भट्टियों की तपिश इतनी थी के ऊपर खड़े सख्स तक भी पोहचती थी,

जब इन भट्टियो में लकड़ी डाल के आग जलाई गई तो तमाम लोग एक जगा खड़े होकर अल्लाह, अल्लाह पुकारने लगते.

भट्टी में जिस दिन tin डाला जाना था उस दिन सल्तनत के मुफ़्ती , उलमा ,शेख ,मुरशिद, वज़ीरों को बुलाया गया ताके उनकी मौजदगी से बरकत रहे इनके अलावा किसी शख्स को भट्टियो के करीब जाने की इजाज़त नही थी ताके नए हतियार को किसी नज़र ना लग जाए ,भट्टियो के अमले के इलावा सिर्फ 40 लोग वहा मौजूद थे , मुफ़्ती, शेख ,वजीर भट्टी के 100 फिट दूर बेठ गए और लगातार अल्लाह तआला का जिक्र करने लगे ,फिर मुफ़्ती ओर उलमा से कहा कि वो सोने और चांदी के सिक्के भी बतौरे सदका भट्टियो में दाल दे ,सोने चांदी के सिक्के भट्टी में दाल दिए गए,

इसी भट्टी से 27 फुट लम्बी जिसका दहाना (मुह)30 इंच का था वही साइज़ जो सुल्तान चाहते थे ,सुल्तान की मर्ज़ी की तोप तय्यार हो चुकी थी । सिर्फ टेस्टिंग बाकी थी,

जनवरी 1453 में टेस्टिंग के लिए निकाला गया, शहर के लोगो को एक दिन पहले ही खबरदर कर दिया गया था कि कल एक ऐसा धमाका होगा जैसे कोई बादल गरज़ रहे हे, घबराए नही

अब तोप को लाया गया ,कई लोगो ने मिलकर पत्थर का एक गोला तोप में फिक्स किया ,ओर तोप के पेंदे मे मौजूद बारूद को आग लगाई गई , फिर एक तेज़ आवाज़ के साथ गोला तोप से निकला ओर एक मिल दूर जाके गिरा, ओर जहा गिरा वहा 6 फुट गढ्ढा होगया था,धमाके की आवाज़ 10 मिल तक सुनी गई थी.

ये तजुर्बा कामयाब रहा सुल्तान ने ये कामयाब तज़ुर्बे की खबर जान बुझकर दुनिया तक पोहचाई ताके वहा के मुहाफिजों ओर शहनशाह का मोराल गिर जाए.

इस सुपर तोप बनने के बाद ओर्बन ने ओर भी तोपे बनाई लेकिन वो इतनी लम्बी नही थी बल्कि उनका साइज़14 फिट से कुछ जादा होता था ओर्बन से सुल्तान ने ऐसी 60 से ज्यादा तोपे बनवाई.

अब सल्तनत में अमनो अमान भी था और तोपे भी तय्यार हो चुकी थी.

तुर्को के कबाइली रिवाज़ के मुताबिक सुल्तान ने ये किया कि घोड़े के दूम से बना एक परचम महल के सहन में गढ़ दिया ये इस बात का ऐलान था कि सुल्तान मोहम्मद सानी जंग शूरू करने जा रहे हे ,

परचम गाड़ने के साथ ही सारी सल्तनत में क़ासिद दौड़ा दिए गए कि ओर तमाम अमीरों को हुक्म दिया गया की वो फ़ौज़ लेकर एड्रिन पोहच जाए,

जंग का तरीके कार ये था कि हर अमीर की ये जिम्मेदारी थी वो जादा से ज्यादा सिपाही साथ लाए,ओर सिपाहियों के हथियारों ,कर सवारी का बन्दोबस भी उसी अमीर को करना होता था

यू देखते ही देखते 1453 के मौसम बहार तक 2 लाख का लश्कर हो गया जिसमें 180 बहरी जंगी जहाजो का ताकत वर बेड भी शामिल था

यू देखते ही देखते 1453 के मौसम बहार तक 2 लाख का लश्कर हो गया जिसमें 180 बहरी जंगी जहाजो का ताकत वर बेडा भी शामिल था.

जंग में दो चीज़े बोहोत अहम होती हे
एक कूवत ए इरादी
एक वसाइल

लेकिन इन दोनों से भी ज्यादा जरूरी एक चीज़ होती हे (जंग की वजह)

सुल्तान मोहम्मद फातेह के पास शहर को फ़तेह करने के लिए कई अहम वजूहात थी ,

(1)पहली वजह सुल्तान इसको फ़तेह करना बाइसे निजात अपनी बख़्सिस का जरिया समझते थे , जैसा कि एक वाकिया हे सुल्तान मोहम्मद अल फातेह ने अपने सबसे बरोसे मन्द ओर काबिल सिपहसालार जनाब कासिम बिन हुस्साम जो हज़रत खालिद बिन वलीद रदिअल्लाहु तआला अन्हो के खानदान से थे और उस दौर के सबसे बेहतरीन तलवार बाज़ जंगजू थे साथ ही जासूसों को उजागर करने का काम भी इन्ही का था.

जनाब काशिम बिन हुस्साम को हमले से पहले कुस्तुन्तुनिया के हालात पे नज़र रखने और वहा की खुफिया तरीके से खबरे मालूम करने के लिए, कुस्तुन्तुनिया रवाना करते वक़्त जो बात कही वो तारीख में पढ़ी जा सकती हे.

