भारतीय_मुस्लिम_स्वतंत्रता_सेनानी : नवाब अब्दुर्रहमान ख़ान

नवाब अब्दुर्रहमान खानः जंग ए आजादी का वह शहीद जिनकी शहादत को इतिहास में धुंधला कर दिया गया

“इतिहास लिखने की अपनी एक रिवायत रही है, कि जो सत्ता पर क़ाबिज़ रहा उसने अपने अनुसार इतिहास लिखा यानी हर दौर में इतिहास का पुनर्लेखन हुआ खासकर उन पहलुओं पर ज्यादा प्रकाश डाला गया जो सत्ता पक्ष के लिए अनुकुल रहे हो और यही सोच आज़ादी का इतिहास लिखने में भी रही जिसके कारण ना जाने कितनी क्रांतिकारी शख्सियतें गुमनामी के अंधेरे में ही सिमट कर रह गयी, यानी आज़ाद भारत मे उनको वह मुकाम हासिल नही हुआ जिसके वह क़ाबिल थे।

गुमनामी की इन्ही तस्वीरो में से एक तस्वीर झज्जर के नवाब शहीद अब्दुर्रहमान खान की भी है जिन्होनें गुलामी की बेड़ीयों में जकड़े हुए हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिए अपनी जान अड़ा दी थी। हरियाणा की स्थापना के बाद झज्जर भले ही प्रदेश के मानचित्र पर 15 जुलाई 1997 में जिला बनकर उभरा हो, लेकिन इतिहासकारों के लिए झज्जर कभी अनछुआ नहीं रहा, यहा की वीर गाथांए और शहादत के किस्सों को आज के सियासी दौर मे भले ही याद ना किया जाए लेकिन आज़ादी के इतिहास मे इनकी अपनी एक जगह है।

10 मई 1857 को जब क्रांति की अलख पूरे देश मे जल उठी तो आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र को इसके नेतृत्व के लिये चुना गया, इस विद्रोह की पहली प्रतिक्रिया झज्जर रियासत पर हुई जिसका सबूत “अवध की बेगम कैसर का लिखा कैसरनामा है, जो काकोरी के अमीर महल के पुस्तकालय में आज भी सुरक्षित है”।

विरासत मे मिली झज्जर की हूकूमत की कमान जब 1845 मे नवाब अब्दुर्रहमान खान ने संभाली तो उस समय ईस्ट इंडिंया कंपनी द्वारा भारत को पूर्णत: गुलाम बनाने की व्यवस्था हावी थी, छोटे छोटे राजा, रजवाडे, नवाब उनकी रियासते अंग्रेज़ो के अधीन होती जा रही थी पर नवाब अब्दुर्रहमान इस बंदिश के खिलाफ थे और इसी कारण उन्होने गद्दी संभालते ही अपनी रियासत की सैन्य शक्ति व प्रबधंन की मज़बूती पर अपना ध्यान केन्द्रित किया जिसमें झज्जर के रिछपाल सिंह, कुतानी के ठाकुर स्यालू और बादली के चौधरी गुलाब सिंह को अपना दीवान बनाया व खजांची लाला बस्तीराम को बनाया, लाला बस्तीराम के नाम पर आज भी झज्जर में मोहल्ला बस्तीराम है तथा झज्जर में आज भी इन दीवानों के नाम का दीवान गेट है।

नवाब ने अपने राज्य के गरीब किसानों का लगान खत्म किया साथ ही ईमारतों और तालाब के शौकिन अब्दुर्रहमान ने झज्जर में बेगम महल, झज्जर की जामा मस्जिद का मुख्य द्वार, गांव छूछकवास में महल और तालाब, दादरी में इला और किले के अंदर ख़ूबसूरत इमारतों का निर्माण करवाया, मुगल और भारतीय शैली में बनी ये इमारतें प्राचीन कलात्मक कारीगरी के नायाब नमूनों के रूप में आज भी विख्यात हैं।