आप बोहोत जल्द ईसाई दुनिया के कदीम मरकज़ ओर बेजेंटिनी सल्तनत के दारुल हुकमत कुस्तुन्तुनिया रवाना हो रहे हे , काशिम बिन हुससाम एक बात याद रहे ,की हमारे रसूलﷺ ने अपनी जबानी कुस्तुन्तुनिया के फातेह को जन्नत की बसारत दी हे , आप उस्मानी अफवाज़ के कुस्तुन्तुनिया में दाखिल होने से पहले इस शहर को दाख़िली तोर पर फ़तेह करने जा रहे हे, आपको इस काम के लिए बोहोत मेहनत करना हे , लिहाजा आप जल्दी रवाना हो जाए.

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(2) दूसरी वजह, ,कुस्तुन्तुनिया ने,सुल्तान के बागी चाचा, ओरहन कलबी को ओर उनके साथ 500 के करीब साथियो को पनाह दे रखी थी ,ओर धमकी दी थी के अगर सुल्तान मोहम्मद फातेह ने शहनशाह,कांस्टेनटाइन की बात नही मानी तो वो उसके बागी चाचा को मदद करेगा और सुल्तान के मुकाबले पे लाकर खड़ा कर देगा,।

ओरहन कलबी सुल्तान बा-यज़ीद दोम के पोते ओर सुलेमान के बेटे थे, सुलेमान जो आपसी खाना जंगी में क़त्ल हो गए थे, ओर समझने के लिए पोस्ट नम्बर 23 को पढे

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(3) तीसरी वजह तिजारती थी वो यू के दो बर्रेअजमो यूरोप और एशिया के संगम पर होने की वजह से ये शहर तिजारत का बेहतरीन रास्ता था,

सिर्फ हिन्दुस्तान से एक हजार टन अजनास इसी शहर के रास्ते यूरोप पोहचती थी,
★★★★★★★★★★★★★★★

उस्मानियो के पास तो बोहोत सी वजुहात थी कुस्तुन्तुनिया पे हमले की, लेकिन रूमी शहनशाह constantine Xl के पास एक वजह ये थी शहर एक हजार साल से रूमियों की विरासत था , इस की हिफाज़त के लिए इस 49 साल तजुर्बेकार शहनशाह ने 22 साल के नोजवान सुल्तान मोहम्मद अल फातेह के सामने डट जाने का फैसला करलिया.

Constantine के पास अपने सिर्फ 8 हजार सिपाही थे ,लेकिन वो किया वजह थी जिस पे भरोसा करके constantine Xl सुल्तान मोहम्मद अल फातेह से मुकाबले पर तय्यार था,

असल मे देखने मे ये लगता हे कि ये जंग एक तरफा होगी लेकिन ऐसा नही था कांस्टेनटाइन को ,कई एडवांटेज हासिल थे जो उस्मानियो के पास नही थे,

(1)पहली तो ये की कांस्टेनटाइन को जंग खुले मैदान में नहीं बल्कि किले की महफूज़ दीवार के पीछे से लड़ना थी,

यानी उसके सिपाही महफूज़ जगहों से दुश्मन पर गोले पत्थर तीर ओर ग्रीक फायर जैसा खतरनाक केमिकल फेक सकते थे,

वही ग्रीकफायर जिसकी आग पानी से भी नही भुजती थी बल्कि ओर भड़कती थी

इसके मुकाबले में उस्मानी इनको तभी नुकसान पोहचा सकते थे जबकि वो दीवारों पे चाड आए ,यही काम तकरीबन ना-मुमकिन था ,ओर इसकी एक लॉजिकल रीजन वजह थी,

सबसे बाहर 50 फुट चौड़ी 20 गहरी खन्दक हे, जिसमे जमीन के नीचे पाइप के जरिए पानी भरा जा सकता था फिर इसके पीछे 1 पहली छोटी दीवार इसके पीछे 2 दूसरी बुलंद दीवार ओर सबसे आखिर में 3 तीसरी दीवार जिसकी बुलंदी 36 से 100 फिट तक ये आखिरी दीवार 4 मिल तक फैली हुई थी दूसरी ओर तीसरी दीवार के दरमियान एक 60 फिट चोड़ा पेलेट फार्म भी था,

यानी एक खन्दक 3 दीवारे ओर दीवारों के पिछे से तिरो की बारिश करते सिपाही इन सब से गुजरने के बाद ही तुर्क फ़ौज़ उन प्लेटफार्म पे पोहच सकती थी जहा उन मुहफीजो पे दुह ब दुह हमला कर सके ओर मुहफीजो के पास तीसरी दीवार के पीछे पनाह लेने की भी ऑप्शन मौजूद थी ,

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ये था दीफाई स्ट्रक्चर जिसकी दीवारों पे चढ़ते चढ़ते लाखो की फ़ौज़ खत्म हो जाया करती थी सदियों से शहर की यही तारीख रही थी सिर्फ दीवारे ही नही बल्कि शहर का सारा नक्शा ही जंगी नुक्ते नज़र से बनाया गया था.