झज्जर उस समय एक बड़ी और फैली हुई रियासत के रूप मे था जिसमें बादली समेत 360 गांव थे, लगभग 14 लाख की सालाना आमदनी थी। 1855 तक आते आते अंग्रेज़ों के बढ़ते दखल और हिन्दोंस्तान को बंधुआ बनाने की सोच के कारण नवाब का ईस्ट इंडिंया कंपनी के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा था इसी बग़ावत को भांपतें हुए नवाब ने अपने सैनिकों की संख्या बढानी शुरू कर दी, फौज में पूबीये, तेलंगे और जाट और पठान शामिल थे।झज्जर के दक्षिण में अपनी फौज के लिए एक छावनी बनाई, किलों पर तोपें चढा दीं गईं, सिलाणी गांव की बणी में नवाब की फौजों की परेड हुआ करती थी और छुछकवास की बीड़ में सैनिक गोलाबारी का अभ्यास करते। नवाब अपनी रियासत को पूरी तरह स्वतंत्र और आर्थिक मज़बूत रखना चाहता था। धीरे धीरे अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के स्वर बुलंद होने लगे, बाग़ियों के क्रोध का तापमान उच्च पैमाने पर था, जल्दी ही हवा बदली और आजादी की पहली चिंगारी मेरठ से उठी और जिसने सारे भारत को समेट लिया यह एक अचम्भित करने वाली बगावत थी।

झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान, बल्लभगढ़ के महाराजा नाहर सिंह, फरर्रूखनगर के नवाब अहमद अली गुलाम खां, रेवाढी़ की जागीर के तुलाराम और बहादुरगढ़ के नवाब भी क्रांत्रीकारियों के साथ इस समर मे कूद पढे़।चारो तरफ से बाग़ियों के तेवर कंपनी को भारत से उखाड़ फैकने के थे, इस क्रांत्री ने ब्रिटिश साम्राज्य की जडे़ हिला दी थी।

दिल्ली से 20 मील दूर दक्षिण मे अंग्रेज़ी फौज के खिलाफ विद्रोहियों की इतनी ज़बरदस्त मोर्चाबंदी थी कि कर्नल लारेंस ने गवर्नर जनरल को एक पत्र मे लिखा की दक्षिण पूर्व से हमारी सेनाएं तब तक प्रवेश नही कर सकती जब तक चीन या इग्लेंड से प्रशिक्षित सिपाही ना आ जाए।इस मज़बूत मोर्चाबंदी के कारण ही 1857 मे अंग्रेज़ दक्षिण की ओर से दिल्ली मे नही घुस सके, उन्होने उत्तर से कश्मीरी गेट को चुना।

जनरल शावर ने अपनी चालाकी और धोखाधड़ी से महाराजा नाहरसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया, और कुछ समय बाद फरर्रूखनगर के नवाब अहमद अली गुलाम खां भी अंग्रेज़ी हुकूमत की गिरफ्त मे आ गये, इन पर विद्रोह का मुकदमा चलाकर फांसी दे दी गई।

उधर मेरठ के बागी सिपाही भी दिल्ली ओर बढ़ चले, उनका मकसद बहादुरशाह ज़फ़र की अगुवाई में अंग्रेंजों के ख़िलाफ़ एकजुट होना था। दिल्ली की ओर बढ़ती क्रांतिकारियों की फौज से अंग्रेज घबरा गए, उन्होंने नवाब अब्बदुर्रहमान से फौजियों की कुछ टुकडि़या और तोपखाने की मदद मांगी जिससे क्रांतिकारियों को मेरठ से दिल्ली पहुंचने से रोका जा सके, परंतु नवाब ने अंग्रेज़ो की मदद से इंकार कर दूसरी तरफ अपने ससुर अब्दुस्समद खां की अगुवाई में कुछ फौजी दस्ता, बादशाह बहादुरशाह जफर की मदद के लिए बादली के सराय दिल्ली रवाना कर दिया साथ ही क्रांत्रीकारियों की मदद के लिए पैसा, सेना और हथियार से भरपूर मदद की क्योकी समय इस विदेशी हुकूमत को उखाड़ फैकने का था।

1857 का प्रथम स्वत्रंता संग्राम 11 मई से लेकर नवंबर तक हरियाणा के कई छोटे बडे़ शहर, गांव-कस्बों जैसे सांपला, रोहतक, गुढ़गांव, मेवात, मांडौठी, सोनीपत, खरखौदा, महम, मदीना, नारनौल, गौहाना, हांसी, हिसार, भट्टू, रोहणात, हाजिमपुर, भाटोल,राघणान,खरण,अलीपुर,मंगाली, खरड, ईस्माइला आदि मे लड़ा जा रहा था, सभी एकजुट होकर क्रांत्रिकारियों का साथ दे रहे थे।