बाहर से देखे तो कुस्तुन्तुनिया के एक तरफ अबना ए बासफोरस यानी सकड़ा समुंद्री रास्ता, दूसरी जानिब सी,एफ़,मरमरा यानी फिर संमुन्दर ओर तीसरी तरफ़ गोल्डन हार्न यानी तीसरी तरफ भी पानी,

लेकिन ये गोल्डन हार्न कुस्तुन्तुनिया का एक वीकपॉइन्ट भी था, ये तंग समुंदरी रस्ता अगर कोई पार करके कुस्तुन्तुनिया की तरफ़ आजाए तो इस तरफ की दीवार बोहोत कमजोर थी , लेकिन इसका भी हल शहर के मुहफीजो ने पहले ही निकाल लिया था , इसके रास्ते मे 30 टन वजनी एक लोहे की जंजीर दालदी थी ताके कोई जहाज घुस ना सके सिर्फ वही जहाज़ आ सके जिसको वो जंजीर हटा के अंदर लाते थे सुल्तान मोहम्मद अल फातेह ने कई जंगी जहाज़ भी बनवाए थे,

30 टन वजनी जंजीर लगा दी गई थी जैसे रोड पे बेरियर लगाया जाता हे वैसे ही ये जंजीर रास्ते के दोनो तरफ फिट करदी गई थी जंजीर के एक सिरे पर कुसरन्तुनिया तो दुसरे पर गलाटा की आबादी थी

गलाटा जिनेवा की कॉलोनी था और अगर चे जीनेवा के कुछ जंगजू जाती तोर पे सुल्तान की मदद को जिनेवा पोहचे हुवे थे लेकिन सरकारी तोर पे गेर जानिब दार था इस लिए उस्मानी जंजीर हटाने के लिए गलाटा में दाखिल नही हो सकते थे,

जंजीर को काटा भी नही जा सकता था क्यों के इसके पीछे हिफाज़त के लिए 10 रूमी बेहरी जहाज़ खड़े हुवे थे

अब दूसरी जगह सी.एफ़ मरमरा दूसरा हमला यहा से हो सकता था लेकिन ये रफ वाटर का संमुन्दर था यानी यहा पानी पुर सुकून नही रहता था और समुन्दर को संभालना मुश्किल था जहाज़ साहिल पर फस सकते थे उलट सकते थे या किसी समुंद्री चट्टान से टकरा कर पास पास हो सकते थे यानी ये जगह भी हमलो के लिए नही थी । मतलब ये की 3 तरफ समुन्दर ओर एक तरफ महफूज़ दीवारे कुस्तुन्तुनिया की हिफाज़त कर रही थी.

अब कांस्टेनटाइन को ये करना था की शहर में बंद होकर बैठ जाए , ओर दुश्मन एड्रिन से 140 मिल का थका देने वाला सफर तेय करके आये तो उसको जंग में मुसल-सल उलझाए रखे तब तक उलझाए रखे की उस्मानी फ़ौज़ धूप गर्मी प्यास ओर बीमारियों से अदमुरी ना हो जाए ।

यही वजह की कम फ़ौज़ के बावजूद कांस्टेनटाइन पुर उम्मीद था और अपनी अवाम को फतह की भर पुर उम्मीदे भी दिला रहा था,

कुस्तुन्तुनिया को एक ओर फायदा था कि यूरोप से पोप सलेबी लश्कर उस्मानियो के मुकाबले पर भेज सकता था ,ओर पोप का एक नुमाइंदा 2 हजार तीर-अनदाज़ को लेकर कुस्तुन्तुनिया पहोच भी चुका था । लेकिन सलेबी फ़ौज़ नही आई इसकी वजह पूरे यूरोप में उस्मानों के खिलाफ़ जंग करने को कोई तय्यार ना था ,

ईसाई रियासत के उस दौर में उस्मानों से टकराना अपनी रियासत को ही दांव पे लगा देना था इस लिए वो ये खतरा मोल नही लेना चाहते थे,

लेकिन कुस्तुन्तुनिया को एक छोटी मदद मिली

29 जनवरी 1453 को एक जंगजू कमाडंर john giusriniani अपने 700 सो जंगजू के साथ कुस्तुन्तुनिया पहोच गया कांस्टेनटाइन ने giusriniani की जंगी महारत को देखते हुवे उसे अपनी फ़ौज़ का कमांडर एन चीफ बना दिया, अब कांस्टेनटाइन की फ़ौज़ 9 हजार तक पोहचा चुकी थी

इन सब से निपटने के लिए सुल्तान मोहम्मद अल फातेह के पास किया तय्यारी थी

सबसे पहले तो सुल्तान के पास एक सलेबी तीरंदाज़ से मुकाबले के लिए 20 , 20 सिपाही थे.

दीवारे तोडने के लिए उसके पास तोपे थी जो दीवारों के साथ उप्पर बैठे मुहफीजो को भी गिरा सकती थी.

180 बहरी जहाजो का बेड़ा शहर की बाहरी नाका बंदी के लिए काफी था.

1452 में सुल्तान मोहम्मद फातेह ने अबनाए-बास-फोरस के यूरोपी किनारे पर शहर से 6 मिल दूर एक किले कि तामीर शूरू करदी ,पुर जोश सुल्तान ने खुद मज़दूरों के साथ मेहनत करके सिर्फ साढ़े 4 माह में ये किला खड़ा कर दिया था,ये किला आज भी यही मौजूद हे.

किले में तोपे लगा कर चार सौ सिपाही तैनात कर दिए गए ।इस किनारे के एन सामने बसफोर्स के एशियाई किनारे पर एक किला आन्दोलो हिजार सुल्तान के पर दादा बा-यज़ीद अव्वल ने पहले ही बनवा रखा था,ओर ये भी आज तक मौजूद है.

इस किले में भी तोपे ओर फ़ौज़ लगा दी गई अब दोनों किलो के दरमियान सिर्फ आधे मिल संमुन्दर से कोई बाहरी जहाज़ तो किया एक छोटी कश्ती भी बगेर उस्मनियो की इजाज़त के नही गुजर सकती थी.

ईसी संमुन्दर से गुजरने की कोशीश में वीनस के 2 बेहरी जहाज़ भी पकड़े जा चुके थे यू ये रास्ता कुस्तुन्तुनिया की किसी भी किसम की मदद के लिए बंद हो चुका था। जब कि सी, एफ, मरमरा में पहले ही सुल्तानी जहाज़ पहरा दे रहा था सो ये रास्ता भी बंद था.

सुल्तान के पास सब कुछ था ।लेकिन एक चीज़ नही थी जो कांस्टेनटाइन के पास थी ।वो था वक़्त.

बात ये थी कि सर्दी हो या गर्मी दोनो में ही कुस्तुन्तुनिया के शहर के बाहिर कोई फ़ौज़ जादा देर तक नही ठेर सकती थी ,इस हमले के लिए बेहतरीन मौसम बहाल था यानी मार्च ,ओर अप्रेल का वक़्त ,ओर इसके बाद भी कोई ताकतवर फ़ौज़ एक महीना और यानी मई, तक मुहासरा बरकरार रख सकती थी इसके बाद सख्त गर्मी प्यास बीमारिया उस फ़ौज़ का मुक़द्दर बन जाया करती थी ,ओर मुहासरा खत्म करना पड़ता था

यानी अब कांस्टेनटाइन 3 माह अगर उस्मानी फ़ौज़ को बाहिर रोक ले तो वो जंग जीत चुका था ओर कुस्तुन्तुनिया की हिफाज़त के इंतिज़ाम ऐसे थे कि 3 माह तक किसी भी फ़ौज़ को बाहर रोका जा सकता था.

जब कि सुल्तान के पास 3 माह से ज्यादा एक दिन भी नही था क्यों के जितनी बड़ी वो फ़ौज़ लेकर आये थे ,उसके खाने पीने राफाये हाज़त उसे ऐसे मसाइल पैदा होने थे जिन्हें झेलना छोटी फ़ौज़ के लिए ही ना मुमकिन था ,तो लाखों की फ़ौज़ के लिए तो ओर मुश्किल था.

जब कि सुल्तान के पास 3 माह से ज्यादा एक दिन भी नही था क्यों के जितनी बड़ी वो फ़ौज़ लेकर आये थे ,उसके खाने पीने राफाये हाज़त उसे ऐसे मसाइल पैदा होने थे जिन्हें झेलना छोटी फ़ौज़ के लिए ही ना मुमकिन था ,तो लाखों की फ़ौज़ के लिए तो ओर मुश्किल था.

याद रखे उस दौर की कोई भी फ़ौज़ आज की जदीद फ़ौज़ की तरह मुनज़्ज़म नही होती थी ।बल्कि उसमे बोहोत से कबीलो ओर खित्तों इलाको के लोग शामिल होते थे जो सबसे पहले अपने इलाकाई सरदार के वफादार होते थे । ये सरदार भी अपने इलाको से इन लोगो को ये कहकर लाते थे कि जंग जितने पर जादा से जादा माले गनीमत ओर गुलाम मर्द ओरते उनके हाथ आएंगी ऐसा अगर ना हो पाता और जंग या मुहासरा तावील हो जाता तो ये सरदार वापसी का रास्ता लेने में जादा देर नही लगाते थे

इन सब बातो को जेहेन में रखकर जब सुल्तान एड्रिन से चले तो 23 मार्च 1453 की तारीख ओर जुमे का दिन था

सुल्तान ने खास तौर पर जुमे के दिन को मुबारक समझते हुवे रवानगी के लिए मुन्तखिब किया था ।

सुल्तान घोड़े पे सवार इस तरह आगे बढ़ रहे थे कि उनके दोनों तरफ घोड़ सवार सय्यद जादे थे उनके साथ उलमा इ किराम सीयूख की बड़ी तादाद थी । ये सब लोग बुलंद आवाज़ से कामयाबी के लिए दुआ ए मांग रहे थे

उस दौर की बाकी फौजो के दर अश्क रास्ते मे आने वाले दिहात ओर शहरो को नुकसान भी नही पोहचा रही थी

सबसे आखिर में तोपे खेच कर लाई जा रही थी, सिर्फ सुपर गन को 60 बेल ओर 200 आदमी खेच रहे थे यही नही बल्कि उस्मानी फ़ौज़ के कुछ दस्ते , एक एक करके आगे बढ़ने वाले रास्तो को भी बेहतर बनाते जा रहे थे

फ़ौज़ के इंजीनियर की कई टीमें फ़ौज़ के मरकज़ी हिस्से की रवानगी से पहले ही कुस्तुन्तुनिया की जानिब बढ़ चुकी थी, ये टीमें फ़ौज़ की गुजर गाह पर रास्तो ओर पुलों की मरम्मत करती जाती तोपे गुजारने के लिए उचे नीचे रास्तो को हमवार कियाजा रहा था. जहा रास्ते जादा खराब वहा पत्थर बिछा कर पुख्ता सड़के बना दी गई थी

फ़ौज़ के साथ सिर्फ सिपाही नही बल्कि हर जरूरत के काम के लिए लोग मौजूद थे , इनमे बावर्ची , कारपेंटर ,पेंटर ,लोहार ,मोची ,लक्कडहारे, दर्जी ,गोले बनाने वाले ,ओर समान उठाने वाले सभी सामिल थे

उधर कुस्तुन्तुनिया में भी सुल्तानी फ़ौज़ के रवाना होने की खबर हो चुकी थी ईसाइयो का मजहबी तेव्हार शूरू होने वाला था यूरोप से मदद की सारी उम्मीद खत्म हो चुकी थी