उधर नवाब अब्दुर्रहमान के बाग़ी रवैये से बौखलाई ईस्ट इंडिया कंपनी ने झज्जर रियासत पर हमले की रणनीति तैयार कर अपने क़ाबिल अंग्रेज़ अफसरो को इसकी ज़िम्मेदारी सौप दी वही दिल्ली के एक अंग्रेज़ कमिश्रनर को विद्रोहियों ने मौत के घाट उतार दिया तो क्रांत्रिकारियों के हमले से गुढ़गाव से जान बचाकर भागे जनरल ज्वांइट मैटका़फ और उनके साथ यूरोपीय अंग्रेज़ औरते कुछ बच्चे झज्जर तक पहूचे, नवाब की दयालुता ने उन अंग्रेज़ औरतो बच्चो को छुछकवास के महल मे छिपने की जगह दी।

विद्रोहियों के प्रतिरोध से घबरायी कंपनी ने चीन, इग्लैंड व यूरोप से भारी संख्या मे सैनिक बुलायें। लेफ्टिनेंट कनर्ल गैराड को बागी तुलाराम की जागीर और उसके साथियों को कुचलने के लिये विशेष बल के साथ भेजा गया लेकिन तुलाराम के समर्थन के लिए नवाब अब्दुर्रहमान ने अपनी फौजें भेज दी।वही बहादुर शाह ज़फर द्वारा तफ़जुल हुसैन को रोहतक व झज्जर पर कंपनी की बढ़ती पेहराबंदी के खिलाफ सैन्य बल के साथ रवाना किया।

तफ़जुल हुसैन और यहां के रांगड़ों, राजपूतों, जाटों और पठानों के सामने अंग्रेज़ अफसर टिक नही पाये और उन्हे गोहाना भागना पड़ा, तफ़जुल हुसैन के साथ मिलकर बागियों ने अंग्रेजों के दफ्तर,अदालतें, निवास और जेलें जला डालीं, कैदियों को आजाद करवा लिया, महम, मदीना और मांडोठी के कस्टम बंगले जला दिये गए। सांपला में भारी तबाही मचाई गई,जहां भी अंग्रेज रहते थे उनके घर, बंगले सब नष्ट कर दिये गए, क्रांत्री के इस दौर मे हरियाणा मे कई जगह अंग्रेज़ी हुकूमत से भीषण टकराव हूए।

अब ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए झज्जर क्रांत्री का केन्द्र बन चुका था जिसको कुचलना ब्रिटिश साम्राज्य के लिए बेहद ज़रुरी था। जनरल शाबर और कैप्टन हड्सन ने झज्जर व रोहतक पर फिर से रणनीति बनाकर हमला किया लेकिन इस बार भी वह झज्जर और रोहतक को नहीं ले पाये, अब तो अंग्रेजों के सामने सारा हिन्दुस्तान एक तरफ और झज्जर एक तरफ था अंग्रेजों ने झज्जर की रियासत पर कब्ज़ा करने और नवाब को गिरफ्तार करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी साथ ही 1857 की इस क्रांत्री को खत्म करने के लिए कंपनी के आला अफसरो ने कुछ लालची राजा रजवाडो़ नवाबों को लालच देकर उनको अपने साथ मिला लिया। जगह जगह क्रांत्रीकारी पकडे़ जाने लगे, हज़ारों की संख्या मे विद्रोहियो को फांसी पर लटका दिया गया। शहर, गांव, कस्वों पर हमला कर कंपनी ने लाशों के ठेर विछा दिए, विद्रोहियो के साथ साथ ग्रामिणो को भी नही बक्शा। धीरे धीरे करके यह विद्रोह ठंडा पडने लगा।