1अप्रेल को Easter sunday था कुस्तुन्तुनिया का हर गिरजाघर लोगों से खचा खच भर चुका था, उस्मानी फ़ौज़ के हमले को ना काम बनाने के लिए दुआ ए मांगी जा रही थी और जोरो सोर से घण्टिया बजाई जा रही थी ,लेकिन हेगियासूफ़िया में कोई दुआ मांगने वाला नही था ,ओर ना शम्मा जलाने वाला क्यों के केथलोक पॉप कुस्तुन्तुनिया की मदद के लिए सलेबी नही भेज सका था इस लिए शहर के ऑर्थोडॉक्स आबादी ने भी Easter के तेव्हार पर हेगियासूफ़िया का बाईकोट कर दिया था

2अप्रेल को बड़ी तादाद में उस्मानी फ़ौज़ शहर में पोहचना शूरू होगई और शहर के तमाम दरवाजे आखिरी बार बन्द कर दिए गए बल्कि शहर के मरकज़ी फाटक को तो बोहोत पहले ही उखाड़ कर वहा पत्थर चुन दिए गए थे ,मगरिबी दीवार वाली खन्दक पर बने तमाम पुल भी गिरा दिए गए कि उस्मानी फ़ौज़ खन्दक को पार ना कर सके

सुल्तान मोहम्मद फातेह 23 मार्च को जुमे के दिन चले थे और 6 अप्रेल को जुमे ही के रोज़ शाम के वक़्त शहर के सामने पोहोच गए थे

बिल आखिर 6 अप्रैल 1453 ई ,ब-मुताबिक 26 रबी-उल-अव्वल 857 ही, के रोज़ सुल्तान मोहम्मद अल फातेह अपनी बहादुर अफवाज़ के हमराह खुश्की की जानिब से कुस्तुन्तुनिया की दीवार के सामने नमूदार हुवे ,शहर के सब दरवाजे बंद थे और कुस्तुन्तुनिया का पूरा शहर दीवार पे चढ़कर दूर से धूल उड़ाते सुल्तानी लश्कर को देख रहा था.

काशिम बिन हुस्साम जिनको सुल्तान ने पहले ही कुस्तुन्तुया पोहचा दिया था जासूसी के लिए वो भी आ चुके थे और वो अपने अज़ीज़ दोस्त सिपाह सालार आगा हसन ,के मातहत में अपने साबिका ओहदे पर बरकरार हो चुके थे ,काशिम बिन हुस्साम के मातहत लड़ने वाले मुस्लमान सिपाहियों को अपने सिपाहसालार के वापस आजाने की बे-पनाह खुशी हुई ,ओर वो तमाम काशिम बिन हुस्साम से मिले.

इस मर्तबा उस्मानी फ़ौज़ का हर सिपाही ,फ़तेह, या शहादत के जज़्बे से सरसार था

सुल्तान उनकी आमद की खबर सुनकर बेताब अपने खेमे से बाहर निकल आए थे और उन्होंने काशिम बिन हुस्साम को ऐसे अंदाज़ से गले लगया जैसे मुद्दतो से बिछड़े दोस्त सरे-राह मिल जाते हे _काशिम बिन हुस्साम ने अपनी तमाम कारकरदगी सुनाई ओर मुकद्दस बुजुर्ग बताएमुस की फ़राहम करदा कुस्तुन्तुनिया की चाबियां सुल्तान के हवाले की इसके बाद काशिम बिन हुस्साम ने मुकद्दस नक्शा पेस किया तो सुल्तान खुशी से उछल खड़े हुवे ओर काशिम बिन हुस्साम को एक बार फिर गले से लगा लिया.

ये चाबियां🗝️ कहा कि थी और ये 🗺️नक्शा कैसे काशिम बिन हुस्साम को मिला

में मुख्तसर लिखने की कोशीश में था, इस लिए की जासूस वाली सीरीज़ में आएगा,लेकिन ये पूरा वाकिया इतना खूबसूरत हे कि पूरा ही लिखने से अपने आप को नही रोक सका.

काशिम बिन हुस्साम को सुल्तान ने कुस्तुन्तुनिया पहले ही भेज दिया था खुफिया तरीके से जानकारी हासिल करने के लिए , आप वहा एक सलेबी बनकर गए थे, आप कुस्तुन्तुनिया का नक्शा हासिल करने की नीयत से एक टावर की 8 मंजिल पे पोहोचते है , जहा आपकी एक बूढ़े बुजुर्ग पर नज़र पढ़ती है ,

काशिम बिन हुस्साम, देखते हे कि वो बुजुर्ग मुस्कुरा कर हाथ मे मसाल लिए दरवाजे पे खड़े हे टावर की सीडीओ पे उजाला कर रहे थे जिस उजाले के सहारे काशिम बिन हुस्साम 192 जीने चढ़कर आये थे , बुजुर्ग ने कहा बेटा अंदर आओ तुम बोहोत तेजी से जीने चढ़कर आये हो , बुजुर्ग की बाते सुनकर काशिम बिन हुस्साम हेरत में पढ़ जाते हे कुछ समझ नही आता वो समझते हे कि ये बुजुर्ग मुकद्दस की कोई चाल हे ,

काशिम बिन हुस्साम का हाथ फ़ौरन अपनी तलवार के दस्ते की तरफ चला गया , वो ये सोचकर ही आये थे कि बूढ़े रूहानी पेशवा बताएमुस को कत्ल करके मुकद्दस नक्शा हासिल कर लूंगा,लेकिन यहा तो सूरते हाल मुख्तलिफ थी.

मुकद्दस बुजुर्ग ने काशिम बिन हुस्साम को तलवार निकालते देखा तो मुस्कुरा कर बोले “नही बेटा इसकी जरूरत नही” में तो तुम्हारा इंतिजार कर रहा था ,”आज से नही बेटा में गुज़िश्ता कई सालो से तुम्हारा मुन्तज़िर हु”, “हर रात इसी तरह हाथ मे मसाल लेकर दरवाजा खोले तुम्हारा इंतिजार करता हु”, “मुझे मालूम था तुम आओगे,एक दिन जरूर आओगे, आओ अंदर आजाओ”,

ये सब देख कर काशिम बिन हुस्साम हैरान थे , उन्हें कुछ समझ नही आ रहा था , वो बूढ़े मुकद्दस बुजुर्ग बताएमुस के साथ अंदर की ओर चलने लगे और कमरे में दाखिल हुवे , कमरे में एक लकड़ी का सन्दूक रखा था.

मुकद्दस बुजुर्ग ने फिर कहा बेटा अच्छा हुवा तुम आगए , में अब जादा ही बूढा हो चुका हूं , मेने तवील अरसे तुम्हारा इंतिजार किया हे , तुम्हारी अमानत मेरे पास हे , इसे हिफ़ाज़त के साथ अपने अमीर के पास पोहचाना तुम्हारा काम हे,

ये कुस्तुन्तुनिया की हजार साल पुरानी चाबियां हे मेरे लिए अब इनकी हिफ़ाज़त मुश्किल थी, शुक्र है तुम आगए ,मुझे यकीन हे ,तुम्हारा अमीर कुस्तुन्तुनिया फ़तेह कर लेगा , क्यों के तुम्हारा अमीर बेहतर अमीर हे ,तुम्हारा लश्कर सबसे बेहतर लश्कर हे.

उन बुजुर्ग की जबान से आखिरी अल्फ़ाज़ सुनके ,काशिम बिन हुस्साम के बदन का एक एक रोंगटा खड़ा हो गया , की ये तो हदीसे मुबारक के अल्फ़ाज़ हे.

रसूल ए करीम ﷺ ने फरमाया था, तुम जरूर कुस्तुन्तुनिया फ़तेह करोगे, ओर इस लश्कर के अमीर बेहतर अमीर होगा, ओर वो लश्कर बेहतर लश्कर होगा,

काशिम बिन हुस्साम पर वज्द तारी होने लगा वो इस करिश्माई बुजुर्ग की बाते सुनकर हेरत के संमुन्दर में गोते खा रहे थे.,

पुरनूर चेहरे के मालिक ये बुजुर्ग यकीनन कोई पोहचे हुवे बुजुर्ग थे काशिम बिन हुस्साम के लिए ये सब ना-काबिले यकीन था.

बुजुर्ग फिर बोले बेटा फिक्रमंद होने की जरूरत नही , कुस्तुन्तुनिया का अंजाम आसमानों में लिख दिया गया हे,अब इस शहर पर अल्लाह तआला की रहमत बरसने वाली हे, तुम अपनी अमानत ले जाओगे तो में इत्मीनान से अपने मालिक के पास जा सकूगा,

पहली बार काशिम बिन हुस्साम में बोलने की हिम्मत पैदा हुई, वो बोले मुकद्दस बुजुर्ग आज ये सब मेरे लिए ना-काबिले यकीन हे, मेरा दिल कहता हे आप अल्लाह तआला के मकबूल बन्दे हे, में आपकी अमानत अपने सुल्तान के पास पोहचाने में एक लम्हे की भी देरी नही करूंगा, लेकिन में एक बात कहना चाहता हु , मुकद्दस बुजुर्ग में यहा कदीम चाबियां लेने नही मुकद्दस नक्शा हासिल करने आया था,

वो बुजुर्ग मुस्कुरा के बोले मुकद्दस नक्शा भी मेरे पास पोहोच चुका हे, में वो भी तुम्हारे हवाले कर दूंगा, तुम अब जादा देर ना करो जाने की तय्यारी करो लेकिन जाने से पहले में अपने चंद अल्फ़ाज़ का तुम्हे गवाह बनाना चाहता हु , फिर उन बुजुर्ग ने ये कालीमात कहे ,,

ए मेरे परवरदिगार में गवाही देता हूं ,की में तेरे सिवा ,किस ओर को रब नही समझता, ओर मोहम्मद ﷺ को तेरा भेजा हुवा रसूल समझता हूं

काशिम बिन हुस्साम की आँखे हेरत से फटी जा रही थी, वो बुजुर्ग एक तरह से कालिमा ए शहादत पढ़ रहे थे, ओर ये उनके मुस्लमान होने का सबूत था.

इसके बाद वो बुजुर्ग ने लकड़ी के सन्दूक को खोला और उसमें से भारी भरकम गठरी निकली और काशिम बिन हुस्साम की तरफ बढ़ाते हुवे कहा ,,

ये कुस्तुन्तुनिया की चाबियां हे ,साढ़े आठ सौ साल से ये चाबियां एक मजाजी अरब नोजवान के इंतिजार में इस सन्दूक के अन्दर रखी हे,इन्हें केसर ए रूम “हरकुल” ने अपनी मौत से पहले इस सन्दूक में मुन्तक़िल किया था, इस बात से सब बे-खबर हे, यहा तक कुस्तुन्तुनिया के शहनशाह उनका राज़ नही पा सका, इनमे दीवारे शहर के कदीम तहखानों के अलावा शाही महल के गुमनाम तहखानों की चाबियां भी हे, इन मक़ामात में कदीम रूम के खजाने रखे हे, जिनके असल मालिक तुम और तुम्हारा असल लश्कर हे.