8 अगस्त को ब्रिगेडियर निकलसन ने रोहतक पर हमला किया लेकिन बागी सेना ने अंग्रेज़ो का डटकर मुकाबला किया, वही लैफ्टिनेंट हड्सन भी अधिक तोप गोला बारूद के साथ वहा पहुंचा, कुछ दिन तक टराराव के बाद अंग्रेज़ी सेना हावी होने लगी और रोहतक, सोनीपत, सांपला, खरखौदा, महम, मोहाना आदि शहर व कस्वों पर कंपनी की हुकूमत हो गई और पुरा हरियाणा फिर से क्रूर और अत्याचारी कंपनी हुकूमत की गिरफ्त मे आ रहा था। दिल्ली पर अंग्रेज़ी सरकार फिर से क़ाबिज़ थी, आखिरी मुगल बादशाह और 1857 की क्रांत्री के मुखिया बहादुर शाह ज़फर अब ब्रिटिश हुकूमत की कैद मे थे, झज्जर भी अपनी आज़ादी के अतिंम लम्हो की ओर था क्योकी नवाब अब्दुर्रहमान भी कंपनी सरकार की गिरफ्त मे ही थे

17 अक्तूबर 1857 को कर्नल लोरेंस ने नवाब को छुछकवास के किले से गिरफ्तार कर कैद कर लिया गया, उस समय नवाब के साथ उसके खजांची लाला बस्तीराम और दूसरे सलाहकार भी थे। तीखे संघर्ष के बाद झज्जर के किले पर ब्रिटिश झंडा फहरा दिया गया। झज्जर की जागीर पर अब कंपनी का कब्ज़ा था, खज़ाने लूट लिए गए जहाजगढ़, कनोड़ और झज्जर के किलों पर अंग्रेज़ो की हुकूमत थी, एक धनधान्य से पूर्ण शहर झज्जर को लूट लिया गया, रियासत के चारों ओर प्रसिध्द सड़कों पर निरीह प्रजा को फांसी पर लटका दिया गया,जु़ल्म की ऐसी इन्तेंहा की हर तरफ लाशें ही नजर आ रही थी।

नवाब के परिवार की औरतों, जो कि जीनत-उन-निशा बेगम, जैबुन-उन-निशा बेगम, जुमिद-उन-निशा बेगम और जीनत-उन-निशा बेगम की बेटी उमराव बेगम के नाम 25000 रुपये प्रत्येक के नाम के एक लाख के प्रोमिसिरी नोट्स जो कि उन्होंने जनवरी 1853 में खरीदे थे, जब्त कर लिये गए।

8 दिसंबर 1857 को दिल्ली में यूरोपियन मिलिटरी कमीशन की कार्यवाही दिल्ली के एक महल “इम्पीरियल हाल आँफ ओडियन्स” में शुरू हुई जिसमें पंजाब के चीफ कमिश्नर सर लारेंस के निर्देशानुसार मेजर जनरल पैरों द्वारा नवाब पर मुकदमा चलाये जाने का आदेश पेश हुआ, नवाब की पैरवी राम रिछपाल सिंह ने की।

नवाब पर तीन मुकदमे चलाए गए, -नवाब अब्दुर्रहमान ख़ां ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोहियों की मदद की और जहां मार्शल लॉ लागू था वहां विद्रोह करने और कराने की कोशिश की। नवाब अब्दुर्रहमान ख़ां ने विद्रोहियों को फौज, शरण और धन दिया। नवाब ने सरकार को धोखा देने के लिए विद्रोहियों के साथ पत्र व्यवहार किया। एक पूर्ण नियोजित षंडयंत्र की कार्यवाही के तहत महज चार दिन की सुनवाई के बाद ही 11 दिसंबर 1857 को झज्जर के नवाब को फांसी पर लटकाने का हुक्म दे दिया गया।

“एक अनूठे दस्तावेज “The Trial of Abdul Rahman Khan, Nawab of Jhajjar” की मूल प्रति National Archives, New Delhi में है जिसमें नवाब की फांसी का प्रामाणिक और हू-ब-हू वर्णन है,फैसले की चंद लाइनें ये हैं: “The Board, having found the prisioner guilty of the charge preferred against him, to sentence Abdoor Rahman Khan, Nawab of Jhajjar to be hanged by the neck until he be dead, and board further sentence him to forfeit all his property and effect of any discription”.

और इस तरह 23 दिसंबर 1857 को हरियाणा में आज़ादी की क्रांति फूंकने वाले क्रांतिकारी नवाब अब्दुर्रहमान खान को दिल्ली के लाल किले के सामने चांदनी चौक पर सरेआम फांसी दे दी गई, व उनकी रियासत के टुकडे-टुकडे क़रके अंग्रेंजों की मदद करने वाले वतन के गद्दारो मे बांट दी गई।

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