केसर ए रूम हरकुल, (हकुलिस) का जिक्र सुनके वो चोके, ये रूम का वही शहनशाह था, जिसे रसूल ए करीम ﷺ ने खत भिजवाया था.

बिल आखिर 6 अप्रैल 1453 ई ,ब-मुताबिक 26 रबी-उल-अव्वल 857 ही, के रोज़ सुल्तान मोहम्मद अल फातेह अपनी बहादुर अफवाज़ के हमराह खुश्की की जानिब से कुस्तुन्तुनिया की दीवार के सामने नमूदार हुवे ,शहर के सब दरवाजे बंद थे और कुस्तुन्तुनिया का पूरा शहर दीवार पे चढ़कर दूर से धूल उड़ाते उस्मानी लश्कर को देख रहा था

सुल्तान मोहम्मद फातेह मालटेपे की उसी पहाड़ी पे खड़े होकर शहर को देख रहे थे जिसपर कभी उनके वालिद खड़े हूवे थे ये जगह तिरो गोलो से बोहोत दूर थी लेकिन यहा से दीवार साफ देखी जा सकती थी,

सिपाही आपस मे सर्गोसिया कर रहे थे इसके तहखानों में बोहोत बड़ा खजाना हे ,जो उनके हाथ आएगा लेकिन सुल्तान मोहम्मद फातेह उनकी बातों से बे-परवाह दुश्मन के दिफ़ाअ का ब-गोर जायजा ले रहे थे.

उन्होंने शहर की मगरिबी दीवार के सामने अपना शुर्ख तुर्क ओर सुनहरी खेमा नसफ़ कर लिया था ,उसी जगह जहा उनके वालिद ने 31 बरस पहले अपना खेमा नसफ़ किया था.

ओर इसी पहाड़ी के सामने रोमोनोस गेट पास वो दीवार थी जिसपर सुल्तान मुराद दोम की तोपो ने गोले बरसाए थे जिससे वो किसी हद तक टूट चुकी थी और अब कुस्तुन्तुनिया इसे अपनी गुरबत के बाइस मरमत भी नही कर पाया था लेकिन ये सिर्फ एक अंदरूनी दीवार थी,जबकि बाहर वाली दीवार सही सलामत थी.

सुल्तान की तोपे अगर ये बाहर वाली दीवार भी तोड़ देती तो इसके बाद उस्मानी फ़ौज़ ओर शहर की राह में कोई रुकावट नही थी.

यही सोच कर सुल्तान मोहम्मद फातेह ने अपना खेमा लगवाया था, ताके वो अपनी निगरानी में ये अहम तरीन काम सर अंजाम दे सके.

इसी जगह यानी फ़ौज़ के पोजीसन के सेंटर में उनकी बेहतरीन सिपाही जेनीससेरीज़ तीर अनदाज़ ओर हमला करने वाले घोड़े सवार मुस्तेद थे ,जिन्होंने मालटेपे की पहडी को घेर रखा था.

सुल्तान के खेमे के करीब इर्द गिर्द खन्दक खोद कर पाल नसब कर दी गई थी और भालो से आड़ भी बना दी गई थी,

दीवार तोड़ने के लिए सुल्तान के खेमे के सामने ही सुपर गन नसब होनी थी लेकिन वो अभी पोहची ही नही थी, क्यू के वो इतनी भारी थी उसे खेचने वाले बाकी फ़ौज़ से पीछे रह गए थे ,बल्कि बाकी तोपो में से भी चंद हल्की तोपे ही साथ पोहची थी,

अनातोलिया से आई फ़ौज़ सुल्तान के दाएं हाथ और यूरोप से आई फौजो को बाए हाथ तैनात कर दिया गया था.

अब शुर्ख सेब सुल्तान के सामने था उसे हासिल करने के लिए सुल्तान भी पुर एतमाद थे और उनकी फ़ौज़ भी, लेकिन ऐसे मैं ये हुवा की ,विनस का एक जहाज़ ऐसी खबर लाया जिससे उस्मानी फ़ौज़ में भगदड मच गई.

कुस्तुन्तुनिया की लम्बी हिफ़ाज़ती दीवार के 3 हिस्से थे सुल्तान ने अपनी फ़ौज़ को भी इसी तरतीब से खड़ा किया इन 3 हिस्सो में से सबसे अहम दीवार का दरमियानी हिस्सा था जो लाइक्सवेनी कहलाता था, ओर असल मे यही वो हिस्सा था जिसकी दीवार सबसे कमजोर थी इस दीवार के दोनों किनारों पर एक एक गेट था.

सुल्तान के खेमे के दाएं हाथ पर जो गेट था वो रोमोनोस कहलाता था जबके बाए हाथ वाला गेट हृयनापोल्स था

दीवार नाइकस के बिकुल सामने सुल्तान ने अपने 50 हजार सिपाही तैनात किए थे, जिनमे 12 हजार जेननीसेरीज़ भी शामिल थे.

सुल्तान के दाएं हाथ यानी सेंट रोमोनोस गेट से आगे मरमरा के संमुन्दर तक मजीद 50 हजार सेना तैनात थी ,ये अनातोलिया से आई हुई मुसलमान पैदल फ़ौज़ थी, ये तरबियत याफ्ता ,बेहतरीन हथियारों से लैस सिपाही थे.

जबकि सुल्तान के बाएं हाथ हेदर्यना पोल गेट से लेकर गोल्डन होल तक कोई 1 लाख फ़ौज़ तैनात थी ये इंतिहाई गेर मुनज़्ज़म ओर कम तरबियत याफ्ता सिपाही थे, इनमे यरोप से आई हुई ईसाई फ़ौज़ भी शामिल थी.

उस्मानी फ़ौज़ के बिल्कुल आगे शहर हिफ़ाज़ती दीवार से ढाई सौ गज़ के फासले पर तुर्क इंजीनयर ने एक खन्दक खोद रखी थी जो पूरी हिफ़ाज़ती दीवार की लंबाई के बराबर थी ,यानी 4 मिल लम्बी,

इस खन्दक के पीछे एक छोटी सी दीवार बना दी गई थी जिसके पीछे घड़े खोदकर उनमे तोपे फिट की जा चुकी थी ,सुपर गन को सुल्तान के खेमे के बिकुल सामने नस्ब किया गया था,

जहा से वो हिफ़ाज़ती दीवार के सबसे कमजोर हिस्से को ब-आसानी निसाना बना सके.

सुल्तानि फ़ौज़ के मुकाबले में कांस्टेनटाइन ने अपनी पूरी ही फ़ौज़ यानी 9 हजार सिपाही , 4 मिल लम्बी मग़रबी दीवार पर फैला दिए.

सुल्तान की 70 तोपो के मुकाबले में कांस्टेनटाइन के पास सिर्फ 15 तोपे थी

इसपर मजीद ये दीवारे कमजोर हो चुकी थी इनपर रख कर अगर तोपे चलाई जाती तो झटको से दीवारे टूट सकती थी.

सुल्तान की 70 तोपो के मुकाबले में कांस्टेनटाइन के पास सिर्फ 15 तोपे थी

इसपर मजीद ये दीवारे कमजोर हो चुकी थी इनपर रख कर अगर तोपे चलाई जाती तो झटको से दीवारे टूट सकती थी.

चुनाचचे दीवार पर नुमाइसी नदाज़ में तोपे लगा दी गई.

जब की (सी एफ़) मारमरा वाली 5 मिल लम्बी दीवार पर जो संमुन्दर के साथ थी, जहा से हमले का ज़ियादा खतरा नही था कुछ कुछ फासले पर सिर्फ़ निगरानी के लिए चन्द सिपाही ओर कुछ तोपे नस्ब करदी गई थी.

अब रहगई शहर की तीसरी तरफ गोल्डनहार्न वाली साइट की दीवार ये हिस्सा जंजीर की वजह से पहले ही महफूज़ बनाया जा चुका था इस लिए वहा कोई फ़ौज़ तैनात नही की गई.

⚔️ये थी दोनो फ़ौज़ की जमीनी पोजीशन

🏹अब दोनो फौजो की बेहरी पोजीशन

⛴️ सुल्तान की 180 बाज़ रिवायत के मुताबिक 140 बेहरी जहाज सी एफ़ मारमरा के बासफोरस तक पेट्रोलिंग कर रहे थे, जंजीर की वजह से ये जहाज़ गोल्डनहार्न मर दाखिल नही हो सकते थे.

जब की कुस्तुन्तुनिया का पूरा बेहरी बेड़ा 20 से 40 जहाजो पे मुस्तमिल था और गोल्डनहार्न कि बंदरगाह में महफूज़ खड़ा था, लेकिन अब इन सब बेहरी जहाज़ समेत सबके इम्तिहान का वक़्त आ पोहचा था.

क्यू के 7 अप्रेल को कील काटे से लैस उस्मानी फ़ौज़ शहर को चारों तरफ से घेर चुकी थी छोटी छोटी चंद झड़पे भी हो चुकी थी, लेकिन ये सिर्फ नेट प्रेटिक्स थी.

12 अप्रेल की रात सुल्तान मोहम्मद फातेह सुपर गन के पास आए और चन्द लम्हो बाद पहले गोले के जर्ब से कुस्तुन्तुनिया की दीवारे थर्रा उठी.

तोपो के साथ साथ उस्मानीयो की मन्जेकनी भी पत्थर फेक रही थी, कुस्तुन्तुनिया में रोजाना 120 गोले फायर हो रहे थे.

100 , से 600 किलोग्राम गोले जब शहर के अंदर गिरते तो मिलो तक जमीन लरज़ उठती

जवाब में दीवार के मुहाफीजो ने भी अपनी तोपे चलाने का फैसला किया , लेकिन हुवा ये की उन की सबसे बड़ी तोप फायर करते ही फट गई, वजह ये थी कि तोपे चलाने के लिए अच्छे माहिरीन ओर मुनासिब बारूद मौजूद ही नही था.

बहर हाल रूमियों ने तहफ़्फ़ुज़ तो करना ही था ,उन्होंने चाक ईटो का मसाला तय्यार किया जिसे दीवारों पर उंडेल दीया जाता ताके दीवारों में मज़बूती ओर ज़ियादा पैदा हो सके.

इसके इलावा शहर वालो ने अपनी लिहाफो चटाइयों से रूई ओर चमड़ा निकाल कर इन्हें लकड़ी की लम्बी लम्बी सीटों पर बांद दिया और इन सीटों को दीवारों के आगे लटकाना शूरू कर दिया ताके दीवारे गोलो का दबाव बर्दास्त कर सके.

लेकिन जदीद भारी भरकम गोलो के आगे कोई ऐसा टोटका कोई ऐसी तरकीब काम नही आ रही थी सिर्फ एक हफ्ते की बमबारी से बेहरूनी दीवार का बड़ा हिस्सा गिर गया था.

लेकिन यहा उस्मानियो के लिए एक मसला पैदा हो गया ,उस्मानी बड़ी तोप,(सुपर गन) गोला फायर करने के बाद तेजी से ठंडी होने लगती थी जिससे उसकी नाल टूटने लगती थी.
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